Wednesday, June 19, 2024
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टोटकों से नहीं टूटेगी कोरोना की चेन

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NAZARIYA 3


HEMLATA MEHSKEकोरोना महामारी की हर लहर जानलेवा साबित हो रही है। इस महामारी से वही लोग बच पा रहे हैं जिन्होंने चिकित्सा की आधुनिक पद्धतियों और उपायों का प्रयोग किया है। दूसरी ओर, इस महामारी से वे लोग नहीं बच पा रहे हैं जो इसे ‘दैवीय आपदा’ मान रहे हैं और अंधविश्वास के चक्कर में अप्रमाणित दवा के नाम पर गौ-मूत्र और गोबर का इस्तेमाल कर रहे हैं, टोना-टोटका कर रहे हैं या ओझा-गुनिया व तांत्रिक से झाड़-फूंक करवा रहे हैं।
अपने देश में बीमारियों और महामारियों को लेकर आम जनता की समझ को वैज्ञानिक बनाने की दिशा में कोई खास प्रयास नहीं किया गया है। पिछली सदी की हैजा, प्लेग महामारी के दौरान स्वामी विवेकानंद और उनकी शिष्या भगिनी निवेदिता ने महामारी से बचने की सलाह दी थी, लेकिन इसके बाद के दिनों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता के लिए कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाए गए। जो कदम उठाए गए उससे बहुत बड़ी आबादी लाभान्वित नहीं हो सकी। नतीजा यह है कि वे आज भी अनेक बाबाओं, तांत्रिकों और ओझा-गुनियों के चक्कर में फंसकर तबाह हो रहे हैं। देखा गया है कि पढ़े-लिखे लोग भी अंधविश्वास के वशीभूत होकर अनाप-शनाप हरकतें करते हैं। दूसरे देशों के लोगों को यह बात समझ में आ गई है कि कोरोना महामारी की एकमात्र वजह विषाणु हैं, लेकिन अपने देश में कोरोना के खिलाफ जन-जागृति-अभियानों के जरिए यह बात समझाने की जरूरत है।

अगर हम वैज्ञानिक समझ से सोचते-करते होते तो आज कोरोना से जितना नुकसान हुआ है, वह नहीं हुआ होता। इतना कोहराम और हाहाकार भी नहीं होता। इतने लोगों की मौत नहीं हुई होती। उन्हें श्मशानों और कब्रगाहों में अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़ा नहीं होना पड़ता और ना ही वे लाशों को नदियों में बहाने के लिए विवश होते।

इसी के चलते आज कारोबार की हालत बिगड़ी है और घर-परिवार तबाह हुए हैं, प्रियजन बेसहारा और बच्चे अनाथ हो गए हैं। भारी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए हैं। अभी भी निश्चित नहीं है कि कोरोना से मानवता को कब मुक्ति मिलेगी। कोरोना की तीसरी-लहर के भी आने की संभावना बताई जा रही है। हमें आगामी खतरों के लिए सावधान होने के साथ अंधविश्वास और टोने-टोटके से खुद को मुक्त रखना होगा। कोरोना के फैलाव की शुरूआत पिछले साल जनवरी में ही हो गई थी। समय पर वैज्ञानिकों ने कोरोना की आशंका जाहिर कर चेता दिया था, पर हमने ध्यान नहीं दिया।

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने भी देर करते हुए 11 मार्च को इसे ‘वैश्विक महामारी’ घोषित किया। हमने वैज्ञानिकों की चेतावनी को हल्के में लिया और खासकर अपने देश में इसे दैवी आपदा मानकर दूसरे गैर-जरूरी उपाय करते रहे। मास्क लगाने, दूरी बनाए रखने और हाथ-धोने जैसे वैज्ञानिक और प्रमाणित उपायों को नकारते रहे। आजादी के पहले भी विभिन्न महामारियों में करोड़ों लोगों की मौतें हुईं थीं, क्योंकि अंग्रेजों को भारतीय जनता के स्वास्थ्य से कुछ लेना-देना नहीं था। निरक्षर और अंधविश्वासी जनता दैवी आपदा मानकर इससे बचाव के अप्रमाणित उपाय करती रहती थी।

मौजूदा कोरोना काल में भी लोग उससे मुक्ति के लिए अंधविश्वासी कदम उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं। पिछले साल तो हमने लॉकडाउन के दौरान कोरोना को भगाने के नाम पर थालियां व तालियां बजाईं थीं, शंख फूके थे और टॉर्च, मोबाइल या दीप जलाकर रौशनी की थी। इसके बावजूद दूसरी लहर इतनी कारुणिक हो गई, लोगों के मरने का सिलसिला तेज हो गया। समय रहते हमने वैज्ञानिक दृष्टि से आगामी खतरों को भांपकर पूर्व-तैयारी के बारे में नहीं सोचा। अस्पतालों, दवाइयों और आॅक्सीजन सिलेंडर की पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर सके।

आज जब कोरोना समाप्त नहीं हो रहा है तो हमारे नेता हमें नीम की पत्तियां जलाने, नाक में तिल या नारियल का तेल डालने के साथ गौ-मूत्र पीने, गोबर लेपने और नाक में नींबू का रस डालने जैसी अप्रमाणित सलाह सरेआम दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसा प्रचार किया जा रहा है कि कोरोना का वायरस हवा में नहीं फैले, इसके लिए घर-घर में हवन करें। विशेषज्ञों ने कई बार कहा है कि कोरोना संक्रमण को रोकने में गोबर और गौ-मूत्र नाकाम हैं। फिर भी अहमदाबाद में एक प्रसिद्ध गौ-शाला में गोबर के इस्तेमाल के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक यहां कई लोगों के शरीर पर गोबर लेपने के बाद उन्हें दूध से नहलाया भी गया। मध्यप्रदेश के ही शिवपुरी जिले के एक गांव में कर्फ्यू के बावजूद ग्रामीणों ने कोरोना को भगाने के लिए विशेष पूजा और भंडारे का आयोजन किया था। जब पुलिस रुकवाने पहुंची तो ग्रामीणों ने उन पर पथराव किया।

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंधविश्वास व्याप्त था कि देवी के नाराज होने से ही कोरोना फैला है। बड़ी संख्या में महिलाएं देवी की पूजाकर कोरोना के प्रकोप से मुक्ति के लिए मन्नतें मांगने लगी थीं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में कोरोना को दैवी आपदा मानकर शहरी और ग्रामीण महिलाएं ‘कोरोना माई’ को रोजाना सुबह-शाम जल चढ़ाने लगी थीं।

अहमदाबाद में सानंद जिले के नवापुर गांव में कोरोना को भगाने के नाम पर सैकड़ों महिलाओं ने सिर पर पानी भरे कलश लेकर मंदिर की परिक्रमा लगाई थी और फिर उन कलशों का पानी गांव के पुरुषों ने उड़ेला था। ऐसे अंधविश्वास और टोने-टोटके वाले अनेक उपाय आज भी धड़ल्ले से अपनाए जा रहे हैं। जाहिर है, यह सब हमारी अवैज्ञानिक सोच के कारण हो रहा है। यह सोच बदलने की जरूरत है।


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