Saturday, April 13, 2024
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कोरोना की नई लहर और शिक्षा

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67देश में एक बार फिर कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा डराने लगा है। कई राज्यों में तो हालात ज्यादा खराब स्थिति में है। वहीं कुछ राज्यों ने एहतियात के तौर पर लॉकडाउन, रात्रि कर्फ्यू और अन्य उपायों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। उद्योग जगत, सामाजिक आर्थिक क्षेत्र के साथ एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र इस वायरस से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है वो है शिक्षा का। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार, शिक्षण संस्थानों और तमाम दूसरी संस्थाओं एवं एजेंसियों ने कोरोना संकट के बीच भी शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने के लिए बड़ी मशक्कत की है। कोरोना की नई लहर के दस्तक देते ही विभिन्न राज्यों ने शिक्षण संस्थानों को बंद करने के निर्देश दिए हैं। भारत में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद 33 करोड़ है। भारत की कुल जनसंख्या का 19.29 फीसदी हिस्सा 6-14 की उम्र के बीच के बच्चे हैं जो शिक्षा के अधिकार के तहत कानूनी रूप से शिक्षा के हकदार हैं। अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजना तो चाहते हैं, लेकिन बदले हालात में ऐसा संभव नहीं दिख रहा। वहीं कई परिवारों के लिए स्कूल सिर्फ पढ़ाई करने की जगह नहीं हैं, वे उससे कुछ ज्यादा हैं। कई सरकारी स्कूल बच्चों को खाना खिलाते हैं और उनकी सुरक्षा समेत उन तक सरकारी सुविधाओं के पहुंचने का माध्यम हैं। इस महामारी के कारण पूरी दुनिया में 73 प्रतिशत युवाओं की पढ़ाई में बाधा आई है।
प्राथमिक हो माध्यमिक या उच्च शिक्षा, छात्रों का पठन पाठन बुरी तरह से प्रभावित है।

विभिन्न शिक्षण संस्थान ऑनलाइन ही छात्रों को नोट्स, असाइनमेंट आदि उपलब्ध करा रहे हैं। साथ ही साथ उनके अभिवावकों से भी बात की जा रही है जिस से छात्रों को किसी प्रकार की कोई असुविधा ना हो। कुछ अन्य सरकारी यूनिवर्सिटीज ने भी ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी इंतजाम किए हैं। फिर भी छोटे शहरों में स्थित संस्थानों का बुरा हाल है।

चुनिंदा शहरी स्कूलों के ऑनलाइन क्लासेज कराने और इनकी पहुंच सीमित होने के चलते शिक्षाविदों को हर तरह के आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि वाले बच्चों के लिए पढ़ाई के इनोवेटिव तरीकों को ढूंढने की चुनौती पैदा हो गई है। भारत जैसे युवा देश जिसमें छात्रों की संख्या इतनी अधिक हो यह स्थिति चिंता जनक हैं। उच्च शिक्षा पर इसके प्रभाव को लगभग हर हिस्से में देखा जा सकता है।

कोरोना संकट के दौर में शैक्षणिक संस्थानों के आगे जो चुनौती है उसमें ऑनलाइन एक स्वाभाविक विकल्प है। ऐसे समय में विद्यार्थियों से जुड़ना समय की जरूरत है, लेकिन इस व्यवस्था को कक्षाओं में आमने-सामने दी जाने वाली गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विकल्प बताना भारत के भविष्य के लिए अन्यायपूर्ण है। एक और महत्वपूर्ण विषय है कि जो छात्र पहले खुल कर रहते थे, विभिन्न गतिविधियों जैसे खेल आदि मनोरंजन में अपने सहपाठियों के साथ खुलकर भाग लेते थे, आज वो छात्र अपने घरों में कैद है, सामाजिक दूरी बना रहे हैं।

ऐसे में अगर ये लॉक डाउन और बढ़ा तो ये छात्र मानसिक तनाव में आ सकते हैं, वहीं टीवी लैपटॉप, मोबाइल का अधिक उपयोग भी उनकी मानसिक स्थिति पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। मानसिक अवसाद की ऐसी अवस्था से छात्रों को बचाने के लिए मनोवैज्ञानिकों को आगे आना चाहिए एवं उनका मार्गदर्शन करना चाहिए। छोटे बच्चों को कंप्यूटर और लैपटॉप के सामने देर तक बैठने में बहुत दिक्कत हो रही है।

बच्चे अकड़ जाते हैं और बोरियत से भर जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक कोरोना संक्रमण का प्रभाव कम होते ही स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई कराई जाए क्योंकि ज्यादा दिन तक ऑनलाइन शिक्षा से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के अलावा सामाजिक जीवन पर भी व्यापक असर पड़ेगा। ज्यादा दिन तक छात्र व शिक्षक की दूरी से जो गुरु शिष्य के मधुर संबंध होते हैं वह प्रभावित होंगे। पिछले कुछ महीनों में शिक्षण संस्थान शर्तों के साथ खुले भी थे, लेकिन कोरोना की नयी लहर के चलते फिर एक बार शिक्षण संस्थानों के दरवाजे छात्रों के बंद होते दिख रहे हैं।

भारत सरकार के प्रोग्राम स्वयं को भी रोशनी मिली। यहां कक्षा 9वीं से लेकर स्नातकोत्तर तक पढ़ने के लिए सामग्री है। कोई भी मुफ्त में इसका लाभ उठा सकता है। एमएचआरडी ने ऐसे 19 अलग-अलग मंच तैयार किए हैं जहां सीखा-पढ़ा जा सकता है। ये अच्छी कोशिश है।

पर हमारे देश में डिजिटल लर्निंग की आधारिक संरचना के स्तर को सुधारने के लिए बहुत काम करना होगा। हालांकि इस ऑनलाइन पढ़ाई से उन अभिभावकों पर असर पड़ा जिनके पास संसाधनों की कमी है। जो उच्च तकनीक का मोबाइल नहीं खरीद पा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र जहां बिजली व नेटवर्क की कमी कमी रही वहां के बच्चों को पढ़ने में परेशानी का सामना करना पड़ा। फिर भी यह व्यवस्था वर्तमान परिस्थिति के हिसाब से सबसे उचित है।

चूंकि देश में कोरोना नये सिरे से सिर उठाने लगा है, ऐसे में छात्र और अभिभावक भविष्य को चिंतित दिखाई देते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, संस्थान, समाज, इंडस्ट्री लीडर्स एवं स्वयं छात्रों को मिल जुल कर सभी छात्रों की समस्याओं को दूर करने के लिए एकजुट होकर प्रयास करना होगा, परीक्षाओं का विकल्प तलाशने होंगे, ऑनलाइन प्रोजेक्ट्स, असाइनमेंट्स अच्छे विकल्प साबित हो सकते हैं, इंडस्ट्रीज को आगे आना चाहिए और छात्रों को प्लेसमेंट, प्रोजेक्ट्स इंटर्नशिप आदि देकर उन्हें तनाव से बाहर ला सकते हैं।

अभिवावकों की भी जिम्मेदारी है कि वो इस मुश्किल वक्त में अपने बच्चों का मनोबल बढ़ाते उन्हें सकारात्मकता के लिए प्रेरित करे। देखिए शिक्षण संस्थान एक-न-एक दिन दोबारा से नार्मल रूटीन में आ ही जाएंगे। बच्चों का सीखना-पढ़ना वगैरह जो भी है, सब शुरू हो जाएगा। तब तक परेशान होकर घबराइये नहीं।

घबराहट में अक्सर हम सकारात्मक दृष्टि खो देते हैं और सबसे बुरी स्थिति पर सारा ध्यान केन्द्रित हो जाता है। फिर हम मूर्खतापूर्ण कदम उठा लेते हैं। कई बार यह विनाशकारी भी हो सकता है। वहीं शैक्षिक संस्थानों को यूरोप, दक्षिण कोरिया और चीन के अनुभवों से सीखना चाहिए। सबकी समझदारी और सर्तकता से ही कोरोना पर नियंत्रण हो पाएगा।


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