- साहित्यकार प्रो. वेद प्रताप बटुक के 91वें जन्मदिन पर पुस्तक लोकार्पण
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: पंडित प्यारेलाल शर्मा स्मारक सभागार में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. वेद प्रकाश बटुक के 91वें जन्म दिवस पर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच, न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशंस और मास्टर सुंदरलाल स्मृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में पुस्तक लोकार्पण एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। इसमें अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित रहे पूर्व राजदूत बाल आनंद और मुख्य अतिथि चंडीगढ़ से आई हिंदी अंग्रेजी और उर्दू की साहित्यकार डा. राजवंती मान।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राजवंती मान ने कहा कि आज के परिवेश में लेखकों और कवियों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। आज मानवीय मूल्यों पर प्रहार हो रहा है। धर्म और जाति के नाम पर राजनीति ने सामाजिक ताने-बाने को क्षति पहुंचाई है। इसलिए ऐसी रचनाओं की जरूरत है जो समाज में सांप्रदायिक सदभाव को पुन: स्थापित कर सकें। उनके द्वारा संपादित पुस्तक सरदार भगत सिंह एक प्रतिबंधित जीवनी का भी विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया।
इसके साथ ही प्रोफेसर वेद प्रकाश बटुक जी को सभी मंचस्थ अतिथियों तथा सभागार में उपस्थित बड़ी संख्या में आए हिंदी प्रेमियों द्वारा उनके 91वें जन्मदिवस पर हार्दिक बधाई दी गई तथा उनके द्वारा रचित पुस्तकों रचनावली खंड एक तथा उत्तर राम कथा के द्वितीय संस्करण का भी विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रोफेसर बटुक को उनकी अनन्य सेवाओं के लिए कबीर सम्मान 2022 से सम्मानित किया गया।
जो वेब पत्रिका आखर की संपादिका डा. पुष्पलता अधिवक्ता द्वारा प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन कवि डा. रामगोपाल भारतीय द्वारा किया गया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया जिसमें मेरठ के जाने-माने कवियों ने काव्य पाठ कर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया।
समारोह में प्रोफेसर बटुक को शुभकामनाएं देने वालों में पूर्व कमिश्नर आरके भटनागर, पूर्व जज रमेश चंद्रा, वरिष्ठ छायाकार ज्ञान दीक्षित, वरिष्ठ गीतकार गोविन्द रस्तोगी, नवगीत कार शिवानंद सहयोगी, रामअवतार बंसल के साथ-साथ काव्य पाठ करने वाले कवियों कृष्ण कुमार बेदिल, ईश्वर चंद गंभीर, सत्यपाल सत्यम, ब्रज राज किशोर राहगीर आदि कवि शामिल रहे।
समारोह को संबोधित करते हुए प्रोफेसर वेद प्रकाश बटुक ने कहा कि आज सच पर संकट है। इसलिए सच्चा कवि वही है जो सच लिखे और समाज में व्याप्त बुराइयों का विरोध करें। व्यवस्थाकी कमियों को बिना किसी डर के उजागर करें। यदि कवि ऐसा नहीं करता है तो वह अपना धर्म नहीं निभा रहा। यही राष्ट्रप्रेम है और यही कवि धर्म है।
अध्यक्षता कर रहे पूर्व राजदूत बाल आनंद ने कहा की प्रोफेसर वटुक ने जीवन भर हिंदी की सेवा की है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया। गदर पार्टी पर उनका लेखन कालजयी है। उनकी चारों आत्मकथा पुस्तकें मील का पत्थर है और उनके द्वारा रचित दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकें हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

