
उत्तर प्रदेश विधानसभा के गत बजट सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष कई बार जवाबी कवि सम्मेलन कहें या मुशायरे का मजा लेते नजर आए। इससे कुछ ऐसा ‘समां’ बंधा कि पहले बजट भाषण, फिर उस पर हुई चर्चा भी इसका अपवाद नहीं बन पाई। स्वाभाविक ही न विपक्ष बजट प्रावधानों की बखिया उधेड़ने और सत्तापक्ष की पोल खोलकर उसको कठघरे में खड़ा करने का अपना दायित्व निभा पाया, न सत्तापक्ष अपनी ‘खूबियां’ ही ‘प्रकाशित’ कर पाया। कहने को बजट पर लम्बी चर्चा हुई, जिसमें दोनों पक्षों के कुल मिलाकर 93 विधायकों ने भाग लिया। लेकिन अपवादों को छोड़ दें तो वे बजट के सैद्धांतिक व नीतिगत पहलुओं के गंभीर विवेचन से बचते ही नजर आये। फलस्वरूप गोदी मीडिया के लिए यह सुनिश्चित करने का अपना ‘कर्तव्य’ निभाने में बहुत सहूलियत हो गई कि सत्तापक्ष की छवि को कोई आंच न आये। ऐसा नहीं है कि पहले के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, नेताओं व विधायकों द्वारा अपने भाषणों में कवियों/शायरों की चुटीली पंक्तियां इस्तेमाल नहीं की जाती थीं। लेकिन तब में और अब में एक बड़ा फर्क है: पहले वे उक्त पंक्तियां अध्ययन-मनन की प्रक्रिया से गुजर चुके अपने निष्कर्षों को पुष्ट करने या उनका जोर बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब अपने अध्ययन-मनन की कमी छिपाने और तथ्यों व प्रावधानों को हवा-हवाई ढंग से ऊपर-ऊपर छूकर निकल जाने के लिए काम में लाते हैं।
इसे यों समझ सकते हंै कि पहले के वित्तमंत्री बजट भाषण करते तो कभी-कभी उसके ‘नीरस’ आकड़ों को अपनी सरकार के ढृढ़ संकल्प जताने वाले एक दो शे’रों वगैरह की छोंक लगा देते थे। लेकिन इस बार वित्तमंत्री सुरेश खन्ना ने दर्पाेक्तियों तक के लिए इस छौंक की ऐसी हद कर दी कि उनका बजट भाषण किसी कवि द्वारा किया जाने वाला ‘सव्याख्या काव्यपाठ’ लगने लगा। गौर फरमाइये: हौसले दिल में जब मचलते हैं/आंधियों मेंं चिराग जलते हैं…मुक्त हूं कर्तव्य की चिन्ताओं से, दर्द से, दु:ख से मुझे आराम है/हर किसी के वास्ते हर वस्तु है, यह हमारे ऐश्वर्य का पैगाम है…पैदा नजर-नजर में इक ऐसा मुकाम कर/दुनिया सफर करे तेरे दामन को थामकर…आंख का हर अश्रुकण हंसने लगा है/ढल गई है आह भी संगीत में/जगमगाता है हृदय का अंधकार कष्ट परिवर्तित हुए हैं गीत में…तुम्हारी शख्सियत से ये सबक लेंगी कई नस्लें/वही मंजिल पे पहुंचा है जो अपने पांव चलता है/डुबो देता है कोई नाम तक भी खानदानों का/किसी के नाम से मशहूर होकर गांव चलता है…यूनान-ओ-मिस्र-अंो-रोमां सब मिट गये जहां से/अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशां हमारा।
सुविदित है कि शेर-व-शायरी हमारे मन को हमेशा प्रफुल्लित नहीं करती। तभी करती है जब हमारी संवेदनाओं को स्पर्श कर पाती है। अन्यथा वितृष्णा और ऊब पैदा करती है और बकवास लगने लगती है। लेकिन गोदी मीडिया ने वित्तमंत्री के ‘सव्याख्या काव्यपाठ’ को इस कसौटी पर कसे बिना ही प्रचारित कर दिया कि उन्होंने उसका तड़का लगाकर न सिर्फ वाहवाहियां बटोरीं बल्कि विधायकों का दिल भी जीत लिया। लगता है कि उसके इस प्रचार का ही असर था कि विपक्ष के नेता अखिलेश यादव ने भी अपनी बारी पर बजट पर शायराना चर्चा ही की। उसकी औपचारिाक आलोचना के बाद (गौरजलब है कि यह तो वे पहले ही कह चुके थे कि बजट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा अमीरों के लिए है, जिससे गैरबराबरी बढेगी और किसान-मजदूर, छात्र युवा व बेरोजगार और पामाल हो जायेंगे। फिर इसमें इतना और जोड़ दिया कि ऐसे बजट का क्या अर्थ है, जिसे सरकार सबसे बड़ा बनाकर लाये, लेकिन उसमें दी गई धनराशि खर्च ही नहीं कर पाये।) वे वित्तमंत्री को उन्हीं कं अन्दाज में जवाब देने पर उतर आये- बावजूद इसके कि पहले वे वित्तमंत्री की शेर-व-शायरी पर यह कहकर लानतें भेज चुके थे कि सरकार उनकी आड़ में अपनी कमियां नहीं छिपा सकती।
वित्तमंत्री की ‘डुबो देता है कोई नाम तक भी खानदानों का’ वाली पंक्ति का तो उन्होंने खैर इस व्यंग्य से जवाब देकर तालियां पिटवा लीं कि ‘खानदान का नाम लिया है तो खानदान बढ़ाने के बारे में भी सोचना चाहिए’। फिर यह कहकर भरपूर चुटकी ली कि ‘बात को जहां पहुंचना था, वह पहुंच गई’। अनंतर ‘किसी के नाम से मशहूर होकर गांव चलता है’ के सिलसिले में वित्तमंत्री से उनके गांव का नाम पूछने लगे और इकबाल के तराने ‘सारे जहां से अच्छा’ पर केंद्रित हो गए।
वित्तमंत्री ने बजट भाषण इसकी दो पंक्तियां पढ़ी थीं: यूनान-ओ-मिस्र-अंो-रोमां सब मिट गये जहां से, अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशां हमारा। अखिलेश ने चुटकी ली कि अच्छी बात है कि वित्तमंत्री ने इस तराने से अपने मतलब की पंक्तियों को बजट भाषण में शामिल कर उन्हें खुश होने का मौका दिया और खुद को सेकुलर साबित किया। लेकिन बात तो तब पूरी होती जब वे उसकी आगे की या भगवान राम पर लिखी पंक्तियां भी पढ़ते। फिर वित्तमंत्री की पढ़ी पंक्तियों में जिन देशों का नाम आया था, उनकी प्रति व्यक्ति आय पूछते हुए (इस आशय से कि उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय से उसका मिलानकर वित्तमंत्री आईना देख लें) खुद पढ़ने लगे: हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसता हमारा…कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमां हमारा।
यहां भी आशय यह पूछना था कि हिन्दोस्तां की जो ‘कुछ बात’ थी और जिसके कारण दौर-ए-जमां की सदियों की दुश्मनी के बावजूद उसकी हस्ती नहीं मिटी, उसे खत्म और गुलिसतां व बुलबुलों को जुदा कराने में लगे लोग इसे कैसे पढ़ सकते हैं? (बाद में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया बोले तो इसी तराने की पंक्ति ‘ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको’ का उल्लेख कर इकबाल को भारत के विभाजन और पाकिस्तान का सिद्धांतकार करार देते हुए उनके तराने की बाबत आधा-अधूरा सच बताने के लिए अखिलेश की ऐसी आलोचना करने लगे जैसे बजट के बजाय इकबाल और उनके तराने पर चर्चा हो रही हो।)
बहरहाल, अखिलेश लगा कि उनके भाषण के शायराना होने में अभी कुछ कसर रह गई है तो अयोध्या के लिए ‘भारी-भरकम’ बजट प्रावधानों, जिनकी बिना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बजट के आदि, मध्य और अंत सबको रामलला को समर्पित बताया था, को लेकर तुकबन्दियों के बाण चलाने लगे। इस क्रम में उन्होंने प्रभु राम को लाने का दावा करने को प्रभु राम का अपमान करार देकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (जिन्हें वे मुख्यमंत्री के बजाय नेता सदन कहते हैं) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्बन्धों के बहुचर्चित अंतर्विरोधों व रिसनों को भरपूर निशाने पर लिया। अखिलेश योगी को नीतियों के बजाय व्यक्तिगत आधार पर घेरने की कोशिश में ही मगन रहते हैं। मिसाल के तौर पर पिछले साल इसी महीने में राज्यपाल के अभिभाषण पर बोलते हुए उन्होंने शे’र पढ़ा था: आंखों पे सियासत का असर देख रहे हैं, किस ओर लगी आग किधर देख रहे हैं! इस बार भी वे अपने उसी रवैये को दोहराते नजर आए।


