Wednesday, February 24, 2021
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Home संवाद रविवाणी देह के करीब होते प्यार का संकट

देह के करीब होते प्यार का संकट

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श्रीप्रकाश शर्मा

अठारह वर्षीया पाखी बारहवीं की परीक्षा पास करने के बाद मैनेजमेंट कोर्स के लिए जब अपने शहर से दूर एक बड़े मेट्रोपोलिटन सिटी में आई तो उसके जीवन और सपनों को  मानो पंख लग गए हों। कुछ दिनों तक तो पाखी अपने  महानगर के रंगीन लाइफ स्टाइल और अनदेखे कल्चर के चकाचौंध में ऐसे पैबस्त रही गोया उसकी आंखें ही बंद हो गर्इं हों। समय इतनी तेजी से पंख लगा कर भागता चला गया कि कॉलेज का एक वर्ष कैसे गुजर गया उसे पता ही नहीं चला। लेकिन गुजरे वर्ष ने पाखी को मुकम्मल तौर पर बदल दिया था। पाखी के हाव-भाव और सोच के ढंग में जमीं आसमान की तब्दीली आ गई थी। छोटे शहर की रहनेवाली पाखी के लिए महानगर की जिंदगी खुले आकाश में बेतहाशा उड़ने की आजादी से कम रोमांचकारी नहीं थी।

बीते साल में ही वह अपने ही क्लास के एक लड़के आदित्य को अपना दिल दे चुकी थी। क्लास से लेकर कॉलेज के कैंटीन, लाइब्रेरी से लेकर कॉलेज के फंक्शन्स-हर जगह पाखी और आदित्य के प्यार की ही चर्चा होती रहती थी। उन दोनों के दिलों में एक-दूसरे के लिए प्यार की जिस आंधी ने करवट ली थी, वह उसके तेज झोंकों में इस कदर बेतहाशा उड़ती रही कि उसे अपने तन-मन की लक्ष्मण रेखाओं के भी बह जाने की सुध नहीं रही।

इस बार गर्मी की छुट्टियों के दौरान जब एक सुबह पाखी अपने घर सोकर उठी तो वह खुद को बहुत असहज महसूस कर रही थी। सिर में चक्कर आने के साथ उसे मितली आ रही थी। पाखी की मां को यह सब बहुत विचित्र-सा लग रहा था और वह कई आशंकाओं के भय से अंदर ही अन्दर सिहर गयी थी। अपने माता-पिता की इकलौती संतान पाखी अपने घर में सुख के शीशमहल में पली-बढ़ी थी। अपनी फूल-सी बेटी को इस प्रकार की अनजानी मुसीबत में देखकर पाखी की मां बहुत घबरा गई। किंतु धीरे-धीरे एक डरावने रहस्य पर से पर्दा उठ गया। मां के पूछने पर जब पाखी ने अपने बॉयफ्रेंड आदित्य के साथ अपनी नजदीकियों को स्वीकार किया तो पाखी के जीवन में आई तबाही का मंजर साफ हो चुका था।

अपने जीवन के इस अजीब मोड़ पर पाखी पहली बार इतना फूट-फूट कर रोयी थी। किंतु तब सिर से पानी गुजर गया था और वह जीवन के जिस मुकाम पर पहुंची थी वहां से यू-टर्न लेना कतई मुमकिन नहीं था।आदित्य को जब पाखी के जीवन के इस अनचाहे संकट के बारे में जानकारी मिली तो वह इस रिश्ते को अपना नाम देने से साफ-साफ इंकार कर दिया। उसके लिए प्यार में इस प्रकार किसी लड़की का प्रेगनेंट होना सामान्य-सी घटना थी। किंतु पाखी के माता-पिता के लिए यह मुसीबत खुली आंखों से देखे गए किसी बुरे सपने से कम भयावह नहीं थी। सामाजिक बदनामी से बचने के लिए उसके माता-पिता पाखी को किसी तरह से इस संकट से बचा तो लिया, लेकिन उसके जीवन में आए इतने बड़े तूफान और उसके गुजर जाने के बाद की तबाही से उसे महफूज नहीं रख पाए। पाखी की मैनेजमेंट की पढ़ाई का सपना अधूरा रह गया और उसकी बिगड़ती मानसिक अवस्था को देखते हुए माता-पिता ने जल्दी ही उसके हाथ पीले कर दिए।

सच पूछिए तो इस कहानी के दो पात्र पाखी और आदित्य ऐसे दो चेहरे हैं जो बहुधा ही मॉडर्न सोफिस्टिकेटिड समाज के कैनवास पर तथाकथित प्यार के आइडियल रोल मॉडल्स के रूप में पेश किए जाते हैं। इस कहानी में पाखी और आदित्य भले ही लेखक की कल्पना के गढ़े हुए दो किरदार हों, किंतु इस सत्य से इनकार करना कदाचित आसान नहीं होगा कि ये दोनों पात्र प्यार के मॉडर्न संस्करण के वैसे दर्पण हैं, जिसमें प्यार के मुतल्लिक वर्तमान सामाजिक परिवेश के कुत्सित आचरण और चरित्र का अक्स साफ-साफ दीखता है।

आज हम इक्कीसवीं सदी के सभ्यता और संस्कृति के तेजी से भागते विकास के जिस दहलीज पर खड़े हैं, वहां सबसे अहम प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि आखिर प्रेम के भाव और अभिव्यक्ति में आई इस विकृति के लिए कौन जिम्मेदार है? इससे भी अधिक अहम प्रश्न यह है कि आखिर प्यार का सच्चा स्वरूप क्या है? और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि समय के साथ आखिर दो प्यार करनेवाले दिलों की मासूमियत धीरे-धीरे गायब क्यों हो रही है?

प्राचीन चीन की एक लोककथा काफी प्रसिद्ध है। कहते हैं कि किसी समय वहां संयोग से तीन नेत्रहीन दोस्तों की मुलाकात हुई। उन दोस्तों में आपस में बातें होते-होते यह चर्चा चल पड़ी कि इस धरती पर हाथी बड़ा ही विचित्र जीव होता है। किंतु तत्क्षण ही वे तीनों यह सोचकर उदास हो गए कि दुर्भाग्यवश नेत्रहीनता के कारण वे सभी मित्र हाथी को देख नहीं सकते हैं। कहा जाता है कि ठीक उसी समय उस रास्ते से एक व्यापारी अपने हाथियों के झुंड के साथ गुजर रहा था। इन तीनों नेत्रहीन दोस्तों की बातों को उस व्यापारी ने सुन लिया और उसने कहा, ‘तुम लोग नाहक हकलान हो रहे हो। तुम्हें आंखें ना हुई तो क्या हुआ-मैं तुम्हें हाथी को देखने में मदद करूंगा और फिर तुम लोग खुद जान जाओगे कि हाथी कैसा जानवर होता है। तुम लोग मेरे साथ चलो।’

वे सभी मित्र व्यापारी के साथ चल पड़े। हाथी के ठहरने की जगह पर वे सभी रुक गए। सभी मित्रों ने बारी- बारी से हाथी के विभिन्न अंगों को स्पर्श किया। पहले मित्र ने हाथी के दोनों पावों को स्पर्श किया तथा अपने मित्रों से कहा है कि हाथी तो बिना शाखाओं वाला पेड़ सरीखा है। दूसरे मित्र ने हाथी के सूंड को थाम लिया और उसे सांप समझने की गलती कर बैठा। तीसरे ने कान छुआ और हाथी को हाथ से हवा करनेवाला पंखा समझ बैठा। हाथी एक तीन दोस्त और निष्कर्ष तीन-और तीनों निष्कर्ष हकीकत से कोसों दूर।

सच पूछिए तो ‘प्यार’ के बारे में व्याप्त गलतफहमी इस कहानी की दुविधा से कम विचित्र नहीं है। भाव एक, उद्गार एक, जज्बात एक, संवेदना एक और प्यार करनेवाले लोग अलग-अलग… और उनके प्यार के प्रति दृष्टिकोण भी बिलकुल भिन्न-भिन्न। प्रेम सरीखे अद्भुत और कुदरती जज्बात के बारे में आम लोगों की जो भी धारणाएं हों, किंतु इस सन्दर्भ में इस सत्य को हम बिलकुल नहीं झुठला सकते हैं कि प्रेम का भाव किसी गूंगे के लिए गुड़ के स्वाद की अभिव्यक्ति सरीखा ही मौन और अव्यक्त होता है। किंतु आधुनिकता और पश्चिमी सभ्यता की देह उघारू संस्कृति की डगर पर अपनी आंखों पर पट्टी बांधे हुए क्षिप्रता से मॉडर्न बनने की राह पर अपने पांव बढ़ाते आज के मानव ने प्यार के सात्विक एवं कुदरती भाव को पूरी तौर पर विस्मृत कर दिया है। प्रेम सरीखे सहज और स्वाभाविक मानवीय भाव को आज जिस आईने से देखा और परखा जाता है, उससे संबंधित  यह प्रश्न उत्तर की तलाश में बार-बार उठ खड़ा होता है कि आखिर प्यार और वासना के मध्य की लक्ष्मण रेखा की नाजुक डोर समय के साथ तेजी से दरक क्यों रही है?

इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के मॉडर्न युग में जहां इंटरनेट के तेज बवंडर में कल्पना के लिए कोई जगह शेष नहीं रह गयी है, वहीं सोशल मीडिया के रूप में फेसबुक, वाट्सएप्प, मैसेंजर, ट्विटर के साथ-साथ इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध अश्लील फिल्मों, ब्लू लिटरेचर ने तन और मन में उठ रहे वहशी विचारों की अग्नि को प्रज्वलित करने में घी सरीखा कार्य किया है। परिणामस्वरूप किशोरों और युवाओं की वर्तमान पीढ़ी समय के पूर्व तन की अपेक्षा मन से अधिक वयस्क हो रही है। इस सत्य से कदाचित इंकार नहीं किया जा सकता है कि इंटरनेट ने मौजूदा माहौल में सेक्स सरीखे वर्जित विषय पर से इस कदर पर्दा उठा दिया है कि मानवीय रिश्तों के कॉन्फिगरेशन में हम सभी पूरी तरह से नग्न हो गए हैं। सिनेमा और साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है और इन दोनों के कथ्य और कहानी के प्लॉट्स ने तन और मन में उठ रहे तपन को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ रखा है।

इलीट परिवार के लिए जहां कल्चर के नाम पर सिनेमा और टेलीविजन पर परोसा जानेवाला यह नंगा नाच उनका लेटेस्ट एटिकेट और मॉडर्न फैशन कहलाता है तो मिडल क्लास फैमिलीज इन सभी दृश्यों के आगे खुद को शर्मसार महसूस करता है। संबंधों की मर्यादा और भावों की पवित्रता का स्तर आज से पहले कभी भी इतना नीचे नहीं गिरा है। आज पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन और संस्कृति- हरण पर हमें बड़ी गंभीरता से सोचने की दरकार है।

प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक हेलेन केलर ने एक बार कहा था, ‘इस दुनिया की सर्वोत्तम और सबसे खूबसूरत शै को न तो देखा जा सकता है और न ही सुना जा सकता है। उन्हें केवल दिल से महसूस किया जा सकता है।’ दुर्भाग्यवश इसके विपरीत प्यार को देखने, सुनने और स्पर्श करने की चाहत में छुपे अंदेशों के बवंडर को हम कभी पढ़ ही नहीं पाते हैं। प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक प्लेटो का मानना था कि प्यार के छुअन के साथ हर कोई कवि बन जाता है। अपने दिलों में प्यार के कोमलतम एहसास को महसूस करना ही कवि बनना होता है। कहते हैं कि प्यार में इंसान और उसके फितरत को बदलने की जादुई ताकत होती है। प्यार के अद्भुत एहसास से इंसान के दिलों में सुलग रहे हिंसा, घृणा, वैमनस्य और अन्य कुत्सित विचारों पर विजय प्राप्त किया जा सकता है।

इसके विपरीत यदि प्यार का भाव व्यक्ति में बर्बरता, क्रूरता और पाश्विक प्रवृत्ति को जन्म देता हो, अपनों के लिए मर-मिटने की बजाय अपनों को ही मारने के लिए उत्तेजित करता हो तो एक बार फिर से हमें अपने दिलों में झांकने की जरूरत है और खुद से यह प्रश्न पूछने की दरकार है कि कहीं यह प्यार किसी के दिल में जगह पाने की बजाय देहभोग तक पहुंचने का नाटक तो नहीं है?


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