Thursday, March 19, 2026
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लाख कोशिशों के बावजूद निर्मल नहीं हो पाई काली

  • आज भी नदी के आसपास के गांवों में आ रहा दूषित पानी
  • काली में फैक्ट्रियों से निकलने वाला दूषित पानी गिर रहा
  • फैक्ट्री संचालकों ने जमीन के नीचे दबाकर बना रखे टैंक
  • 100 फीट से भी नीचे पहुंच चुका पानी, हैंडपंप में आ रहा गंदा पानी

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: भले ही प्रशासन और एनजीओ काली नदी को साफ करने के दावे करते हों, लेकिन हकीकत इससे कोसो दूर है। यहां अभी तक काली नदी में फैक्ट्रियों का गंदा पानी डल रहा है। जिस कारण आसपास के गांवों के लोग भी परेशान हैं लेकिन इसे रोका नहीं जा रहा है। इस प्रदूषित जल के कारण लोग बीमार हो रहे हैं, लेकिन कोई रोकने वाला नहीं है।

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मुजफ्फरनगर के जानसठ तहसील के अंतवाड़ा गांव के जंगल से निकलने वाली काली नदी करीब 300 किलोमीटर का सफर तय कर कन्नौज के पास गंगा में मिलती है। लेकिन, इससे पहले इसमें कई कागज और गत्ता मिल, चीनी मिल, औद्योगिक मिलों का केमिकल युक्त पानी और कस्बों के नालों का गंदा पानी गिरता है, जिससे इस नदी का पानी इसी के नाम की तरह काला हो गया है।

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार काली नदी में जिन उद्योगों का प्रदूषित पानी गिरता है वो 17 सबसे ज्यादा विषैला कचरा छोड़ने वाले उद्योंगों में शामिल हैं। पश्चिमी यूपी के मुज्फफरनगर, मेरठ, बागपत, शामली, गाजियाबाद समेत 8 जिलों के करीब 1200 से अधिक गांवों में यही हाल है। केंद्रीय भू-जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार इस नदी के पानी में अत्यधिक मात्रा में लैड, मैग्नीज व लोहा जैसे भारी तत्व व प्रतिबंधित कीटनाशक अत्यधिक मात्रा में घुल चुके हैं।

इसका पानी पीने तो दूर कपड़े धोने के भी लायक नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार मेरठ के आस-पास 30-35 मीटर नीचे तक की गहराई में भारी तत्व तय सीमा से अत्यधिक मात्रा में पाए गए हैं। काली नदी क्षेत्र से एकत्रित भूजल नमूनों का पीएच 7.0 से 8.2 के बीच पाया गया है, यानी जल अम्लीय है। पीने योग्य पानी का पी एच 7.0 होता है। यहां सैनी गांव समेत कई गांवों में पीने का पानी पीले रंग का निकलता है।

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जिसमें केमिकल होते हैं गांव वाले परेशान हैं, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान होता नजर नहीं आ रहा है। पश्चिमी यूपी के लिए कलंक कही जा रही काली नदी अब नदी कम नाला ज्यादा नजर आती है, जिसमें गाढ़ा काला और बदबूदार पानी बहता है। पर्यावरण के लिए काम करने वाली मेरठ की एक गैर सरकारी संस्था द्वारा 2015-16 में कराए गए एक शोध के मुताबिक हैंडपंप के पानी में लोहे की मात्रा 0.35 भाग प्रति 10 लाख थी, जोकि पानी को लाल भूरे रंग में परिवर्तित करने के लिए पर्याप्त है।

भारतीय मानक पेयजल निर्देशन,1991 के अनुसार, पीने के पानी में सीसा की अधिकतम वांछनीय सीमा 0.05 भागों प्रति मिलियन है। यानि काली नदी के आसपास के इलाकों के पानी में सांस और कैंसर समेत कई बीमारियां देने वाले लैड की मात्रा सामान्य से 10 गुणा ज्यादा है। मवाना रोड स्थित सैनी गांव में देव प्रिया, बोनांजा व आनंद तीन गत्ता फैक्ट्रियां है। इनके द्वारा हर समय जहरीला व केमिकल युक्त पानी उगला जाता है। यह पानी न केवल काली नदी को प्रदूषित करता है बल्कि गांव के भू-जल को भी दूषित कर रहा है। इनके कारण गांव में रहने वाली जनता बीमारियों का शिकार हो रही है, लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं हैं।

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