जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: नगर निगम के पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी तथा परतापुर स्थित कान्हा उपवन गोशाला के प्रभारी डॉ. हरपाल सिंह को सोमवार की आधी रात में जिलाधिकारी द्वारा गठित दो सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया गया। फिर, मंगलवार को उनको अदालत में पेश किया गया, जहां से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने डॉ. हरपाल सिंह को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया।
उत्तर प्रदेश के पशुधन राज्यमंत्री एवं जनपद के प्रभारी मंत्री धर्मपाल सिंह ने परतापुर स्थित कान्हा उपवन गोशाला का औचक निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान तमाम खामियां पाई गई थी। इससे पहले कान्हा उपवन में गोवंशों की दुर्दशा से संबंधित एक वीडियो वायरल हुई थी। कमिश्नर हृषिकेष भास्कर यशोद ने डॉ. हरपाल सिंह के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की थी जिस पर उनको शासन स्तर से सस्पेंड कर दिया गया।
मुकदमे में जांच रिपोर्ट का हवाला
नगर निगम के सफाई एवं खाद्य निरीक्षक तथा कान्हा उपवन गोशाला के प्रभारी अधिकारी कुलदीप कुमार ने सिविल लाइन थाने सोमवार की रात 11.33 बजे डॉ. हरपाल सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट में बताया गया कि जिलाधिकारी डॉ. वीके सिंह कान्हा उपवन गोशाला प्रकरण की जांच के लिए दो सदस्यीय जांच समिति गठित की थी।
जांच कमेटी में शामिल एडीएम सिटी बृजेश कुमार सिंह व मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. संदीप शर्मा ने अपनी जांच रिपोर्ट डीएम को सौंप दी। जांच रिपोर्ट में प्रथम दृष्ट्या तत्कालीन पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी व कान्हा उपवन गोशाला डॉ. हरपाल सिंह को दोषी पाया गया। इसके अलावा अपर नगर आयुक्त द्वारा गठित जांच समिति में मुख्य अभियंता व मुख्य नगर लेखा परीक्षक ने भी अपनी जांच रिपोर्ट में डॉ. हरपाल सिंह को दोषी ठहराया। कान्हा उपवन गोशाला के वर्तमान प्रभारी अधिकारी जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए दर्ज कराए मुकदमे में बताया कि सात शेड में से महज पांच में ही हरा चारा पाया जबकि दो में चारा नहीं था। इसी तरह गोवंशों को चोकर तो डाला गया था, लेकिन दाना नहीं पाया गया। अप्रैल-2024 से मार्च-2025 व अप्रैल 2025, मई-2025, जून-2025 तक के पशु आहार चोकर, भूसा, हरा चारा आदि के स्टॉक रजिस्टर की एंट्री को प्रत्येक दिवस सत्यापित नहीं किया गया। न ही रजिस्टर का गोश्वरा पूर्ण किया गया। इसके अतरिक्त पशु आहार का कोई पर्ची नम्बर अंकित नहीं किया गया है। जबकि अप्रैल-2024 से मार्च-2025 तक का भुगतान भी कर दिया गया।
इसके अतरिक्त अप्रैल 2025 से माह जून 2025 तक का भुगतान प्रक्रियाधीन है। इससे तत्कालीन प्रभारी गोशाला द्वारा घोर वित्तीय अनियमितता बरती गई है। और लोक सेवक होने की दशा में सरकारी सम्पत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग किया गया है। कितनी सामग्री चाहिए, कितनी प्राप्त हुई, कितनी जारी हुई तथा रजिस्टर पर पर्ची नंबर आदि का इंद्राज नहीं करना व कराना, प्रभारी अधिकारी व्यक्तिगत जिम्मदारी होती है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह व्यक्तिगत लाभ के लिए किया गया है। यह पशु क्रूरता अधिनियम व भारतीय न्याय सहिता के अंतर्गत दंडनीय अपराध है।
जेल का आदेश और छलक आए आंसू
सीजेएम नीरज कुशवाल ने जैसे ही अदालत में तत्कालीन पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी डॉ. हरपाल सिंह को बीएनएस की धारा-316 (5) के अंतर्गत जमानत नामंजूर करते हुए न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजने के आदेश दिए तो डॉ. हरपाल सिंह के कदम लड़खड़ा गए। उनकी आंखें नम हो गई। दूसरी ओर, न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजे जाने का आदेश होते ही पुलिस फोर्स ने डॉ. हरपाल सिंह को सुरक्षा घेरे में ले लिया। इसके बाद उनको कड़ी पुलिस सुरक्षा के बीच जिला कारागार में दाखिल किया गया। नगर निगम के सफाई एवं खाद्य निरीक्षक तथा कान्हा उपवन गोशाला के प्रभारी अधिकारी कुलदीप कुमार ने सिविल लाइन थाने पर कान्हा उपवन गोशाला के तत्कालीन प्रभारी अधिाकरी डॉ. हरपाल सिंह तथा केयर टेकर भारत के खिलाफ बीएनएस की धारा (5) व 223 के अलावा पशुक्रूरता अधिनियम 1960 की धारा-11 व 12 के अंतर्गतम मुकदमा दर्ज कराया है। मुकदमा दर्ज होते ही रात में ही सिविल लाइन पुलिस ने डॉ. हरपाल सिंह को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद मंगलवार की दोपहर बाद डॉ. हरपाल सिंह को सिविल लाइन थाना पुलिस ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नीरज कुशवाल की अदालत में पेश किया, जहां से उनको बीएनएस की धारा-316 (5) में 7 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान होने के कारण न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया।
धारा व सजा का प्रावधान
बीएनएस की धारा-316 (5) सरकारी अधिकारी, कर्मचारी द्वारा पद के दुरुपयोग कर संपत्ति का गबन या दुरुपयोग किए जाने पर लगती है। आरोप सिद्ध होने इस धारा में सात साल की सजा और जुर्माना दोनों हो सकते हैं। बीएनएस-223-लोक सेवक द्वारा विधिपूर्वक प्रख्यापित आदेश की अवज्ञा करने पर लगती है। इस धारा में सजा की गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि अवज्ञा के कारण क्या परिणाम हैं। पशुक्रूरता अधिनियम 1960 की धारा-11-पशु को पर्याप्त भोजन, पानी, आश्रय या चिकित्सा सुविधा न देना अपराध है। इसमें दोषी को 10 से 50 रुपये का जुर्माना या तीन साल की सजा का प्रावधान है। पशुक्रूरता अधिनियम 1960 की धारा-12-गाय या अनरू दुधारू पशु पर ‘फंूका’ या ‘डूम देव’ नाम प्रक्रिया करने या ऐसी प्रक्रिया करने की अनुमति देना जो पशु के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हे। इसमें दोषी को एक हजार का जुर्माना या दो साल तक की सजा प्रावधान है।
मुझे षड्यंत्र के तहत फंसाया गया: डॉ. हरपाल सिंह
पूर्व पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी तथा कान्हा उपवन गोशाला के प्रभारी अधिकारी डॉ. हरपाल से अपने खिलाफ दर्ज कराए मुकदमे तथा गिरफ्तारी को लेकर कहा कि उनको षड्यंत्र के तहत फंसाया गया है। निष्पक्ष जांच के बाद ही सच्चाई सामने आएगी। उन्होंने कहा कि वह गोशाला के प्रभारी थे जबबि वरिष्ठ प्रभारी शरद पाल हैं। गोशाला में पशुओं का रखरखाव ठीक था। बारिश के कारण कीचड़ हुई थी। डा. हरपाल सिंह ने कहा कि जिन गोवंश की मृत्यु हुई, वे बीमार थे। उनके उपचार को लेकर किसी तरह की लापरवाही नहीं बरती गई।
कर्मचारियों में भारी आक्रोश
कान्हा उपवन गोशाला के पूर्व प्रभारी अधिकारी डॉ. हरपाल सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने तथा पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने का पता चलते ही नगर निगम के काफी कर्मचारी कचहरी पहुंचे। अदालत परिसर के बाहर कई कर्मचारी ऐसे थे, जो डॉ. हरपाल सिंह से काफी खफा नजर आए। इनका कहना था कि ऐसे अफसर को जेल ही जाना चाहिए। डॉ. हरपाल सिंह के उत्पीड़न से कई कर्मचारी त्रस्त थे। इनमें कई तो ऐसे थे जो जिनका मानसिक उत्पीड़न किया गया था। नगर निगम के इन कर्मचारियों में डॉ. हरपाल सिंह को लेकर काफी नाराजगी देखी गई। इसलिए न्यायालय द्वारा डॉ. हरपाल सिंह को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजने के आदेश होते ही पुलिस फोर्स ने उनको अपने सुरक्षा घेरे में ले लिया।
सचिन सिरोही को देख पुलिस चौकन्ना
कान्हा उपवन गोवंश में आठ गोवंश की देखरेख के अभाव में मृत्यु की वीडियो वायरल होने के बाद से अखिल भारतीय हिंदू सुरक्षा संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सचिन सिरोही डॉ. हरपाल सिंह से काफी नाराज चल रहे थे। वे सिंह की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे। मंगलवार को जब उनको डॉ. हरपाल सिंह को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करने का पता चला तो वह अपने समर्थकों के साथ अदालत परिसर के बाहर जाकर बैठ गए। पुलिस अधिकारियों की जब सचिन सिरोही पर नजर पड़ी तो उन्होंने पुलिस को अलर्ट रहने के निर्देश दिए। पुलिस को अंदेशा था कि कहीं डॉ. हरपाल सिंह को जल ले जाते समय उनके साथ मारपीट न हो जाए।

