Sunday, March 15, 2026
- Advertisement -

शिक्षा माफियाओं के मकड़जाल से विमुक्ति का आसान इलाज

 

Samvad 16

 


अगर किसी मध्यमवर्गीय या निम्न स्तरीय-उच्च वर्ग के किसी मुखिया से बात की जाय तो वह केवल और केवल महंगाई का रोना रोता मिलेगा। उसे आलू, टमाटर, प्याज और नींबू के भाव तो कमरतोड़ लगेंगे मगर पिज्जा, पास्ता और बाकी सारे फास्टफूड ध्यान में ही नहीं आएँगे। उसे कभी यह ध्यान नहीं आएगा कि एक साफ सुथरे ठेले से, मध्यम दर्जे के ढाबे या रेस्टोरेंट में दसियों प्रकार के मिलने वाले चिकन का रेट शानदार स्वाद के साथ विदेशी कंपनियों के कार्नरों में खड़े होकर खाने के लिए मिलने वाले एक से स्वाद के चिकन के रेट से कहीं कम होता है। पिज्जा, बर्गर और अनेक विदेशी फामूर्लों से मिलने वाले चाहे अपने रेट कितना भी बढ़ा दें, उसे महंगे नहीं लगते मगर पेट्रोल, डीजल और बिजली पानी अगर एक रुपया भी बढ़ जाएं तो फिर सरकारों को कोसना और सोशल मीडिया पर कोहराम मचना शुरू हो जाता है।

यह तो हुआ महंगाई का रोना मगर एक चीज जो भारत से लेकर स्थानीय सरकार तक लगभग मुफ्त और वह भी अनेक सम्मानजनक सुविधाओं के साथ उपलब्ध कराती है मगर उसे कुछ दीन-हीन परिवारों के अतिरिक्त कोई लेने को तैयार नहीं है, उस मद शिक्षा पर भारत का एक औसत परिवार शुरुआती शिक्षा पर ही एक बच्चे के लिए चाहे रो झींक कर करे, पचास हजार से एक लाख रुपए सालाना खर्च करने को तैयार रहता है। सोचिये, अगर एक परिवार में दो बच्चे का औसत भी लगा लिया जाय तो कम से कम एक लाख से कुछ अधिक ही प्रति वर्ष उस परिवार को खर्च करना पड़ जाता है। इस खर्च की प्रतिपूर्ति के लिए जब उसे अन्य, विशेषकर खाने के खर्च में कटौती करनी पड़ती है तो उसे महंगाई की मार से कमर टूटती लगने लगती है।

यह कैसी विडंबना है कि कुछ शिक्षा माफियाओं की दुरभिसंधियों से हमसाज होकर अपने आप को देश की सामान्य जनता का प्रतिनिधि कहने वाले, उनके बीच रहने वाले और उनके बीच से चुन कर जाने वाले नेता भी देश की इस समस्या और शिक्षा माफियाओं का जाल नहीं तोड़ पा रहे हैं। इन शिक्षा माफियाओं ने अपने साथ देश की ब्यूरोक्र ेसी को मिला कर अंग्रेजी का एक ऐसा जाल डाल कर जकड़ रखा है जिस से छुटकारा पाने के लिए देश कसमसा तो रहा है मगर इस मजबूती से बुने गये जाल को तोड़ कर निकल ही नहीं पा रहा है क्योंकि सारी ब्यूरोक्र ेसी देश की एकता के नाम पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए सारी सरकारी और गैरसरकारी बैठकें अंग्रेजी में रखते, उनमें अंग्रेजी बोलते और उनकी कार्यवाहियां अंग्रेजी में लिखवा कर भिजवाते हैं जबकि आजकल सामान्यत: इन अंग्रेजी में होने वाली बैठकों में लगभग सभी प्रतिभागी हिंदी जानते, समझते और बोलने में समर्थ होते हैं।

शिक्षा माफियाओं के मकडजाल को न टूटने देने के लिए ब्यूरोक्र ेसी एक और तरह से इनकी सहायता करती है। सारे के सारे टेक्निकल, मेडिकल और यहां तक कि प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के साधारण कोर्स तक अंग्रेजी में होते हैं और माता पिता को अपने बच्चे की उच्च शिक्षा को ध्यान में रखकर बच्चे को गली गली कुकुरमुत्ते की भांति उगे किसी मंहगे अंग्रेजी पब्लिक स्कूल में पढाना पड़ता है ताकि भविष्य में उसका बच्चा एक अच्छी नौकरी प्राप्त कर सके।

इस तरह की कारगुजारियों से देश में एक ऐसा भ्रम फैला दिया गया है कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने से नौकरी की गारंटी होती है । विदेश में नौकरी करने के इच्छुक छात्रों को तो प्रारंभ से अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा दिलायी जाना या फिर इसके लिए उन्हें बाध्य करना उचित है मगर उन बच्चों को जिन्हें देश में ही नौकरी करनी है और आज देश में पिचासी प्रतिशत हिंदी समझने और बोलने वाले लोगों के बीच नौकरी करनी है, एक ऐसी भाषा जिसे देश के केवल दो से पांच प्रतिशत के लगभग लोग अच्छी तरह बोल या समझ सकते हैं, जबरदस्ती पढ़ाने की क्या आवश्यकता है। यह ठीक है कि बच्चे को भविष्य में अंग्रेजी आवश्यकता हो सकती है इसलिए उसे अंग्रेजी का साधारण ज्ञान देकर, उसे अन्य आवश्यक विषयों में पारंगत बनाना देशहित में क्या अधिक उचित नहीं होगा।

अगर गंभीरता से विचार करें तो अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से हम देश को नौकरीपरक शिक्षा दे रहे हैं। रोजगारपरक शिक्षा पर हमारा ध्यान ही नहीं है। इससे पूरे देश की मानसिकता किसी की, कैसे भी मिले नौकरी करने की बन गयी है। इससे देश नौकरीपेशा लोगों का देश बनता जा रहा है। अगर हम अपनी शिक्षा को अपनी भाषा में, रोजगार परक बना कर दें तो देश में कुछ समय बाद हर गली मुहल्ले में छोटे छोटे उद्योगों का जाल बिछ जाएगा और अगर पूरी नहीं तो इनमें नौकरी के माध्यम से देश में बेरोजगारी की समस्या से काफी हद तक छुटकारा मिल जाएगा।

अगर इस मानसिकता पर विचार करें कि सक्षम न होने पर भी माता-पिता अपने बच्चे की पब्लिक स्कूल शिक्षा पर अपनी क्षमता से बढकर पैसा क्यों खर्च करते हैं तो हम मूल में यह पाते हैं कि इस राशि को ब्याज सहित वसूल करने की मानसिकता से ग्रसित होकर इसे इन्वेस्टमेंट के रूप में खर्च करते हैं। आइये इसी मानसिकता को हम दूसरे पहलू से देखने का प्रयास करें तो हमें बड़ी आसानी से शिक्षा माफियाओं और ब्यूरोक्र ेसी के मकडजाल से छुटकारा मिल सकता है। बस हमें इस मानसिकता से कि हम अपने ह्यबच्चे को एक महंगे स्कूल में पढ़ा रहे हैं। से छुटकारा पाना पड़ेगा।

वर्तमान में हर राज्य की सरकारें और केंद्र सरकार भी अपने स्कूलों में हजारों रुपए में नौकरी पर रखे हर विषय के अलग अलग शिक्षक द्वारा, अच्छी क्वालिटी की ड्रेस, किताबें, कापियां और समस्त लेखन सामग्री के साथ नाश्ता और भोजन की भी व्यवस्था कराती हैं अर्थात प्राइमरी से जूनियर शिक्षा तक अभिभावक का एक पैसा भी खर्च नहीं होता। उलटे कुशाग्र और गरीब छात्रों को विभिन्न प्रकार की सहायताएं भी प्राप्त हो जाती हैं। इसके सर्वथा विपरीत इन तथाकथित अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में रोज विभिन्न बहानों से धन उगाही का कार्यक्र म चलता रहता है।

कुल मिला कर अपने दो बच्चों पर एक लाख खर्च का अनुमान लगा शुरूआती सात वर्ष की शिक्षा पर खर्च लगायें तो कम से कम सात लाख रुपए बैठता है। इसके बाद तीन वर्ष तक डेढ़ लाख के गणित से अन्य खर्चो सहित छ: लाख, फिर चार वर्ष तक आठ लाख अर्थात दो बच्चों की कान्वेंट से बारहवीं की शिक्षा पर इक्कीस-बाईस लाख रुपए बैठता है। इसके बाद की शिक्षा पर अगर बच्चा कंपटीशन न निकाल सके तो करोड़ों में बैठता है। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि ये सभी कान्वेंट शिक्षित बच्चे कोई कंपटीशन निकाल ही लें, इसकी कोई गारंटी नहीं है। साधारणत: यह देखा गया है कि साधारण सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चे इन पब्लिक स्कूलों में पढ़े बच्चों से अधिक संख्या में इन कोर्सों में चयनित होते हैं।

अगर हम केवल इन्वेस्टमेंट के दृष्टिकोण से शिक्षा ग्रहण करा रहे हैं तो बच्चे को माध्यमिक शिक्षा तक किसी अच्छे सरकारी स्कूल में पढ़ा कर इस पैसे को इसके बाद किसी टेक्निकल, मेडिकल या प्रोफेशनल कोर्स कराने में खर्च कर सकते हैं या फिर बैंक लोन लेकर कोई छोटी मोटी फैक्ट्री लगवाकर बच्चे को बेरोजगार से रोजगार देने वाला बना सकते हैं और देश को भी प्रगतिपथ पर ले जाने में सहायक हो सकते हैं।

राज सक्सेना


janwani address 37

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

सिलेंडर बिन जलाए रोटी बनाने की कला

मैं हफ्ते में एक दिन आफिस जाने वाला हर...

सुरक्षित उत्पाद उपभोक्ता का अधिकार

सुभाष बुडनवाला हर वर्ष 15 मार्च को विश्व भर में...

पुराना है नाम बदलने का चलन

अमिताभ स. पिछले दिनों, भारत के एक राज्य और कुछ...

IAF Agniveer Vayu: खिलाड़ियों के लिए एयरफोर्स भर्ती, जानें आवेदन शुरू होने की तारीख

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: भारतीय वायु सेना ने अग्निवीर...

Delhi Fire: दिल्ली के नेचर बाजार में भीषण आग, 40 दुकानें जलकर खाक

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: रविवार सुबह दिल्ली के अंधेरिया...
spot_imgspot_img