
मुहम्मद अली बड़े ही सहृदय आदमी थे। बारात विदाई का समय था। उन्होंने चारों तरफ नजर फिराई। लड़की को दिए जाने वाले दहेज का सारा सामान वहां मौजूद था। पलंग, फ्रिज, रसोई के सारे बर्तन, गद्दा-रजाई, घर का सारा फर्नीचर।
फिर गुलफाम मियां के चेहरे पर ये उदासी क्यों पुती हुई है? मुहम्मद अली गुलफाम मियां के थोड़ा और करीब खिसक आए और गुलफाम मियां से बोले, कुछ उदास-उदास से लगते हो? आखिर क्या बात है?
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गुलफाम मियां इस स्नेह और ममत्व से मोम की तरह पिघले-सोचता हूं कुछ छूट तो नहीं गया। सारी चीजें मैं दे तो पाया हूं ना। लगता है कुछ कमी रह गई।
मुहम्मद अली बड़े प्यार से बोले, अब क्या अपना कलेजा काढ़ कर दोगे? हर बाप को ऐसा लगता है कि उसने अपनी बच्ची को कुछ दिया ही नहीं। मैंने तुम कोई जोर नहीं दिया और तुमने मुझे जो भी दिया वो बहुत है।
अपनत्व और प्रेम ओतप्रोत गुलफाम मियां मुहम्मद अली का कंधा पाकर जार-जार रोने लगे। सुबकते हुए बोले, तुम ठीक कहते हो मुहम्मद अली हर बाप को ऐसा ही लगता है कि उसने अपनी बेटी को कुछ दिया ही नहीं। मुहम्मद अली पसोपेश में पड़ गए। ये समझने की कोशिश कर रहे थे कि गुलफाम साहब विदाई के दु:ख से रो रहे थे या कोई और बात थी।
महेश कुमार केशरी


