- 23 को करेंगे किसान गणतंत्र दिवस की परेड का रिहर्सल
जनवाणी संवाददाता |
नई दिल्ली: गण और तंत्र आमने-सामने हैं। ऐसा पहली बार है कि आंदोलिन किसान गणतंत्र की परेड में हिस्सा लेने के लिए अडिग हैं, मगर सरकार है कि किसानों को गणतंत्र परेड का हिस्सा नहीं बनने दे रही हैं। इसको लेकर गण व तंत्र आमने-सामने आ गया हैं।
आगामी आठ जनवरी को फिर से बातचीत होगी, इसमें यदि बात नहीं बनती है तो फिर किसान गणतंत्र परेड में शामिल होंगे, जिसके बाद सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती है। उधर, भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने भी ऐलान किया है कि 26 जनवरी की परेड में शामिल होने से पहले 23 जनवरी को हाइवे पर गणतंत्र परेड के लिए किसान ट्रैक्टरों के साथ रिहर्सल करेंगे।

इसकी तैयारी में किसान जुट गए हैं। किसान तिरंगा लेकर आगे बढ़ेंगे। इस दौरान हालात विकट हो सकते हैं, मगर किसान अपने इस ऐलान पर अडिग हैं। गणतंत्र परेड में शामिल होने वाले कार्यक्रम में किसी तरह की रद्दोबदल नहीं की गई है।
सरकार ऐसी अवस्था में किसानों से कैसे निपटेगी? यह तो वहीं जाने, मगर सरकार के वो दिन मुश्किल भरे हो सकते हैं। किसानों के इस आंदोलन को 41 दिन पूरे हो गए। हालांकि किसानों से सख्ती से निपटने के लिए पूरी तैयारी सरकार ने कर ली हैं। आरएएफ, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल, पीएसी, दिल्ली पुलिस के जवानों की संख्या किसानों के आंदोलन स्थल पर बढ़ा दी गई हैं।

पुलिस भी निभा रही दोस्ती
गाजीपुर बॉर्डर पर पुलिस भी किसानों से दोस्ती निभा रही है। किसानों के कैंप में ही खाना ग्रहण करते हैं तथा वहीं पर नाश्ता किया जाता है। पूरा दिन किसानों के साथ ही ताश के पत्ते भी खेलते हुए पुलिस कर्मियों को देखा जा सकता है। गाजीपुर बॉर्डर पर तो कुछ वैसा ही चल रहा है।
गाजियाबाद जनपद में तैनात कुछ पुलिस कर्मियों व किसानों के बीच खूब दोस्ती रंग ले रही हैं। जनवाणी के छायाकार ने कुछ इस तरह के फोटो कैमरे में कैद भी किये। फोटो खींचने का जैसे ही पुलिस कर्मियों को पता चला, तभी पुलिस कर्मी किसानों के बीच से भाग निकले।

टकराव सरकार चाहती है तो हम भी टकराव के लिए तैयार
भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने कहा कि किसानों ने निर्णय लेकर मंदिरों में गुरुद्वारों में कसम खाकर आंदोलन में किसान आए हैं। बिल वापसी से पहले ये लोग घर वापस नहीं जाएंगे। टकराव सरकार नहीं चाहती तो सरकार सुधर जाए। अपना काम ठीक करें। अगर टकराव सरकार चाहती है तो किसान भी टकराव चाहता है। सरकार गलत फहमी में मत रहे कि कोर्ट से भी निर्णय कराकर किसानों को हटा देंगे।
मैं आगे की बात बता रहा हूं। कोर्ट के खिलाफ हमें नहीं बोलना चाहिए, लेकिन मैं बता रहा हूं कि कोर्ट का भी आॅर्डर आ गया तो भी किसान यहां से नहीं हटेंगे। किसान मर जाएंगे, मगर यहां से वापस नहीं जाएंगे। जैसे इन्होंने कोरोना की वैक्सीन तैयार करने में आठ माह लगा दिये। कोरोना की दवाई तैयार की। यह भी किसान का आंदोलन है। इसकी टेबलेट भी हम ही दे सकते हैं।
हम तिरंगा लेकर परेड में जाएंगे। सरकार झूठ बोल रही है। सरकार कृषि कानून वापस लेगी। संशोधन पर हम बात नहीं करेंगे। भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि कृषि कानून वापसी से कम पर बात नहीं। किसान छाती पर गोली खाएगा, पीठ पर नहीं। जलियावाला बाग में क्या हुआ था? यही तो हुआ था। हम सरकार को चुनौती नहीं दे रहे हैं। बल प्रयोग करों। किसान अब मरने के लिए तैयार है।
आंदोलन पर यदि आंसू गैस के गोले नहीं दागे जाएंगे तो फिर क्या करेंगे? गोले तो चलने चाहिए। हमें जहां दिल्ली पुलिस रोकेगी, वहां पर रुकेंगे। पुलिस प्रशासन हमें रास्ता दे, अन्यथा हम खुद रास्ता बनाना जानते हैं। 21 से ट्रैक्टर आयेंगे। रिहसर्ल 23 को किसान करेंगे। हमारी भी दो माह की तैयारी हैं। गणतंत्र परेड में जाएंगे। किसानों की झांकियां भी परेड में जाएंगे। इसमें टकराव सरकार चाहती है तो इसके लिए हम तैयार है।
| अब तो आर-पार की लड़ाई होगी। इसके लिए किसान तैयार हैं। कृषि कानून तो वापस लेना होगा। फिर से कृषि कानून किसान बैठकर तैयार करायेंगे। इसमें सरकार को प्रतिष्ठा से नहीं जोड़ना चाहिए। किसान अन्नदाता है। ठंड में किसान शहीद हो रहे हैं। मगर, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हो या फिर सरकार के दूसरे मंत्री, कोई भी सांत्वना नहीं दे रहा हैं। बेहद दु:खद है। आगे भी चुनाव हैं। नेता आयेंगे तो गांव में ही, उनसे किसान पूछेंगे कि जब किसान शहीद हो रहे थे, तब उनके पास सांत्वना देने के लिए समय नहीं था। -गौरव टिकैत, राष्ट्रीय अध्यक्ष भाकियू यूथ विंग |

फोर्स किसानों से मोर्चा लेने के लिए तैयार
फोर्स भी किसानों से मोर्चा लेने के लिए तैयार हैं। मंगलवार को बड़ी तादाद में अर्द्धसैनिक बलों को धरना स्थल से थोड़ी दूरी पर तैनात कर दिया गया। फोर्स की गतिविधियां मंगलवार से अचानक बढ़ गयी। दिल्ली बॉर्डर पर आला पुलिस अफसर भी कैंप कर गए हैं। बेरिकेडिंग लंबी लगाई जा रही हैं, ताकि किसानों को दिल्ली कूच करने से रोका जा सके। महिला पुलिस भी व्यापक स्तर पर तैनात कर दी गई हैं।
बुलेट प्रूफ जॉकेट के साथ पुलिस कर्मियों को मोर्चे पर लगा दिया गया है। लोहे की चेन में ताला डालकर बेरिकेडिंग की जा रही हैं, ताकि इसको हटाया नहीं जा सके। भारी वेट के पिलर्स भी हाइवे पर लगा दिये गए हैं। दिन भर इसी काम में पुलिस जुटी थी। यही नहीं, प्रत्येक तीन किमी की दूरी पर बेरिकेडिंग किसानों को रोकने के लिए बनाई गयी हैं। यदि किसान पहला मोर्चा तोड़कर आगे बढ़ते हैं तो किसानों को तीन किमी पर फिर से बेरिकेडिंग मिलेगी, वहां भी फोर्स तैनात रहेगी। इस तरह से सरकार ने प्रत्येक मोर्चे पर किसानों को रोकने की तैयारी कर ली है।
मुसीबत की बरसात और धरनारत किसानों के बुलंद इरादे
पिछले तीन दिन से पड़ रही बारिश ने आंदोलित किसानों की मुश्किले बढ़ा दी है। हाइवे पर तंबू लगाकर किसान आंदोलन के मोर्चें पर डटे हुए हैं, लेकिन बारिश ने आंदोलित किसानों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया हैं। जो रजाई किसानों को कड़ाके की ठंड से बचा रही थी, वह भी पानी-पानी हो गई हैं। तंबू भी गिर गया। ऐसे हालात में ठिठुर रहे किसान ने हौंसला नहीं खोया।
आंदोलन के इस मोर्चे पर किसान बहादुरी के साथ डटा है..खड़ा भी है। इस मुश्किल दौर में भी किसान तनिक भी नहीं टूटा, बस उसका एक ही लक्ष्य है, कृषि कानून की वापसी। इससे पहले किसान बात करने को भी तैयार नहीं है। यदि किसी ने किसान से कृषि कानून पर संशोधन की बात कह दी जाती है तो किसान लड़ने-मरने को तैयार हो जाता है। विपरीत परिस्थितियों में भी किसान कैसे चुनौतियों का सामना करता है।
यह उसका हौंसला ही है जो कष्ट झेलकर भी वह मुस्कुरा रहा है। आंदोलन में युवा और महिलाएं भी हैं, लेकिन 80 बरस पार कर चुके किसान भी आंदोलन का हिस्सा बने हैं। वयोवृद्ध किसानों से घर लौटने की बात यदि आपने कर दी तो समझो, आपसे उनकी मौके पर ही तकरार हो जाएगी। देखिये, तमाम दिक्कत से रूबरू होते हुए भी किसान लंबी लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।
क्योंकि जिस तरह से मंगलवार को हाइवे पर लगाये गए तमाम तंबुओं को वाटर प्रूफ बनाने के लिए किसान जुटे थे, वहीं सड़क पर उनके टेंट में पानी नहीं पहुंचे, इसके भी प्रबंध किये जा रहे थे। बारिश और ठंड से किसान बचकर घर लौट जाएगा, यह सोचना बेकार है। किसान आंदोलन के लिए अडिग हैं। तंबू बड़ी तादाद में क्षतिग्रस्त हो गए हैं। नये वाटर प्रूफ तंबू लगाये जा रहे हैं।
अलाव सेकने के लिए ट्रक भर कर लकड़ी धरना स्थल पर पहुंच गई हैं। उपले भी गांव से आ गए हैं। तमाम चुनौतियों को किसान स्वीकार कर आंदोलन स्थल पर डेरा डाले हुए हैं। तमाम व्यवस्थाओं को देखकर साफ है कि किसान लंबी लड़ाई के लिए आंदोलन में कूदा हैं, जो सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी करने वाला है।

