
उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान कोहरा इतना घना हो जाता है कि कुछ मीटर आगे देख पाना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे हालात में थोड़ी लापरवाही बड़े हादसे का कारण बन सकती है। यमुना एक्सप्रेसवे पर 16 दिसंबर को मथुरा के पास कोहरे के कारण सुबह करीब साढ़े तीन बजे एक भीषण सड़क हादसा हुआ, जिसमें 8 बसें और 3 कारें आपस में टकरा गर्इं। इस हादसे में 13 लोगों की मौत हो गई जबकि 70 से अधिक लोग घायल हो गए। इस हादसे से ठीक दो दिन पहले भी ऐसा ही एक हादसा हुआ। विजिबिलिटी कम होने के कारण यूपी-हरियाणा में एक के बाद एक कई हादसे हुए, जिसमें 12 लोगों की मौत हो गई। इन सभी हादसे की वजह कम विजिबिलिटी बताई जा रही है।
घने कोहरे के मौसम में सड़क सुरक्षा एक गंभीर चुनौती बन जाती है। खासकर उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान कोहरा इतना घना हो जाता है कि कुछ मीटर आगे देख पाना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे हालात में थोड़ी लापरवाही बड़े हादसे का कारण बन सकती है। सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, होने वाले कुल सड़क हादसों में करीब 9 फीसदी सड़क हादसे धुंध की वजह से होते हैं। धुंध की वजह से होने वाले सड़क हादसों में मौतों से दोगुनी संख्या घायलों की होती है। रिपोर्ट की मानें तो करीब कई हजार से ज्यादा लोग घायल हो जाते हैं।
पिछले साल संसद में सड़क परिवहन मंत्रालय ने बताया है कि साल 2019 में कोहरे कि वजह से 35,602 सड़क दुर्घटनाएं हुई, वहीं साल 2020 में 26,541 दुर्घटनाएं दर्ज की गर्इं, साल 2021 में 28,934 दुर्घटनाएं घटीं, तो साल 2022 में कोहरा 34,262 सड़क दुर्घटनाओं की वजह बना।
16 दिसंबर को पंजाब में घने कोहरे के चलते बरनाला व तपा मंडी में हुए दो सड़क हादसों में एक ही परिवार के तीन लोगों समेत पांच लोगों की मौत हुई। वजह वही, घने कोहरे के चलते दृश्यता में कमी और स्थिति का आकलन न कर पाने के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो जाना। विडंबना है कि जब हमने चांद व मंगल ग्रह तक दस्तक दे दी है, तो राष्ट्रीय राजमार्गों व एक्सप्रेस-वे पर यात्रियों के जानमाल की रक्षा के लिए धुंध से मुक्ति की तकनीक क्यों नहीं लगा पा रहे हैं?
बीते 14 दिसंबर कोहरे के कोहराम से 66 वाहनों के टकराने से एक छात्रा समेत चार लोगों की मौत हरियाणा में भी हुई। चरखी दादरी में एक स्कूल बस व रोडवेज की बस की आमने-सामने की टक्कर में एक ग्यारहवीं की छात्रा की मौत हो गई और तीस से अधिक छात्राएं व शिक्षक, बस चालक समेत घायल हो गए। वहीं तेज रफ्तार वाले नेशनल हाईवे 152-डी पर एक के बाद एक, अनेक वाहन दृश्यता की कमी के चलते दुर्घटनाग्रस्त हो गए, जिसमें तीन युवकों की मौत हो गई और 24 से अधिक लोग घायल हो गए। निश्चय ही निर्दोष लोगों का यूं असमय काल-कवलित होना बेहद दुखद ही है। आखिर हर साल जाड़े के दिनों में धुंध या कोहरे की वजह से होने वाले हादसों के लिए हम क्यों अभिशप्त हैं? आखिर इन दुर्घटनाओं को टालने की गंभीर कोशिश सरकार, समाज व वाहन चालकों की तरफ से क्यों नहीं की जाती?
निश्चय ही प्रकृति की लीला का मुकाबला कर पाना संभव नहीं, लेकिन कमोबेश दुर्घटनाओं की संख्या कम करके जान-माल का नुकसान कम करने का प्रयास तो करें। यह सजगता नागरिकों के स्तर पर भी जरूरी है। यात्रा के समय के चयन और धुंध के बीच वाहन चालन में अतिरिक्त सतर्कता की जरूरत होती है। राष्ट्रीय राजमार्ग व एक्सप्रेस-वे पर पर्याप्त रोशनी और धुंध में दृश्यता बढ़ाने के तकनीकी प्रयास किए जाएं। मौसमी बाधा के बीच दुर्घटना का एक बड़ा कारण राजमार्गों के किनारे अवैध रूप से जगह-जगह खोले गए ढाबे भी बनते हैं। दरअसल, होटल-ढाबों के पास वाहनों को अपने परिसर में खड़ा करने की जगह नहीं होती, जिसके चलते ट्रक व अन्य वाहन सड़कों में खड़े रहते हैं। जिसके चलते अक्सर तेजी से आने वाले वाहन दृश्यता की कमी से इन खड़े वाहनों से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने बढ़ते कोहरे के कारण होने वाली सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए सभी जनपदों को विशेष निर्देश जारी किए हैं। ये निर्देश हाल ही में मथुरा के पास एक्सप्रेस-वे पर हुई एक भीषण दुर्घटना के बाद आए हैं।
सड़क हादसों में कमी लगाने के लिए पुलिस और एनएचएआइ की संयुक्त टीम अब खासतौर पर कोहरे के समय रात को लाउडस्पीकर के जरिए वाहन धीरे चलाने के लिए चालकों को जागरूक करेगी और साथ ही वाहन की गति, चालक के वाहन चलाते समय शराब पीने की जांच आदि भी करेगी। ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे और ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे पर घने कोहरे के कारण पिछले एक सप्ताह में दिन के समय ही 100 से अधिक वाहन आपस में टकरा चुके हैं। लगातार हो रही दुर्घटनाओं को रोकने के लिए नोएडा कमिश्नरेट पुलिस ने टोल प्लाजा के नजदीक विशेष पिकेट लगाई है। यहां ड्राइवरों को कुछ देर के लिए रोका जा रहा है, जहां पुलिसकर्मी उनका मुंह धुलवा रहे हैं, ताकि नींद पूरी तरह टूट जाए। पिकेट पर ड्राइवरों को मुंह धुलवाने के बाद गर्मागर्म चाय और बिस्कुट भी दिए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य ड्राइवरों को तरोताजा कर आगे की यात्रा के लिए सतर्क बनाना है।
जानकारों के अनुसार कोहरे के मौसम में सड़क सुरक्षा के नियमों का सख्ती से पालन बेहद जरूरी होता है। कोहरे में वाहन चलाते समय तेज न चलाएं, ओवरटेक करने से बचें, बीच सड़क पर वाहन न चलाएं अचानक वाहन न रोकें। जहां भी सड़क पर वाहन रोकें सड़क के बिल्कुल किनारे संभव हो तो सड़क से नीचे लगाएं। इंडिकेटर लाइट्स जला कर रखें। पारदर्शिता न हो तो वाहन न चलाएं, वाहन को खड़ी कर दें। दृश्यता कम होने के कारण वाहन के पीछे लगा रिफ्लेक्टर एवं पट्टी दिखाई नहीं देती, जिसके कारण दुर्घटना घटित हो जाती है। निर्माण कार्य वाले स्थानों पर रिफ्लेक्टिव बैरिकेड्स, चेतावनी बोर्ड और पर्याप्त लाइटिंग होनी चाहिए। वहीं राष्ट्रीय राजमार्ग पर सड़क किनारे भारी वाहनों को खड़ा करना पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए। इसके बावजूद नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है।
कई अध्ययनों में हादसों की वजह सड़कों के डिजाइन में कमी को भी बताया गया। सवाल है कि जब देश में अच्छी-तेज सड़कों का जाल तीव्र गति से बिछाया जा रहा है तो सुरक्षित सफर सुनिश्चित करना भी तो नीति-नियंताओं की जवाबदेही बनती है? हादसों के लिए सिर्फ चालकों को जिम्मेदार नहीं बताया जा सकता। हां, इतना जरूर है कि वाहन चालकों को गति के साथ मति भी तेज रखनी होगी। यातायात नियमों का पालन करने में एक जिम्मेदार नागरिक का भी दायित्व निभाना होगा। वहीं केंद्र और राज्य सरकारों को भी आग लगने पर कुआं खोदने की मानसिकता से बचना होगा और दूरगामी प्रभावों वाली नीतियां लागू करनी होंगी। जवाबदेही तय होनी चाहिए।

