Sunday, May 17, 2026
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केले की पेड़ी से लें अतिरिक्त आय

KHETIBADI


केला भारत के प्राचीन फलों में महत्वपूर्ण फल है। इसके विविध उपयोग तथा महत्व को देखते हुये इस फल को कल्पतरु का संबोधन भारतीय संस्कृति में किया जाता है। इस पौधे के सभी भागों को किसी न किसी रुप में प्रयोग किया जाता है। केले के फलों की वर्ष भर उपलब्धता और पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा, इसे प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक संपूर्ण पौष्टिक फल बनाने में महत्वपूर्ण हैं।

केले में पुष्पन व फलों का लगना

केले की अगेती किस्मों में रोपाई के 7 से 8 माह में लाल रंग में पुष्प आने लगते हैं। केले के पुष्प में नर व मादा दोनों पाए जाते हैं। केले में पुष्प आने के 6 से 7 माह में केले की फलियां पकने लगती है। केले की रोपाई के बाद पहली फलन लगभग 10 से 12 माह में होती है। केले की दूसरी फलन 12 से 18 माह में प्राप्त होती है। जिस पौधे में एक बार फलन हो जाती है उस पर दोबारा पुष्प नहीं लगते इसलिए पोषक तत्वों के दुरुपयोग से बचाव हेतु फलन के बाद उस पौधे को काटकर गिरा दें। तने को एक ही बार में न काटें। जिससे अधिक मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त कर पत्तियों पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े। केले के घौर कटने के करीब 15 से 20 दिन के अंतराल में दो बार करके तना काटें। जिससे पौधे के जड़ों के पास निकली अधो-भूस्तारी पुत्तियां खुली हवा व पोषक तत्व पाकर जल्दी से विकसित हो जाती हंै।

फल की कटाई

फसल रोपण के 12-15 महीने के भीतर फसल के लिए तैयार हो जाती है और केले की मुख्य कटाई का मौसम सितंबर से अप्रैल तक होता है। विभिन्न प्रकार की मिट्टी, मौसम की स्थिति और समुद्रतल से ऊंचाई के आधार पर फूल आने के 90-150 दिनों के बाद परिपक्वता प्राप्त करते हैं। जब फलियाँ की चारों धारियाँ तिकोनी न रहकर गोलाई लेकर पीली होने लगे तो फल पूर्ण विकसित होकर पकने लगते हंै इस दशा पर तेज धार वाले चाकू आदि के द्वारा घेर को काटकर पौधे से अलग कर लें। कटे हुए गुच्छे को आमतौर पर अच्छी तरह से गद्देदार ट्रे या टोकरी में एकत्र किया जाये और संग्रह स्थल पर लाया जाये। फल पूर्ण विकसित हो जाए और उसमें रंग परिवर्तन दिखाई देने लगे तो पूरे घेर को काट लें।

केले की पेड़ी (रैटून) की फसल

पेड़ी की फसल द्वारा भी उचित प्रबंधन से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। जब मुख्य फसल 7-8 माह की हो जाती है एवं मुख्य फसल में फूल आना शुरू हो तो एक स्वस्थ सकर को पेड़ी की फसल हेतु छोड़ दें। मुख्य फसल के कटाई हो जाने के उपरांत मुख्य फसल के अवशेष को तुरंत साफ करके पेड़ी की फसल हेतु खाद एवं उर्वरक का उपयोग करें। मुख्य फसल के तरह ही पेड़ी की फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने हेतु 250 ग्राम नत्रजन, 150 ग्राम स्फुर एवं 200 ग्राम पोटाश प्रति पौध की दर से दें। नत्रजन उर्वरक को 3 बराबर भागों में बांटकर 30 दिनों के अंतराल पर दें। स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की एक भाग को मुख्य फसल की कटाई के तुरंत बाद पौधों से 40 सेमी की दूरी पर देकर तुरंत गुड़ाई करके मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें और सिंचाई करें। समय-समय पर बगल की सकर को काटकर अलग करते रहें। शेष सस्य क्रियाएं मुख्य फसल की तरह ही अपनायें।

केलों को पकाने की विधि

केलों को पकाने के लिए घेर को केले की पत्तियों, पुवाल अथवा बोरा से ढककर कमरे में बंद कर रख देते हैं। 6 से 8 दिनों में घेर की सभी फलियां पक जाती हैं। केले के घेर को बंद कमरे में 2 से 2.5 मीटर की ऊंचाई पर टांगकर 18 से 24 घंटे तक धुआं देने के बाद बिना धुएं वाले कमरे में रख देते हैं। 2 से 4 दिन में फलियां पक जाती हैं। केले को पहले जहां कैल्शियम कार्बाइड से पकाया जाता था जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही नुकसानदायक होता था। इसी बात को देखते हुए भारत में इस पर प्रतिबंध लगने के बाद अब केले को पकाने का नया आधुनिक वैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल किया जाता है। जिसमे कोल्ड स्टोरेज में एथिलीन गैस की मदद से ये कार्य किया जाता है जो केले को पकाने का एक सुरक्षित तरीका है। ईथीलीन 150-250 पी.पी.एम. के घोल में उपचारित करने पर फल जल्दी व एक साथ पकते हैं।

उपज

उपयुक्त विधि अनुसार केले की खेती की जाए तो प्रति पौधा 20-25 किलोग्राम फल प्राप्त किए जा सकते हैं एवं 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मुख्य फसल से एवं इतनी ही उपज पेड़ी (रैटून) फसल से ले सकते हैं।
-कुमुदनी साहू , डॉ. जी.डी. साहू, सेवन दास खुंटे


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