Saturday, May 21, 2022
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Homeसंवादचला गया कत्थक का ‘दुखहरण’

चला गया कत्थक का ‘दुखहरण’

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घनश्याम बादल |

दुनियाभर में कथक के श्लाघा पुरुष रहे बिरजू महाराजका के निधन से ऐसा लगा मानो साक्षात कथक के नाचते-नाचते पैर रुक गए हों और उन पैरों को ताल देने वाली थाप अचानक मूक हो गई हो। वे बृज मोहन मिश्र से बिरजू महाराज बन गए। यह संगीत घराने की परंपरा है।

एक नाम संस्कार से मिला और एक कर्म से मिला। संस्कार का नाम समय के साथ दब गया और कर्म का नाम कर्म की गति के साथ आगे बढ़ गया। उन्होंने कथक की तकनीकी शिक्षा पिता अच्छन महाराज और चाचा से ग्रहण की। चाचा लच्छू महाराज अपने समय के बड़े कलाकार थे।

उनके पिता दुर्गा प्रसाद मिश्र रामपुर राजा के दरबार में थे। उनसे भी उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला। बिरजू महाराज ने  छह वर्ष की उम्र से रामपुर दरबार में नृत्य किया। चूंकि पिता ने बहुत कम उम्र में साथ छोड़ दिया तो जीवन में संघर्ष का एक नया दौर शुरू हुआ। 14 वर्ष की उम्र में उन्हें मंडी हाउस स्थित कथक केंद्र में नौकरी मिल गई। इसके बाद जीवन धीर-धीरे पटरी पर लौटने लगा।

छह साल की उम्र में उन्होंने घरेलू और बैठकों में कथक करना शुरू कर दिया था। उस जमाने में कलकता में मनमतुनाथ घोष के यहां बड़ी कांफ्रेंस हुआ करती थी। यहां देश के श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित कलाकारों का जमावाड़ा लगा करता था। वहां उनके पिता और चाचा नृत्य कर चुके थे। 14 वर्ष की उम्र में उन्हें भी यहां नृत्य प्रदर्शन का मौका मिला। यहां के प्रदर्शन ने एक ही रात में ही उन्हें हीरो बना दिया।

इस प्रदर्शन की धूम मुंबई तक पहुंची। यह कार्यक्रम उनके लिए जिंदगी का एक निर्णायक मोड़ था। बिरजू महाराज पिता के बाद 12 साल की उम्र में नृत्य सिखाने लगे, बिरजू महाराज को सरोद और वायलिन बजाने का शौक था। नृत्य तो प्रमुख था ही। वो 500 ठुमरी जानते थे। उनके नए-नए क्रिएशन अनगिनत हैं। जिस उम्र में लोग सीखते हैं, महाराज ने सिखाना शुरू कर दिया था।

बचपन में बिरजू महाराज को पतंगबाजी अच्छी लगती थी, पर अम्मा को पतंग उड़ाना और गिल्ली-डंडा खेलना बिल्कुल पसंद नहीं था। अम्मा जिद करके बाबूजी की महफिल में भेजतीं। हाफिज अली खान और मुश्ताक खान जैसे संगीतज्ञों के पास जब कंठ खुलता, तो वो कहते लड़का लयदार है।

शुरू से ही लय, ताल अच्छा रही, यह प्रभु की देन है, पर बाबूजी मना करते थे। बिरजू महाराज का परिवार दरबारी संस्कृति से जुड़ा हुआ था और उनके पूर्वज पूर्वज दरबारी थे। वह नवाब वाजिद अली के दरबार में  थे। उस युग में कथक के विकास को एक नई गति मिली।जब कथक को राज्य  का संरक्षण प्राप्त था। महाराज का कहना था कि तकनीकी ने भी नृत्य को नई दिशा दी है तकनीकी विकास से निश्चित रूप से नृत्य कला और भी संपन्न हुई है।

शास्त्रीय नृत्य के प्रति लोगों का रुझान और तेजी से बढ़ा है। इसमें नित नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। महाराज के अनुसार आज इस बात की  जरूरत है कि इसका इस्तेमाल बहुत संभलकर व सावधानी से किया जाए। तकनीकी प्रयोग के नाम पर नृत्य या संगीत की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।

बिरजू महाराज को इस बात का मलाल था कि नृत्य के क्षेत्र से गुरु शिष्य की समृद्ध एवं भावनात्मक परंपरा का धीरे-धीरे लोप हो रहा है। गुरु-शिष्य परंपरा में भी बाजारवाद हावी हो गया है। बिरजू महाराज ने एक अवसर पर कहा था, ‘अब न उस तरह के गुरु हैं और न ही शिष्य। कोई कामचलाऊ गुरु है तो कोई कॉर्मिशयल गुरु है, जबकि गुरु-शिष्य परंपरा में आत्मा का मिलन होना अत्यंत जरूरी है। यही तत्व इसे आगे तक ले जाता है।’

अपने बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था कि बिरजू कभी गति की ओर नहीं भागा। वह कर्म करता रहा और संगीत के प्रति साधना करता रहा। गुरु के प्रति उनकी अगाध आस्था थी। गुरु ने जो भी सिखाया उसका अभ्यास करते रहे। समय के साथ उनके समर्थकों ने उसे आंखों में बिठाया और बिरजू महाराज बना दिया। 27 वर्ष की अवस्था में अकादमी पुरस्कार मिला। 1984 में पद्म विभूषण सम्मान से तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने सम्मानित किया था।

उन्होंने बिस्मिल्लाह खान, अमीर खान और भीमसेन जैसे सभी बड़े उस्तादों के साथ प्रस्तुति दी। वें  फिल्मों की तरफ नहीं जाना चाहते थे, पर मन को समझने वाले मिलते गए, तो कई फिल्में कीं। सबसे पहले सत्यजीत रे ने यकीन दिलाया कि बाल से पैर के नाखून तक संगीत से छेड़छाड़ नहीं होगी, तभी उनकी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के लिए दो क्लासिकल डांस सीक्वेंस के लिए संगीत रचा और गायन भी किया।

इसके बाद ‘दिल तो पागल है’, ‘देवदास’’, ‘डेढ़ इश्किया’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ में कोरियोग्राफी की। बिरजू महाराज बालीवुड में बड़ी फिल्मों जैसे ‘पाकीजा’, ‘तीसरी कसम’, ‘मुगल-ए-आजम’ आदि फिल्मों में नृत्य का निर्देशन किया। मीना कुमारी और मधुबाला उनकी शागिर्द रहीं। जिस फिल्म में उन्होंने नृत्य निर्देशन किया, वह अमर हो गई। जिस अदाकारा को निर्देशित किया, वह कामयाब हो गई।

बिरजू महाराज अपनी विशिष्ट भाव भंगिमाओं के लिए जाने जाते थे एक बार तो उन्होंने कुर्सी पर बैठकर ही अपने नृत्य की ऐसी भाव भंगिमाएं प्रस्तुत की थीं कि दर्शक अचंभित रह गए थे। अपने अंतिम समय में भी बिरजू महाराज अपनी पौत्री के साथ अंताक्षरी खेल रहे थे वहीं उन्हें सांस की तकलीफ हुई और अस्पताल जाना पड़ा।

किसी को यह उम्मीद नहीं थी कि कत्थक का यह महान कलाकार इतनी जल्दी चला जाएगा। पर सच तो यही है कि आज नाचते-नाचते कत्थक के पैर रुक गए हैं। कत्थक का दुखहरण बिरजू महाराज के रूप में इस लोक से उस लोक  चला गया है। उनका काम हमेशा याद किया जाता रहेगा।

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