Tuesday, March 24, 2026
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इस महंगाई से सरकार को फायदा

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ATVIR SINGHसामान्य परिस्थितियों में ‘बहुत कम वस्तुओं का बहुत अधिक मुद्रा द्वारा पीछा करने’ के कारण होने वाली मांग में वृद्धि की वजह से कीमतों में होने वाली वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं। सरल शब्दों में ‘जब वस्तु एवं सेवाओं की कुल मांग उनकी कुल पूर्ति से अधिक हो जाती है तो कीमतों में वृद्धि होती है। लेकिन वर्तमान स्थिति एक दम उलट है। अर्थव्यवस्था में महामारी और उससे निपटने में सरकार की नीतियों के कु-प्रबंधन के कारण बड़ी मात्रा में लोग बेरोजगार हुए हैं। बेरोजगारी की वजह से लोगों के पास बहुत अधिक पैसा भी नहीं है, जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था मांग की कमी से जूझ रही है। अर्थव्यवस्था में मांग नहीं है, फिर भी मुद्रास्फीति दर बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था जब मंदी से उबर रही है तो मांग बढ़नी चाहिए, कीमत नहीं बढ़नी चाहिए। लेकिन मांग नहीं, बल्कि कीमतों में वृद्धि हो रही है। इसके लिए सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए अपनायी गर्इं नीतियों का कु-प्रबंधन जिम्मेदार है।

सामान्यत: मुद्रास्फीति दर के बढ़ने के दो प्रकार होते हैं-‘डिमांड-पुल’ मुद्रास्फीति और ‘कॉस्ट-पुश’ मुद्रास्फीति। अर्थव्यवस्था में सकल मांग जब सकल पूर्ति से अधिक हो जाती है तो बाजार में वस्तु की कीमतें बढ़ जाती हैं। वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतें निवेश को प्रोत्साहन देती हैं । इससे निवेश बढ़ता है। अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ने से गुणक प्रभावी हो जाता है और आय में निवेश से कहीं अधिक वृद्धि होती है। आर्थिक वृद्धि दर के साथ रोजगार में भी वृद्धि होती है। इससे फिर लोगों की आय बढ़ती है।

बढ़ी हुई आय से लोग फिर और मांग करते हैं, जो कीमतों में वृद्धि के साथ निवेशकों को और अधिक निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करती है। इस तरह अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि का एक गुणात्मक चक्र बन जाता है। लोगों को इससे अधिक कष्ट नहीं होता, क्योंकि मुद्रा स्फीति के साथ-साथ लोगों की आय में भी वृद्धि हो रही होती है। इसे वेज-पुश इन्फ़्लेशन भी कहते हैं। ‘डिमांड-पुल’ मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी मानी जाती है। भारत में 2003 से 2011 के दौरान ऐसी स्थिति रही है। इस दौरान मुद्रास्फीति दर ऊंची होने के बावजूद आर्थिक वृद्धि दर अधिक होने के कारण इतनी कष्टकारी नहीं रही, क्योंकि वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के साथ रोजगार और आय में भी वृद्धि हो रही थी।

‘कॉस्ट-पुश’ मुद्रास्फीति उत्पादन लागत में वृद्धि या पूर्ति में कमी के कारण वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के रूप में परिलक्षित होती है। जब अर्थव्यवस्था में उत्पादन के कारकों की लागत बढ़ जाती है तो इसके परिणामस्वरूप वस्तुओं की उत्पादन लागत बढ़ जाती है जो वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के लिए जिम्मेदार होती है। ‘कॉस्ट-पुश’ मुद्रास्फीति मांग के सापेक्ष रूप से बेलोचदार होने के कारण होती है। इसका अर्थ है कि लोग कीमतें बढ़ने के बावजूद भी वस्तु और सेवाओं की खरीद करते हैं।

यह महंगाई आमतौर पर सरकारी नीतियों की वजह से होती है। मौसमी उठापटक को यदि अलग कर दें तो यह महंगाई चीजों की कमी से निकलती है। सत्तर के दशक में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने के कारण महंगाई में वृद्धि हुई थी। उस समय अर्थव्यवस्था महंगाई के साथ-साथ मांग में कमी से भी जूझ रही थी। 1970 के दशक में पहली बार यह महसूस हुआ कि मांग में कमी के साथ भी महंगाई में बढ़ोतरी हो सकती है।

कॉस्ट-पुश इंफ्लेशन गरीब को और गरीब तथा अमीर को और अमीर बनाने में मदद करता है। कीमत बढ़ने से गरीबों की जीवन जीने की लागत और बढ़ जाती है। जो बाजार के शिखर पर बैठे लोग हैं, वो कीमतें बढ़ाकर अपनी आय में वृद्धि कर लेते हैं और गरीब अपनी जमा पूंजी या बचत को खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं। आज पूरी विश्व अर्थव्यवस्था मांग में कमी के संकट का सामना कर रही है। दूसरे देश अपने नागरिकों को राहत देने के लिए कर की दर में कमी कर रहे हैं, जिससे उनके जीवन जीने की लागत कम हो सके।

मिल्टन फ्रीडमैन और फ्रेडरिक वॉन हयाक के अनुसार अधिकतम महंगाई सरकारें खुद पैदा करती हैं। सरकारें न केवल महंगाई बढ़ाती हैं, बल्कि महंगाई बढ़ाने वालों का साथ भी देती हैं। वर्तमान महंगाई भी किसी मौसमी उठा-पटक की वजह से नहीं है। यदि यूं कहें कि इस समय सरकार द्वारा महंगाई को सुविचारित रूप से जानबूझकर बढ़ाने का प्रयास हो रहा है तो गलत नहीं होगा। इसके लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के संपूर्ण कर ढांचे को समझना जरूरी है।

दुनिया के सबसे खराब कर वो माने जाते हैं जो कीमतों को बढ़ाने को प्रेरित करते हैं। दुनिया के दूसरे देश (कनाडा और यूरोप के देश) महंगाई के इस बुरे दौर में अपने लोगों के ऊपर कर का बोझ नहीं बढ़ा रहे हैं, बल्कि कर के बोझ को कम कर रहे हैं, जिससे कंपनियों के उत्पाद की खपत बढ़ सके। हमारी सरकार दूसरे देशों की तरह कर के बोझ को कम नहीं कर रही है।

भारत का पूरा कर ढांचा महंगाई बढ़ाने को प्रेरित करता है। अप्रत्यक्ष कर पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ाने को प्रेरित करते हैं। भारत की समस्या यह है कि जीएसटी आने के बाद भी भारत का कर ढांचा महंगाई बढ़ाने पर ही केंद्रित है। खपत पर लगने वाले कर दो तरह से लगाये जाते हैं-‘स्पेसिफिक टैक्स’, जो पर-यूनिट (प्रति इकाई) लगाए जाते हैं और ‘एड-वलोरम कर’, जो मूल्य के अनुपात में लगाए जाते हैं।

इस तरह की कर प्रणाली में वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से कर की दर में वृद्धि किए बिना भी सरकार के कर-राजस्व में वृद्धि हो जाती है। भारत में खपत पर लगने वाले अधिकांश कर ‘एड-वलोरम कर’ ही हैं। पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले कर भी ‘एड-वलोरम कर’ हैं। पेट्रोल-डीजल के मूल्य में वृद्धि होने से सरकार की कर आय बढ़ती है, इसलिए सरकारें कभी भी पेट्रोल-डीजल के मूल्य में वृद्धि का कभी विरोध नहीं करतीं। तेल कंपनियां भी कभी कर की बढ़ी दर का विरोध नहीं करतीं, क्योंकि सरकारें जब कर के ऊपर कर लगातीं हैं तो कंपनियों को भी कीमत बढ़ाने की खुली छूट मिल जाती है और वे कर के बोझ को मूल्य में शामिल कर उपभोक्ता की तरफ धकेल देती हैं।

कंपनी की सकल आय पर कर नहीं लगाए जाते, बल्कि लागत निकालकर शुद्ध आय/लाभ पर लगाए जाते हैं। ऊपर से उन्हें कारपोरेट टैक्स में भी राहत दी जाती है। इस प्रकार कंपनियां और सरकार मिलकर महंगाई को बढ़ाने के लिए जिÞम्मेदार हैं। आत्मनिर्भरता के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में जितनी इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाई गई है, वो सब वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के रूप में हमारे सामने आ गई। महंगाई केवल उपभोक्ता के लिए है, सरकार या कंपनियों के लिए नहीं। सरकार और कंपनियों को तो महंगाई बढ़ने से फायदा होता है।

सरकारों से पूछिए कि क्यों अप्रत्यक्ष करों का भार बढ़ाती जा रही है, जबकि कॉरपोरेट करों में कमी कर रही है। यह जानते हुए भी कि अप्रत्यक्ष करों की सबसे ज्यादा मार गरीब-मजदूर वर्ग पर हो रही है। इससे खपत पर नकारात्मक असर हो रहा है। जबकि अर्थव्यवस्था को वर्तमान मंदी के संकट से बाहर लाने के लिए खपत को बढ़ाने की महती आवश्यकता है।
(लेखक सीसीएसयू में अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष हैं)


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