Sunday, March 15, 2026
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हैंडलूम वस्त्र व्यापारी संघ ने उठाया इस आयकर नियम पर सवाल

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: हैंडलूम वस्त्र व्यापारी संघ रजिस्टर्ड का एक प्रतिनिधिमंडल आयकर नियम 43 बीएच के कारण होने वाली व्यापारिक परेशानियों को लेकर सांसद राजेंद्र अग्रवाल से मिला। उन्हें एक ज्ञापन देकर नियम 43 बीएच को सुविधाजनक बनाए जाने की मांग रखी गई।

ज्ञापन की एक प्रति भारतीय जनता पार्टी व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक विनीत अग्रवाल शारदा को भी सौंपी गई। इसके अलावा वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण को ज्ञापन डाक के माध्यम से भेजा गया है। दूसरी ओर इसी संबंध में आयकर आयुक्त से भी प्रतिनिधिमंडल ने भेंट की, और उनके समक्ष भी अपनी परेशानियों को रखा।

मांग रखी गई कि सरकार व्यापार हितों को ध्यान में रखते हुए एकाउंटिंग व टैक्स प्रणाली को सरल बनाए। ऐसे तुगलकी कानून को लागू करने से पूर्व उसकी पूर्ण समीक्षा की जाए। और अनावश्यक नियमों को कम किया जाए। ताकि सभी व्यापारी अपने व्यापार को सुगमता से चला सके।

प्रतिनिधिमंडल में हैंडलूम वस्त्र व्यापारी संघ के प्रधान अंकुर गोयल, महामंत्री गुरदीप सिंह कालरा, विपुल जैन, पंकज बंसल, अनुज रस्तोगी, पूर्व प्रधान नवीन अरोड़ा, विपिन रस्तोगी, राहुल जैन, नीलकमल रस्तोगी समेत व्यापारी संघ के सभी पदाधिकारी व कार्यकारिणी सदस्य शामिल रहे।

इसलिए है आयकर नियम 43 बीएच का विरोध
कोई भी व्यापारी पूरे साल कितना भी लेट पेमेंट करे, क्योंकि वह खरीदे गए माल / ली गई सर्विस का भुगतान उसी वित्त वर्ष में कर देता है, तो धारा 43 बीएच के अंतर्गत कोई पैनल्टी नही बनती। इसलिए कोई भी फायदा एमएसएमई सप्लायर को नहीं मिला। इस नियम के चलते दिसंबर माह के बाद की बिक्री प्रभावित होगी। क्योंकि उधार खरीदने वाला व्यापारी माल ही नहीं खरीदेगा या मार्च माह में रुकी हुई पेमेंट का माल वापस कर देगा।

यदि व्यापारी 31 मार्च तक पुराने पेमेंट करने में असमर्थ हो जाता है, तो उसको पेनल्टी या टैक्स के रूप में जमा करने के लिए अतिरिक धन की आवश्यकता पड़ती है। जो पेमेंट वह व्यापारी को करना चाहता था वह पेमेंट सरकार को टैक्स के रूप में देना पड़ेगा। जिससे व्यापारी का पेमेंट और लेट हो जाएगा।

इनकम टैक्स में इस नियम के तहत किसी भी खर्च का समायोजन उसके दिए गए पेमेंट के वित्तीय वर्ष में होगा। जबकि वास्तविक खर्च सेवा या माल के आने के वितीय वर्ष में होगा जिसकी वजह से व्यापारी की वास्तविक आय उस वर्ष में नहीं दिखाई देगी और अधिक टैक्स का भुगतान करना पड़ेगा।

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