
हेपेटाइटिस बी और सी का नाम प्राय: सभी ने सुना होगा क्योंकि इन बीमारियों की चर्चा बहुत ही होती रहती है किंतु इसकी भयावहता का अंदाजा शायद ही किसी को हो। ये बीमारियां फैलती तो एड्स की तरह हैं लेकिन इसके वायरस एड्स के वायरस से तीन से चार सौ गुना अधिक संक्रमित होते हैं। अगर कोई व्यक्ति हेपेटाइटिस बी और सी वायरस की चपेट में आ जाता है तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। दोनों वायरसों में काफी समानताएं होने के बावजूद एक प्रमुख फर्क यह है कि हेपेटाइटिस ह्यबीह्ण के लिए वैक्सीन बनायी जा चुकी है किंतु हेपेटाइटिस सी के लिए अभी तक कोई वैक्सीन नहीं बनी है।
इस बीमारी के वायरस अन्य वायरस की तरह मुंह के माध्यम से शरीर के अंदर प्रवेश नहीं करते बल्कि इसके चार मु?य कारण हैं। पहला कारण है स्टर्लाइज किए बगैर लगायी गयी संक्र मित सुई (इंजेक्शन), दूसरा संक्र मित रक्त चढ़ाने से, तीसरा गर्भवती रोगी मां से बच्चे में तथा चौथा शारीरिक संबंध बनाये जाने से।इन बीमारियों की चपेट में उन लोगों के आने की आशंका अधिक रहती है जो दवाइयों के सहारे जीवन गुजारते हैं।
एचआईवी एवं सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज से पीड़ित व्यक्ति तथा होमोयोसेक्सुअल व्यक्ति इस बीमारी की चपेट में अधिक आते हैं। थेलसीमिया एवं हीमोफीलिया के मरीजों में जल्दी-जल्दी खून चढ़ाने की जरूरत होती है इसलिए ऐसे मरीज भी जल्द हेपेटाइटिस बी और सी से ग्रस्त हो सकते हैं। इसके अलावा उन डाक्टर एवं नर्सों को भी खतरा बढ़ जाता है जो इनके मरीज के समीप रहते हैं। यह वायरस जब खून के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं तो लिवर में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं और लिवर में रिसाइकिल की प्रक्रि या शुरू कर देते हैं। इससे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता प्रभावित होती है। इसके बाद लिवर की जलन व सूजन के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
हेपेटाइटिस के शुरुआती लक्षणों में थकान महसूस करना और बिस्तर पर लेटे रहने का मन करना, हल्का बुखार, सिर दर्द, गले में खराश, भूख कम लगना, खाने की इच्छा न होना, उल्टी आना आदि प्रमुख हैं। कुछ मामलों में पेट के निचले हिस्से में दाहिनी ओर दर्द व जलन होती है और बाद में पेशाब, आंखों व त्वचा का रंग पीला हो जाना तथा चेहरा सुस्त नजर आने लगता है। आधे से अधिक व्यक्तियों में इस रोग की शुरूआत वायरस की तरह होती है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि फ्लू एक निश्चित अवधि में अपने आप ठीक हो जाता है लेकिन हेपेटाइटिस बी व सी ठीक नहीं होता है। कुछ लोगों में इसके लक्षण लंबे समय में धीरे-धीरे और भिन्न दिखाई देते हैं। हेपेटाइटिस बी और सी की चपेट में आने वाले मरीजों का लक्षण के आधार पर उपचार किया जाता है। यूं तो अधिकतर मरीज ठीक हो जाते हैं लेकिन कुछ मरीज इस बीमारी से उबर नहंीं पाते और फिर वे कैरियर स्टेज में पहुंच जाते हैं जो वायरस को एक मरीज से दूसरे मरीज में पहुंचाते हैं। यह एक खतरनाक स्थिति मानी जाती है।
ऐसे मरीजों को लिवर सिरोसिस और कैंसर तक होने की आशंका रहती है। रोग के चपेट में आने पर शराब व नशीले पदार्थ का सेवन करते रहने से लीवर की बीमारी और भी गंभीर रूप ले लेती है। इस वायरस के चपेट में आते ही चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। हेपेटाइटिस बी व सी से बचाव के लिए आवश्यक है कि खून की जांच से पहले स्क्र ीनिंग करायी जाए। संक्र मित सुई का प्रयोग न करें। अगर पति-पत्नी में से कोई एक हेपेटाइटिस बी या सी के चपेट में है तो शारीरिक संबंध बनाते समय कंडोम का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। जन्म के तुरंत बाद नियमानुसार वैक्सीन लगवा लेना चाहिए।
पीड़ित व्यक्ति को पौष्टिक भोजन करना चाहिए। कार्बोहाइड्रेट वाली चीजें, सब्जियां और घर में निकाले गए जूस का सेवन करना हितकर होता है। इसके अलावा तली-भुनी चीजों को खाने से परहेज करना चाहिए। संपूर्ण हिफाजत और सतर्कता से हेपेटाइटिस बी एवं सी का मुकाबला किया जा सकता है।


