- दावों में हिंदी का विकास, पटेल नगर में भवन का मिट गया इतिहास
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: भले ही हिंदी को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हो, लेकिन हिंदी भाषा ही सबसे बड़े उत्तर प्रदेश में हिंदी को लेकर कोई खास ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
जिसका जीता जागता उदहारण पटेल नगर स्थित पुरुषोत्तम दास हिंदी टंडन भवन है। जिस भवन में कभी हिंदी संस्कृति युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करती थी। आज उसी भवन में मलबा और घासों का ढेर लगा है। जो कभी शहर ही नहीं वरन देश में भी अपनी अलग पहचान रखता है।

भवन के आस पास के क्षेत्रवासियों ने बताया कि 1965 में जब इस भवन का निर्माण था। तब यहा की लाइब्रेरी में चार हजार से अधिक हिंदी की पुस्तके हुआ करती थी।
दूरदराज से भी छात्र-छात्राएं हिंदी का ज्ञान अर्जित कर ने के लिए यहां पर आते थे। यहां से हिंदी का अध्ययन कर पीएचडी कर आज विभिन्न प्रदेशों में हिंदी के प्रोफेसर बनकर युवाओं को ज्ञान दे रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कभी किसी ने भी नहीं सोचा था जो हिंदी भवन अन्य लोगों की जिदंगी में रौनक ला रहा है। कभी वह हिंदी भवन खुद बदहाल हो जाएगा।
दरअसल करीब 40 साल पहले समिति के एक पदाधिकारी ने थापरनगर निवासी अपने एक मित्र को गाय पालने के लिए इस परिसर में जगह दी थी, लेकिन उक्त व्यक्ति ने गायों की संख्या बढ़ाते हुए पूरी डेयरी तैयार कर दी। जब से लेकर अब तक सिर्फ यह पर डेयरी की संचालन हो रहा है।
यहीं नहीं डेयरी के संचालन होने के कारण वहां पर गंदगी का अबार रहता है। जिससे लोंगों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ता हैं।

बता दें कि हिंदी भवन की स्थापना 1965 में हुई थी, जबकि इसका भवन पुराना था, करीब 28 सौ वर्ग जमीन पर बने इस हिंदी भवन की समिति की शहर में अलग पहचान थी, लेकिन समय के साथ हिंदी भवन के रखरखाव में ध्यान नहीं दिया गया और इसका जीवन क्षतिग्रस्त होता गया, फिर धीरे-धीरे उसको ध्वस्त करा दिया गया और अब वहां पर खाली मैदान है, लेकिन हिंदी भवन जाने वाले रास्ते के एक तरफ एक बड़ी डेयरी संचालित है, जिसमें करीब सौ गाय और भैंस बंधी हैं. जबकि अंदर के खाली मैदान में एक आइसक्रीम फैक्ट्री के मालिक ने अपने ठेले खड़े करने शुरू कर दिए है, अब सिर्फ द्वार पर लगे साइन बोर्ड से ही पता चलता है कि यहां पर कभी हिंदी भवन हुआ करता था।
न अधिकारियों को परवाह और न ही समिति को
वर्तमान समय में हिंदी भवन के चारों ओर बड़ी घास और इमारत का मलबा देखने को मिलता है। जहां पर कभी बच्चे हिंदी की किताबों को पढ़कर हिंदी का ज्ञान अर्जित करते थे।
आज उसी हिंदी भवन में गाय और भैंसों की डेयरी चलाई जाती है। पटेल नगर स्थित पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी भवन का नाम कभी हिंदी साहित्यकारों में न केवल चर्चित रहता था, बल्कि इतिहास के पन्नों में भी दर्ज था।

शहर के नामचीन लोग इस हिंदी भवन सोसायटी के पदाधिकारी थे, लेकिन समय के साथ ये भवन न केवल जीर्ण-शीर्ण होकर पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है।
क्षेत्रवासियों की मानें तो इस भवन की स्थिति को सुधारने की बजाय अब कुछ लोग इसे बेचने की फिराक में हैं, जिसकी अच्छी कीमत मिल सके। यहीं नहीं हिंदी भवन की 800 वर्ग जमीन पर भैंसों की डेयरी चल रही है।
जिन अलमारियों में थी किताबें, आज किनारे पड़ी
पटेल भवन स्थित हिंदी लाइब्रेरी में जहां कभी किताबें अलमारियों की शान होती थीं, आज वही अलमारियां टूटकर किनारे पड़ी हुई हैं।
हालात ये हो चुके हैं कि न तो किताबों का पता है और न ही पढ़ने वालों का। ऐेसे में प्रश्न उठता है जब सरकार द्वारा हिंदी को लेकर बड़े बड़े दावे किए जाते हैं तो मेरठ की धरोहर हिंदी भवन मिट्टी में तब्दील क्यों है?
जानकारों की माने तो हिंदी भवन की दुर्दशा पर न तो अधिकारियों की नजर हैं और न ही क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की। पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी भवन केवल नाम का ही रह गया है।
जब धरोहर ही सुरक्षित नहीं, कैसे जागे हिन्दी प्रेम
जब युवा अपनी धरोहर को देखते है तो उनमें उसके प्रति जिज्ञासा उत्पन्न होती है और वह उस जिज्ञासा के सहारे उस धरोहर का अध्ययन करते हैं, लेकिन जब धरोहर को सुरक्षित ही रखा जाए तो युवा उसके महत्व को कैसे जानेंगे।
यहीं कारण है कि आज के युवाओं में हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी का प्रेम देखा जा रहा है। क्योंकि अंग्रेजी विदेशी भाषा होने के बाद भी उसके प्रचार-प्रसार के साथ-साथ उससे संबंधित तथ्य सभी जगह मिल जाते है। वहीं, हिंदी से जुड़े साहित्य व हिंदी से जुड़े तथ्यों को ढूढ़ने व समझने में युवाओं को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। युवा हिंदी बोल तो लेते हैं, मगर लिखने में उनकों परेशानी का सामना करना पड़ता हैं।

