Tuesday, April 14, 2026
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नाम की ‘आशा’, जीवन में सिर्फ ‘निराशा’

  • काम के बोझ तले दब कर रह गई स्वास्थ्य विभाग की महत्वपूर्ण कड़ी

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कहने को तो आशा बहन जी स्वास्थ्य विभाग और समाज के बीच सबसे मजबूत कड़ी मानी जाती है। स्वास्थ्य विभाग की अधिकतर योजनाओं को वो घर घर पहुंचाती है। बच्चों का टीकाकरण हो या फिर उन्हें पोलियो ड्रॉप पिलानी हो। सरकारी अस्पतालों में महिलाओं की डिलीवरी का मामला हो या फिर गर्भवती महिलाओं की एएनसी जांच करानी हो यहां तक कि नवजात शिशुओं की देखभाल यानि कि एचबीएनसी जांच हो।

इन सभी में आशा बहन जी का रोल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। बावजूद इसके स्वास्थ्य विभाग की यह सबसे मजबूत कड़ी काम के बोझ के तले कमजोर हो चली है। आए दिन नई नई सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए भी आशा बहनें ही आगे रहती हैं। इसके अलावा इन्हें हाइटेक बनाने के चक्कर में सारा मामला और पेचीदा हो गया है। काम के बोझ के तले प्रदेश भर में स्वास्थ्य विभाग की यह ‘उम्मीद’ अब ‘ना उम्मीदी’ के ऐसे अंधकार में भटक रही है। जहां से उसे अब नई राह की तलाश है।

मेरठ जिले में लगभग दो हजार आशा बहनें हैं। इनमें कई शिक्षित हैं तो कई बहुत कम पढ़ी लिखी हैं। रामराज (हस्तिनापुर ब्लॉक) की कुछ आशाओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ई-कवच की ट्रेनिंग के बावजूद बहुत-सी आशाएं मोबाइल नहीं चला पातीं। जो काम आशा बहनों को मोबाइल पर करने होते हैं वो काम यह आशा बहनें अपने बच्चों या शिक्षित परिजनों से करवाती हैं।

दरअसल, ई-कवच के तहत इन आशा बहनों को मोबाइल पर दस्तक अभियान से लेकर नई गर्भवती का डाटा अपलोड करना होता है। इसके अलावा एएनसी जांच से लेकर योग्य दंपति व शून्य से पांच वर्ष तक के बच्चों का डाटा भरना होता है। इन सब काम के अलावा डिलीवरी कराना व स्वास्थ्य योजनाओं की पूरी जानकारी घर घर पहुंचाना भी इन्ही के कंधों पर होता है।

काम की ऐवज में मेहनताना मिल रहा बहुत कम

आशा बहनों से काम तो सब लिया जाता है, लेकिन उन्हें मेहनताने के रूप में न के बराबर धनराशि दी जाती है। हस्तिनापुर ब्लॉक की एक आशा के अनुसार उन्हें मासिक 2200 रुपये ही मिलते हैं। इसके अलावा खसरा के टीकाकरण के लिए 100 रुपये तथा बूस्टर टीकाकरण के लिए मात्र 75 रुपये दिए जाते हैं। यदि सरकारी अस्पताल में उन्होंने कोई डिलीवरी कराई तो उसके 600 रुपये अतिरिक्त दिए जाते हैं।

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