Thursday, May 14, 2026
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मरीज नहीं तो ढोती हैं सवारियां अवैध एम्बुलेंस

  • मेरठ टू दिल्ली का मरीज पहुंचाने का रेट 20 हजार तक
  • नहीं होती फिटनेस की चेकिंग, डग्गामार की तर्ज पर सड़कों पर दौड़ रही बेलगाम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: सड़कों पर डग्गामार की तर्ज पर बेलगाम दौड़ रही एम्बुलेंस को मरीजों की कमी पड़े आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, यदि कभी मरीजों की कमी पड़ भी जाती है तो फिर सवारियों की ढुलाई शुरू कर दी जाती है। आसपास ही नहीं बल्कि मोहननगर तक अवैध एम्बुलेंसों से सवारियां ढोने का काम किया जा रहा है। जहां तक मानकों की बात है तो शासन ने जो मानक तय कर दिए हैं, उनको लेकर स्वास्थ्य विभाग के अफसर भी एम्बुलेंसों की जांच से मुंह मोड़े बैठे हैं, जबकि एम्बुलेंस से सवारियों की ढुलाई की बात की जाए तो यह काम पुलिस की सेटिंग गेटिंग के बगैर संभव ही नहीं है।

यहां से उठाते हैं सवारियां

मरीजों के बजाय जिन एम्बुलेंसों से सवारियों की ढुलाई की जा रही है, ऐसी एम्बुलेंस का सबसे बड़ा ठिकाना दिल्ली रोड मेट्रो प्लाजा के सामने लगे डा. आंबेडकर का प्रतिमा स्थल, बेगमपुल पर सांईबाबा का मंदिर, हापुड़ स्टैंड पर बीएबी कॉलेज के फील्ड के सामने, मवाना रोड पर कमिश्नर आवास चौराहा। हैरानी तो यह है कि जहां ये खड़ी होती हैं, वहीं चार कदम पर पुलिस वाले भी खड़े होते हैं, लेकिन क्या मजाल जो कभी रोक-टोक की गयी हो।

भूले हैं चेकिंग करना

मौत से जिंदगी की जंग लड़ रहे किसी भी मरीज के लिए आखिरी वक्त में एम्बुलेंस एक बड़ी उम्मीद होती है। मरीज के लिए जहां से जिंदगी के बचने की उम्मीद होती है, वहां पहुंचाने के लिए एकमात्र एम्बुलेंस ही कारगर साधन होता है। इसी के चलते शासन स्तर से एम्बुलेंस के लिए कुछ बाकायदा गाइड लाइन जारी की गयी है। इस गाइड लाइन में स्वास्थ्य विभाग की एनओसी के अलावा परिवहन विभाग की फिटनेस भी शामिल हैं।

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परिवहन विभाग की जहां तक फिटनेस सर्टिफिकेट की बात है तो यह कैसे हासिल होता है, इसको लेकर ज्यादा कुछ कहने सुनने की अब जरूरत नहीं रह गयी है, आरटीओ कार्यालय के बाहर बैठने वाले दलालों का भीतर कार्यालय में सब जुगाड़ होता है, बस पैसे जेब ढीली करने की दूरी है, सारा काम हो जाता है। जहां तक स्वास्थ्य विभाग की बात है तो स्वास्थ्य विभाग ने कभी एम्बुलेंस की चेकिंग का कोई अभियान चलाया हो, ऐसा लगता नहीं है।

फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने में अनदेखी

अब आरटीओ में एंबुलेंस की फिटनेस कराने से पहले हेल्थ डिपार्टमेंट के निर्धारित चिकित्सा अधिकारी से उसकी जांच करा सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य है, जिसमें चिकित्सा अधिकारी की यह ड्यूटी होती है कि वह फिटनेस के लिए आई एंबुलेंस को चेक कर यह देखे कि उसमें मानक के मुताबिक उपकरण, मेडिसिन समेत अन्य सुविधाएं हैं या नहीं। इसके बाद वह एंबुलेंस को फिटनेस के लिए एनओसी जारी करता है, लेकिन आमतौर पर स्वास्थ्य विभाग को लेकर जो कायदे कानून तय किए गए हैं। उनको पूरा किया गया है या नहीं इसकी अनदेखी की जाती है।

हॉस्पिटल की मान्यता जरूरी

हूटर बजाती सड़कों पर अंधाधुंध भाग रहीं किसी भी एम्बुलेंस के लिए सरकारी स्वास्थ्य प्रतिष्ठान या फिर किसी निजी हॉस्पिटल का सर्टिफिकेट जरूरी है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि एम्बुलेंस से लाए ले जाने वाले मरीज के जीवन मरण का सवाल होता है। शासन ने जो नई गाइड लाइन जारी की है उसमें अब एम्बुलेंस के लिए किसी भी प्राइवेट या सरकारी हॉस्पिटल से अटैच होना अनिवार्य कर दिया है।

कितनों के पास एनओसी

सड़क पर दौड़ रही एम्बुलेंस में कितनी एम्बुलेंस के पास स्वास्थ्य विभाग की एनओसी है, इसकी कभी पड़ताल ही नहीं की गयी। शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि नई गाइड लाइन के अनुसार अब फिटनेस से पहले एंबुलेंस की हॉस्पिटल से मान्यता को भी चेक किया जाएगा। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी एनओसी के बाद ही एंबुलेंस को फिटनेस सर्टिफिकेट दिया जाएगा। इसके बाद यदि एंबुलेंस का कोई मानक अधूरा पाया जाता है या किसी नियम की अनदेखी होती है तो इसके लिए संबंधित अस्पताल जिम्मेदार होगा।

तीमारदार उठाते हैं स्ट्रेचर

स्ट्रेचर को लेकर जो निर्देश शासन स्तर से दिए गए हैं उनका ना तो प्राइवेट और न ही सरकारी एम्बुलेंस में पालन किय जा रहा है। अलबत्ता शहर के जो बडेÞ नर्सिंगहोम हैं उनमें तो इक्का दुक्का में इसका पालन किया जाता हो, लेकिन इस मामले में सरकारी अस्पतालों का रिकार्ड बहुत खराब है। सरकारी एम्बुलेंस में तो आमतौर पर तीमारदार ही स्ट्रेचर उठाते हैं।

मानक पूरे होने जरूरी

एंबुलेंस की फिटनेस के लिए स्वास्थ्य विभाग की चेक लिस्ट के अनुसार मानक पूरे होने जरूरी हैं और अस्पताल द्वारा संचालन का लेटर या संबंद्धता का किसी भी प्रकार का कागज होना जरूरी है ताकि एंबुलेंस संचालन में किसी प्रकार की लापरवाही न हो। -डा. अखिलेश मोहन, सीएमओ मेरठ

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