Saturday, June 15, 2024
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मुनाफे की खेती में फूलों का महत्व

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वर्तमान के संदर्भ में खेती को लाभकारी बनाने के चहुंओर प्रयास किए जा रहे हैं। खेती के कुछ भाग में फल वृक्ष, पशुपालन, मशरूम पालन, मछली पालन करके मिश्रित खेती की ओर कृषकों को आकर्षित किया जा रहा है ताकि मिश्रित खेती की आय से खेती का स्तर घाटे से उठकर मुनाफे की ओर बढ़ जाए। मिश्रित खेती में फूलों की खेती के महत्व और उसका विकास, विस्तार किए जाने की अपार संभावनाएं हैं।

फूलों की खेती आदिकाल से की जाती रही है। जब से सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ तब से फूल का भी अस्तित्व सामने आया। देवता के युग में भी पौराणिक कथाओं में विभिन्न पुष्प और देव विशेष का संदर्भ सभी जानते हैं। विष्णु के हाथ में कमल, शंकर के लिये धतूरा, देवी के लिये जासोन इस प्रकार फूलों का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान में गेंदे के फूल का विस्तार शीघ्रता से हो रहा है।

उसका कारण है कि थोड़ी से रखरखाव में गेंदा अच्छी तरह लगाया जा सकता है। गेंदे के फूलों की मांग माला बनाने के उद्देश्य से अधिक होती है। माला जिसका उपयोग देवी-देवता से लेकर नेता, अभिनेताओं सभी के लिए किया जाना एक आम बात है। माला पहनाकर संबंधों को गहरा बनाने के उद्देश्य से शादी-विवाहों में वरमाला तथा अतिथियों को गले में पड़ी वरमाला बारातियों की पहचान बन जाती है। इसके अलावा संसार से बिदाई के समय में भी यही फूलों का उपयोग परम्परागत है।

फूलों की खेती के लिए हमारी जलवायु-भूमि इतनी उपयोगी है कि गुलाब,गेंदा, ग्लेडीयोलस, रात की रानी, बेला, मोगरा, हरसिंगार, सदासुहागन, लिली, गुलदावदी, रजनीगंधा सभी प्रकार के फूलों की खेती सफलता से की जा सकती है। क्षेत्रफल की दृष्टि से गेंदा का रकबा लगभग 10.38 लाख हेक्टर, गुलाब का क्षेत्र लगभग 2.83 लाख हेक्टर, सेवंती 9.62 लाख हेक्टर, ग्लेडीयोलस 2.67 लाख हेक्टर, रजनीगंधा 5.60 लाख हेक्टर में लगाया जाता है।

उल्लेखनीय है कि सफल गुलाब उत्पादन से 2 से 2.5 लाख रु./हेक्टर, सेवंती जो कि महाराष्ट्र, गुजरात में प्रमुख रूप से अच्छा पैसा देने की क्षमता रखती है। क्योंकि इसकी मांग भी वहां अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक है। हमारे प्रदेश में भी इसका क्षेत्र सतत बढ़ता जा रहा है की कास्त से 1 से 1.50 लाख/ हे. कमाना कठिन काम नहीं होगा। संकर गेंदा से 1.5 से 1.75 लाख/हे. सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। फूलों के राजा गुलाब का सतत विस्तार हो रहा है।

शहरी क्षेत्रों में शायद ही कोई बंगला अटरिया ऐसी हो जहां गुलाब नहीं लगा है। गुलाब की खेती का भी आज अलग इतिहास है मुगलकाल में इस पुष्प की शान-शौकत ही बढ़ गई। मुगल बादशाह अकबर को गुलाब बहुत पसंद था जबसे लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू अपनी शेरवानी में गुलाब लगाना कभी नहीं भूलते थे इस प्रकार गुलाब सदियों में सरताज बना है गुलाब की करीब 25 हजार विभिन्न आकर्षक रंगों की किस्में विश्व में है।

भारत में 6 हजार किस्मों का विस्तार हुआ है। हमें विश्वास नहीं होगा कि बाजार में एक किलो गुलाब के तेल की कीमत लगभग 3-4 लाख रुपये होती है विश्व में कुल गुलाब तेल की मांग उत्पादन से कई गुना अधिक है जबकि वर्तमान में केवल 15 से 20 टन तेल उत्पादन की क्षमता है। फूलों की खेती के विस्तार की अपार संभावनायें हैं प्राकृतिक संसाधन की फूलों की खेती के लिए अनुकूल है। अतएव फूलों की खेती का विस्तार कर खेती को लाभकारी बनाने का मार्ग बहुत आसान है क्योंकि शासन की ओर से भी विभिन्न फूल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिये योजनायें हैं कृषकों को चाहिए कि उनका लाभ उठायें।


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