Tuesday, May 5, 2026
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भारतीय संस्कृति उत्सवधर्मा है

SANSKAAR 1


हृदयनारायण दीक्षित

HARDIYANARAYAN DIXITप्रकाश आराध्य है। दीपोत्सव भारत का प्रकाश पर्व है। भारतीय चिंतन में अंधकार अज्ञान है। प्रकाश ज्ञान का उपकरण है, प्रकाश और ज्ञान पर्यायवाची भी हैं। प्रकाश अमरत्व है, अज्ञान मृत्यु। वृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28) के ऋषि की प्रार्थना है, ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमयेति – हम असत् से सत्, तमम से ज्योति और मृत्यु से अमरत्व की ओर चलें।’ भारत की ज्योतिर्गमय आकांक्षा चिरन्तन है। ऋग्वेद (10.156.4) के ऋषि अग्नि की स्तुति में आ‘दित हैं ‘अग्नि ने अमर सूर्य को जन-जन को प्रकाश देने के लिए ही आकाश में स्थापित किया है।’ प्रकाश सनातन मानवीय आकांक्षा है। अग्नि ज्योतिरूप हैं। ऋषि अग्नि से कहते हैं ‘हे ज्योति स्वरूप! आपको शाश्वतकाल से ही मानवकल्याण के लिए मनु ने स्थापित किया है।’ (ऋ0 1.36.19) ऋग्वेदकालीन ‘मनु’ भरतजनों के आदि पूर्वज प्रतीक हैं।

ज्योति हमारी चिरंतन अभीप्सा है। सो पूर्वजों ने जहां जहां ज्योति पुंज देखे, प्रणाम किया, स्तुतिवाचन किया, दिव्यता की अनुभूति पाई, देवता की प्रतीति मिली।

जहां जहां ज्योतिर्गमय प्रकाश, वहा वहां दिव्यता और वहां-वहां देवता। सूर्य अखण्ड प्रकाश पुंज है। उनका आना ऊषा है, उगना सूर्योदय है, वे सविता देव हैं। प्रकाश किरणों का धरती पर आना सावित्री है। ऋषियों की भावप्रवण स्तुतियों का सविता तक जाना गायत्री कहा गया।

गायत्री छंद भी है। ऋग्वेदकालीन विश्वामित्र ने सविता का प्रकाश देखा, दर्शन किया, ध्यान किया, उनके मुंह से गायत्री फूटी ‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात् – हम बुद्धि को प्रेरित करने वाले सविता देव के वरण करने योग्य दिव्य प्रकाश तेज को धारण करते हैं।’ (ऋ0 3.62.10) प्रकाश दिव्य है। दिव्य प्रकाशक है।

हम भा-रत हैं। भा अर्थात प्रकाश, रत यानी संलग्न। सो सूर्य नमस्कार हमारी संस्कृति है। सूर्य प्रत्यक्ष देव हैं और चन्द्र भी हम चन्द्र को अर्ध्य देकर पूंजते हैं। अंधकार सूर्य से नहीं लड़ पाता।

लेकिन यही अंधकार चन्द्र से लड़ता जान पड़ता है। प्रकाश और अंधकार का संघर्ष सनातन है। पूर्णिमा के दूसरे ही दिन से चांद घटने लगता है और अमावस तक रोजाना घटता है। अमावस परिपूर्ण तमस रात्रि है। अगले दिन से अंधकार पिटता है, प्रकाश बढ़ता है, 15 दिन बाद पूर्णिमा आती है।

पूनो (पूर्णिमा) का चन्द्र अपनी पूरी आभा, प्रभा दीप्ति और प्रीति के साथ खिलता है। भारत ने प्रत्येक पूर्णिमा को उत्सव बनाया। अषाढ़ पूर्णिमा का चन्द्र बादलों से ढकता है। लेकिन उन्मुक्त चमकता है सो इस रात गुरू पूर्णिमा। श्रावण की पूर्णिमा रक्षाबंधन होती है लेकिन शरद् चन्द्र का क्या कहना?

आसमान में बैठा शरद् चन्द्र धरती की प्रीति में अमृतघट उलीचता है, भारत ने शरद् पूनो के चन्द्र को बहुत ज्यादा प्यार किया है। शरद् पूर्णिमा का प्रकाश – रास बनता है। शरदकाल वैदिक ऋषियों की प्रीति रहा है। वे सौ शरद् जीने के अभिलाषी थे – जीवेम शरदं शतं। सौ शरद् देखना भी चाहते थे – पश्येम शरदं शतं।

15 दिन बाद आने वाली कार्तिक अमावस्या का अंधकार बाकी अमावसों से ज्यादा गाढ़ा और गहरा है। शरद् पूर्णिमा की रात रस, गंध, दीप्ति, प्रीति, मधु, ऋत और मधुआनंद तो 15 दिन बाद झमाझम दीपमालिका। भारत ने इसी तमस् रात्रि को प्रकाश पर्व बनाया। जहां जहां तमस् वहां वहां प्रकाश-दीप। शरद चन्द्र का झकास-प्रकाश प्रकृति की अनुकम्पा है लेकिन दीपोत्सव मनुष्य की कर्मशक्ति का रचा गढ़ा तेजोमय प्रकाश है।

कार्तिकी अमावस का अंधकार प्रकाश की अनुपस्थिति ही नहीं होता। यह अस्तित्वगत होता है, अनुभूति प्रगाढ़ हो तो पकड़ में आता है। हमारे पूर्वजों ने इसी रात्रि अवनि अम्बर दीपोत्सव सजाये। भारत इस रात केवल भूगोल नहीं होता, राज्यों का संघ नहीं होता, इस या उस राजनैतिक दल द्वारा शासित भूखण्ड नहीं होता।

भारत इस रात ‘दिव्य दीपशिखा’ हो जाता है। वातायन मधुमय होता है। शीत और ताप का प्रेम प्रसंग चलता है। घर, आंगन, तुलसी के चैबारे, गरीब किसान के दुवारे, खेत खलिहान, नगर, गांव, मकान, दुकान, ऊपर नीचे सब तरफ दीप शिखा। दीपोत्सव में अगड़े पिछड़े के विभाजन बेमतलब हो जाते हैं।

‘दीपशिखा’ का मूल स्वयं का विसर्जन है। तुलसीदास भी ‘दीपशिखा’ पर मोहित थे। उन्होंने श्रीराम चरितमानस में दीप शिखा का प्यारा रूपक बनाया है। वे सात्विक श्रद्धा को गाय बताते है, जपतप नियम को गाय का चारा। फिर इस गाय से परम धर्ममय दूध निकालते हैं। निष्काम भाव की अग्नि पर उबाल कर धैर्य आदि भावों से ठंढ़ा कर दही बनाते है। इस दही से ‘मुदिता मथै विचार मथानी’ के जरिए मक्खन निकालते हैं।

इस मक्खन को योग अग्नि पर गरम कर ‘ज्ञान घृत’ पाते हैं। चित्त के दिया (दीपक) में इस घी को डालते है। तीन गुण तीन अवस्थाओं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) से परे ‘तुरीय अवस्था’ की बाती सजाते हैं। यह दीपक विज्ञानमय है – एहि विधि लेसे दीप, तेज राशि विज्ञानमय।

फिर कहते हैं ‘सोहमस्मि इति वृत्ति अखण्डा/दीपशिखा सोई परम प्रचण्डा।’ (रामचरित मानस, उत्तरकाण्ड) दीपशिखा के प्रकाश में जीव ब्रह्म हो जाता है, ‘आत्म अनुभव सुख सुप्रकाशा।’ तुलसी के सौन्दर्यबोध (बालकाण्ड) में भी दीपशिखा है ‘सुन्दरता कहु सुन्दर करई/छविग्रह दीपशिखा जनु बरई।

दीपशिखा भारत का मन है। दीप मालिका भारत के मन की दीपशिखा है। यह ‘दीप शिखा’ सृष्टि सृजन की प्रथम मुहूर्त से ही प्रकाश दे रही है। आपके उत्सव में यह मिट्टी के दीपक की लौ है।

इस दीप की एक काया है, बाती है, तेल है और प्रकाश पुंज अग्नि हैं। दीपक अपना हृदय-स्नेह (तेल) उड़ेलता है, बाती जलाता है। अंधकार से लड़ता है, प्रकाश देता है। वह अपने नीचे के अंधकार की परवाह नहीं करता। दीपक के नीचे अंधेरा रहता है लेकिन दूसरों का तमसावृत पथ प्रकाशवान होता है।

दीपपर्व लक्ष्मी आराधना की भी मुहूर्त है। लक्ष्मी धन की देवी हैं। वे धन देती हैं, समृद्धि देती हैं, ‘शुभ लाभ’ देती हैं। पश्चिमी अर्थशास्त्र में उद्यमी को साहसी बताया गया है। वह साहस करता है, कारखाना वगैरह लगाता है। लाभ उद्यमी के साहस का प्रतिफल है। ‘शुभ लाभ’ भारतीय चिन्तन का विकास है।

लाभ में श्रमिक का शोषण, टैक्सचोरी और भ्रष्टाचार भी शामिल है। ‘शुभ लाभ’ ईमानदार उद्यमी का हिस्सा है। लेकिन आधुनिक बाजारवाद में मुनाफा ही ब्रह्म है। पुराणों वाले कुबेर धनदाता है और बहुरूपिया हैं। भारत की मुद्रा का नाम भी रूपया है। रूपया का अर्थ प्यारा है। रूपया बना है – रूप या से।

इसका अर्थ है – जो रूपवान है, वह रूपया। रूप सिक्के का या कागज का लेकिन इसकी शक्ति बड़ी है। रूप के पीछे छुपा अरूप की ज्यादा शक्तिशाली है।

दीप-उत्सव का दीप प्रकाश पुंज है और उत्सव है अतिरिक्त आनंद का अतिरेक। उत्सव बड़ा प्यारा शब्द है। इसका अर्थ है उत्स-मूल से उगना। सम्पूर्णता या ब्रह्म का केन्द्र है उत्स। उत्सव इसी केन्द्रक का उफनाया आनंद है। बाजारवाद ने उत्सवी भावनाओं को बाजारवादी बनाया है। अब उत्सव का मतलब खरीददारी है, खरदीदारी ही उत्सवधर्म है।

उत्सव उल्लास नहीं रहे। पहले उत्सव की खबर ऋतु देती थी, माह और तिथि उत्सवों की सूचना थे, अब उत्सव की खबर अखबारी विज्ञापन देते हैं। वस्तुएं उत्सव का विकल्प बनती है। बाजार में मादक क्रान्ति है। लेकिन क्रयशक्ति घटी है। करें तो क्या करें? कभी खील बतासा ही गहन मिठास के पर्व प्रतीक थे, अब बड़ी बड़ी कम्पनियों के लोक लुभावन पैकेज हैं।

ठंढी गरम बियर के खरीद निमंत्रण है। आदमी सस्ता है, बाकी सारा सामान महंगा। बाजार ने त्योहारी खरीददारी को स्टेटस सिम्बल बनाया है।

जिसने खरीददारी नहीं की, वही उत्सव से बाहर। भारतीय संस्कृति उत्सवधर्मा है। यह हर दिन पावन और हर तिथि सुहावन है। शुभकामना है, दीपावली भारत के जन गण मन को दीप्ति दे, आलोक दे, ज्योतिर्मय आभा दे, दीपशिखा की प्रभा दे। आत्मबोध दे, इतिहास बोध दे – मृत्र्योमां अमृतो गमय।


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