Monday, April 20, 2026
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नशा, नींद और मौत की रफ्तार

Samvad


sonam lovevanshiदिल्ली में नए साल की पहली सुबह बेकाबू रफ़्तार और सड़क हादसा एक मासूम लड़की की मौत की वजह बन गया। आखिर कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है कि एक लड़की को टक्कर मार दे और 13 किलोमीटर रोड पर घसीटते रहे। जब तक लड़की की जान न निकल जाए। उसे गाड़ी के टायर में फंसाकर मरने को मजबूर कर दे! इंसानियत को शर्मसार करने वाली यह घटना हमारे सभ्य समाज में कई सवाल खड़े करती है कि आखिर पुलिस प्रशासन को इस घटना की भनक क्यों नहीं लगी? या फिर पुलिस आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है? वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि दिल्ली की सड़कें महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हैं। तभी तो एक लड़की घर से काम के लिए निकलती है, अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाती है और उसे इस तरह बेरहमी से मार दिया जाता है। इस घटना पर चाहे जितनी राजनीति हो लेकिन सच तो यही है कि हमारे देश में सड़क पर निकलना सुरक्षित नहीं है। आए दिन न जाने कितनी जान सड़क हादसों में चली जाती है। तमाम सुरक्षा इंतजामों के बावजूद भी लोग सड़कों पर मरने को मजबूर हों तो सवाल उठना लाजिमी है।

भारत में सड़क हादसों में होने वाली मौत चिंता का सबब बनती जा रही हैं। कभी तेज रफ़्तार, तो कभी नशे में गाड़ी चलाना या फिर सड़क के गड्ढे युवाओं की मौत की वजह बन रहे हैं। विकास के रथ को बढ़ाने वाला पथ जब मौत की वजह बनने लगे तो सरकार और समाज दोनों की ही जिम्मेदारी बनती है कि सड़क हादसों पर लगाम लगाने वाले उपायों पर अमल करें।

आखिर क्यों हमारे देश में सड़क हादसों पर लगाम नहीं लग रही है? सड़कें हमारी अर्थव्यवस्था का आधार है, जब सड़क पर ही मौत का तांडव होने लगे तो फिर अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर विराम लगना तय है। भारत में हर रोज 415 लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं। कानून की सख्ती और भारी भरकम जुर्माना होने के बावजूद लोग सड़क सुरक्षा को हल्के में लेते हैं। खासकर युवावर्ग कानून को अनदेखा कर देता है और हादसे का शिकार हो जाते हैं।

किसी भी देश का युवावर्ग ही देश को तरक़्की की राह पर ले जाने का जज्बा रखता है, लेकिन जब वही हादसे का शिकार होने लगे तो चिंता होना स्वभाविक है। वैश्विक पटल पर देखें तो प्रतिवर्ष 13 लाख लोग सड़क पर अपनी जान गंवाते है। जबकि 5 करोड़ लोग घायल या फिर अपंग हो जाते है। एक रिपोर्ट की मानें तो साल 2020 में सड़क हादसों की चपेट में 18-45 साल के आयु के युवाओं का हिस्सा 69 प्रतिशत था। जबकि 18-60 वर्ष के कामकाजी आयु वर्ग के 87.4 प्रतिशत लोग सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हुए। रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि सबसे ज्यादा कामकाजी लोग सड़क दुर्घटना का शिकार होते हैं।

भारतीय सड़कों पर तेज रफ़्तार, महंगी गाड़ियां हो या फिर हवा से बात करती मोटरसाइकिल। मौका मिलते ही हर कोई सुरक्षा नियमों को ताक पर रखते हुए नजर आ जाएंगे। आधी रात के बाद हाईवे हो या शहर की सड़कें, इन पर बड़े वाहन की तेज रफ्तार आम बात है। वहीं बडे शहरों के छोटे बच्चे भी जान जोखिम में डालकर रोड़ पर निकल जाते हैं। जिनके लिए कहीं कोई नियम कानून नहीं होते। ऐसे हादसों में कई घरों के चिराग तक बुझ जाते हैं। फिर भी इन हादसों से कोई सबक नहीं लेता।

हमारी सरकार सड़क सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां होती है। यही वजह है कि दुनियाभर में सड़क दुर्घटनाओं में 11 प्रतिशत मौतें भारत में होती हैं। भारत विश्व में सड़क दुर्घटना के मामले में दूसरे पायदान पर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट से भी यह बात साबित होती है।

पिछले साल ओवरस्पीडिंग के कारण 87,050 लोग, लापरवाह ड्राइविंग के कारण 42,853 लोगों की जान चली गई। भारत में हर 4 मिनट में सड़क हादसे में एक मौत हो जाती है। आंकड़ों की मानें तो प्रति हजार वाहनों पर मृत्यु की दर बढ़ रही है। यह 2019 में 0.52 और 2020 में 0.45 थी, लेकिन 2021 में बढ़कर 0.53 हो गई। जो कि 2022 में ओर अधिक बढ़ गई। भारत में केंद्रीय सड़क और राजमार्ग मंत्रालय ने सड़क सुरक्षा संबंधी कई उपाय किए हैं।

उनमें सुरक्षित बुनियादी ढांचे को प्रोत्साहित करने से लेकर जागरूकता पैदा करना, सुरक्षा कानूनों का प्रवर्तन, सड़क सुरक्षा सूचना का डेटाबेस तैयार करना तक शामिल है। लेकिन बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं ने इन सारे उपायों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। वजह है कि इन उपायों का पालन ठीक से नहीं कराया जा रहा है। कठोर कानून के बावजूद लोगों को उसका भय नहीं सताता, जिसका परिणाम प्रतिदिन सैकड़ों सड़क हादसों के रूप में सामने आता है।


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