Thursday, May 28, 2026
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क्या धर्म से मुक्ति संभव है?

Samvad 51


ROHIT KAUSHIKइस दौर में प्रगतिशील, वामपंथी और अंबेडकरवादी बुद्धिजीवियों द्वारा धार्मिकता को बहुत बड़ा अपराध बना दिया गया है। इन बुद्धिजीवियों के अनुसार जो व्यक्ति धार्मिक है, वह प्रगतिशील नहीं हो सकता। ऐसे बुद्धिजीवियों का मानना है कि धार्मिक व्यक्ति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा हो ही नहीं सकता। सवाल यह है कि क्या वैज्ञानिकों में पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है? कटु सत्य यह है कि ज्यादातर वैज्ञानिकों में पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता है। ज्यादातर वैज्ञानिक, इंजीनियर और डॉक्टर पूजा-पाठ करते हैं। विज्ञान की पृष्ठभूमि से आने वाले और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिमायती ज्यादातर बुद्धिजीवी अपने घर या संस्थान का उद्घाटन पंडित जी से शुभ मुर्हत पूछकर कर ही करते हैं। मैंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले ऐसे लोगों को भी देखा है जो सारी उम्र नास्तिक रहे लेकिन जब असाध्य रोग के शिकार हुए तो न सिर्फ ईश्वर का नाम लेने लगे बल्कि पंडितों के चक्कर भी लगाने लगे। तो क्या ऐसे सारे लोग मूर्ख हैं? क्या कारण है कि विज्ञान के इस युग में धार्मिकता का भाव अपनी जगह बनाए हुए है? सवाल यह है कि क्या हमारा जीवन पूरी तरह धार्मिक चेतना से मुक्त हो सकता है?
अगर इस मुद्दे पर व्यावहारिकता के साथ विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि संपूर्ण विश्व में अधिकतर लोग धार्मिक हैं। काफी समय से पूरे विश्व में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। इसके बावजूद विश्व में नास्तिक लोगों की संख्या कम है। आस्तिकता और नास्तिकता को लेकर लगातार वाद-विवाद होते रहते हैं। इन विवादों का कोई सर्वमान्य हल सामने नहीं आता है। दरअसल हमारे चेतन और अवचेतन मस्तिष्क को हमेशा एक सहारे की जरूरत होती है। यह मानवीय प्रवृत्ति है कि हम हमेशा एक अनजाने डर के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं। इस डर को दूर करने के लिए हमें एक अवतार की जरूरत होती है और ईश्वर, अल्लाह या गॉड के रूप में हम इस अवतार को तलाश लेते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति को भी इस अवतार की जरूरत पड़ती है। भारत में ही नहीं बल्कि सभी देशों में यह प्रवृत्ति पाई जाती है। आस्था और विज्ञान विपरीत दिशाएं हैं। यह सही है कि विज्ञान ने जीवन और ब्रह्मांड के सभी रहस्य खोल कर यह बता दिया है कि कि संसार में सब कुछ वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के अन्तर्गत ही चल रहा है। इसके बावजूद व्यावहारिक रूप से हमारी जिंदगी न तो सिर्फ विज्ञान के अनुरूप चल सकती है और ही सिर्फ आस्था के भरोसे। हो सकता है कि आप इसे विरोधाभास कहें, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस विरोधाभास का नाम ही जिंदगी है।

यह देखा गया है कि अध्यात्म से हमें मानसिक शांति प्राप्त होती है। बुजुर्ग लोग तो अध्यात्म के सहारे ही जीवन की नैया पार लगाते हैं। यह विडम्बना ही है कि इन बुद्धिजीवियों ने आध्यात्मिकता पर सवाल उठाने के साथ ही हमारी संस्कृति के प्रत्येक पक्ष पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए है। संस्कृति का अर्थ केवल धार्मिकता नहीं होता है। लोक के बहुत सारे तत्व भी संस्कृति में समाहित होते हैं। बाबा रामदेव के विरोध एवं आलोचना तक तो बात समझ में आती है लेकिन जब ये बुद्धिजीवी योग को भी मजाक का विषय बना देते हैं तो आश्चर्य होता है। योग हमारी संस्कृति का महत्त्वपूर्ण घटक रहा है। इस दौर में ऐलौपेथी के डॉक्टर भी योग करने की सलाह दे रहे हैं। इसलिए इन बुद्धिजीवियों द्वारा योग की आलोचना करना समझ से परे है। हमारे पूर्वज धार्मिक थे लेकिन वे ज्यादा ईमानदार और धैर्यवान थे। क्या हमने कभी धार्मिक होने की वजह से उनकी आलोचना की है? यह सही है कि धार्मिक पांखड हमें आगे नहीं बल्कि पीछे ले जाते हैं। जब हम धर्म के नाम पर पागल होने लगते हैं तो सबसे ज्यादा नुकसान हमारा ही होता है। जब ‘मनु स्मृति’ जैसे ग्रन्थों में जातिगत असमानता को बढ़ाने वाली और मानवीयता के विरुद्ध कुछ बातें लिखी जाती हैं तो धर्म की प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा होता ही है। दरअसल हर विचार, सिद्धान्त या प्रक्रिया के साथ कुछ विसंगतियां जुड़ जाती हैं या किसी स्वार्थ के लिए जानबूझकर जोड़ दी जाती हैं। ये विसंगतियां ही समस्या का कारण बनती हैं। धर्म भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं है।

आज धार्मिकता पर सवाल उठाने वाले बुद्धिजीवी अपने बच्चों की शादी-ब्याह या बुजुर्गों की मृत्यु पर धर्म के अनुसार ही सारे कर्मकांड करते हैं। यहां तक कि ऐसे युवा बुद्धिजीवी भी अपनी शादियों में सारे धार्मिक कर्मकांड करते हैं। इसमें कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन ऐसे अपवाद बहुत कम हैं। जब प्रेम विवाह जैसे मुद्दे पर या संपत्ति विवाद के कारण परिवार से विद्रोह किया जा सकता है तो क्या ऐसे बुद्धिजीवी धार्मिकता के मुद्दे पर परिवार से विद्रोह नहीं कर सकते हैं? वास्तविकता यह है कि ऐसे प्रगतिशील, वामपंथी और अंबेडकरवादी बुद्धिजीवी आज तक ईश्वर को अपने घर से बाहर नहीं निकाल पाएं हैं। ऐसे लोग यह प्रदर्शित हैं कि वे स्वयं धार्मिक नहीं हैं, लेकिन जब उनकी पत्नी या बच्चे पूजा-पाठ करते हैंं तो उसमें उनकी सहभागिता रहती है। क्या ऐसे लोग अपनी पत्नी और बच्चों को धार्मिकता और वैज्ञानिकता के बारे में नहीं समझा सकते हैं ? ऐसे लोगों से जब इस मुद्दे पर सवाल पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि हम स्वयं तो धार्मिक नहीं हैं लेकिन परिवार में एक-दूसरे की भावना का सम्मान करना चाहिए। इसलिए हम अपनी पत्नी और बच्चों की भावना को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते हैं। यही कारण है कि ऐसे बुद्धिजीवियों की नास्तिकता में भी कहीं न कहीं आस्तिकता विद्यमान रहती है। सवाल यह है कि क्या पत्नी और बच्चे आपकी भावना का सम्मान करते हुए पूजा-पाठ नहीं छोड़ सकते हैं? जब आप अपनी पत्नी और और बच्चों में धार्मिकता के खिलाफ वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित नहीं कर सकते हैं तो फिर इस मुद्दे पर अपने भाषणों और लेखों में धार्मिकता के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें करने का क्या फायदा है? अगर इस मुद्दे पर आप अपने परिवार को नहीं समझा सकते तो समाज को क्या खाक समझाएंगे? यह खोखला आदर्शवाद नहीं तो और क्या है?
सवाल यह है कि आपके लिए धर्म क्या है? धर्म की अपनी सीमाएं हैं तो विज्ञान की भी अपनी सीमाएं है। जो बुद्धिजीवी धार्मिकता को बहुत बड़ा अपराध मानते हैं, वे भी किसी न किसी रूप से आस्तिक होते हैं। निश्चित रूप से वैज्ञानिक चेतना जरूरी है लेकिन जीवन पूरी तरह वैज्ञानिक चेतना से युक्त नहीं हो सकता। इसी तरह जीवन के लिए धार्मिक चेतना जरूरी नहीं है लेकिन जीवन धार्मिक चेतना से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता। यही व्यावहारिक दृष्टिकोण है और यही जीवन की सच्चाई भी है।


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