Friday, April 3, 2026
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जरूरी है बच्चों को अनुशासित करना

BALWANI


आधुनिक वातावरण और मीडिया के अधिक खुलेपन के कारण बच्चों में अनुशासनहीनता बढ़ती जा रही है। इसके अलावा और भी कई कारण हैं जो बच्चों को अनुशासनहीन बनाने में सहायक होते हैं।

बच्चों की प्रथम पाठशाला उनका घर और प्रथम गुरू उनकी माता होती है पर आजकल देखने में आता है कि कहीं-कहीं माता पिता बच्चों को अनुशासित करने में असफल हो जाते हैं, शायद दूसरे कारण बच्चों पर अधिक हावी होते हैं। फिर भी हम माता-पिता और अध्यापक बच्चों को अनुशासन में लाने का पूरा प्रयास कर सकते हैं।

ध्यान दें माता-पिता

  • घर में जो भी नियम आदि बनें, माता-पिता मिलकर बनाएं और स्वयं भी उन नियमों का आदर करें और उनका पालन करें।

  • जो आदतें आप बच्चों में डालना चाहते हैं, जैसे कम बोलना, रात्रि में ब्रश करना, सोने से पहले हाथ, मुंह धोना, अधिक टी.वी. न देखना, लेटकर न पड़नप आदि स्वयं भी करें। बच्चे जो देखते हैं, उसी का अनुकरण करते हैं।

  • बच्चों को प्रारंभ से समय प्रबंधन की आदत सिखाएं जैसे समय पर खाना, टी.वी. देखना, खेलना, पढ़ना और सोना आदि। समय पर उठने की आदत भी बचपन से ही डालें।

  • बच्चा चाहे छोटा हो या बड़ा, जब भी वह अनुचित भाषा का प्रयोग करे, उसे टोकें और समझाएं कि यह भाषा ठीक नहीं है ताकि वह पुन: इन शब्दों का प्रयोग अपनी बातों में न दोहराएं।

  • बचपन से ही कुछ शिष्टाचार की बातें बच्चों को बताएं, जैसे बड़ों को नमस्ते करना, घर आए मेहमान का मुस्करा कर अभिनन्दन करना, खाते समय आवाज न करना, एक्सक्यूज मी, प्लीज, थैंक्यू, यू आर वैलकम आदि, छोटों से प्यार से बात करना और बड़ों का आदर करना, ऊंची आवाज में न बोलना, वाणी में मिठास लाना आदि।

  • बचपन से ही बच्चों को जूते-चप्पल, कपड़े, कंघी, टूथब्रश, खिलौने, किताबें यथास्थान पर रखना सिखायें।

  • माता-पिता जो भी नियम बनाएं, वे बच्चों की आयु अनुसार बनाएं। माता-पिता तानाशाह बनने की बजाय उनके अच्छे मार्गदर्शक और मित्र बनें। नियम ऐसे हों, जो बच्चों को पालन करने में बोझ न लगकर सहज लगें। नियमों में व्यवहारिकता और लचीलापन होना चाहिए।

  • अवकाश के दिन बच्चों को थोड़ी अधिक (छूट) जैसे थोड़ी देर से उठना, टी.वी. देखना, खेलना इत्यादि दें।

  • सप्ताह में किए गए उनके अच्छे कामों का मूल्यांकन करें और उन्हें गोद में बिठाकर या पास बिठाकर उन पर अतिरिक्त प्यार दिखाएं। गलत आदतों के लिए उन्हें समझाएं, अधिक डांटें नहीं।

  • बच्चों के सम्मुख दूसरे बच्चों से उनकी तुलना न करें। ऐसी बातों से बच्चों में कुंठा आ जाती है।

  • बच्चों को कभी भी दूसरों के सामने न डांटें। इससे बच्चे जिद्दी हो जाते हैं और अधिक परेशान करते हैं।

  • बच्चों से नियमों के पालन हेतु कोई शर्त न रखें नहीं तो बच्चे भी अपनी बात मनवाने के लिए आपके समक्ष शर्त रखेंगे।

  • बच्चे जब नियमों का उल्लंघन करें, तब उन्हें दंडित करें पर एक सीमा में। अधिक दंड बच्चों को उच्छृंखल बना देता है, इस बात का ध्यान रखें। बच्चे घर गंदा करते हैं तो उन्हें साफ करने का तरीका समझाकर उनसे साफ कराएं। कभी-कभी उनकी मदद भी करें।

अध्यापक ध्यान दें

  • एक सीमित आयु के बाद जब बच्चे स्कूल जाते हैं तो अध्यापक और स्कूल का वातावरण भी बच्चों को अनुशासित बनाने में मदद करता है। अध्यापक को चाहिए कि कक्षा में सभी विद्यार्थियों के साथ अपना एक सा व्यवहार रखें। बच्चों को क्या सही है, क्या गलत, इसका पाठ पढ़ाएं।

  • अध्यापकों को भी बच्चे के साथ शालीन व्यवहार रखना चाहिए और मधुर भाषा का प्रयोग करना चाहिए। अध्यापकों को भी चाहिए कि वे बच्चों की मानसिकता समझें और उनके साथ उसके अनुरूप व्यवहार रखें।

  • बच्चे अगर अधिक उद्दंड हों तो बच्चों से प्यार से बात कर कारण जानने का प्रयास करें। यदि कारण स्पष्ट न हो तो समय रहते उनके माता-पिता से बातचीत करें ताकि समय रहते समस्याओं का निदान हो जाए। यदि समस्या गंभीर हो तो माता-पिता को मनोचिकित्सक से मिलकर सलाह लेने का सुझाव दें।

नीतू गुप्ता


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