Thursday, April 25, 2024
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जाड़ों में अधिक सताता है जोड़ों का दर्द

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जैसे-जैसे आधुनिकता एवं निजीकरण बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे प्रदूषण में भी वृद्धि हो रही है। बढ़ते हुए प्रदूषण का सीधा प्रभाव वातावरण पर पड़ता है जिसके कारण गर्मियों में सामान्य से अधिक गर्मी तथा सर्दियों में असामान्य सर्दी पड़ने लगती है। इस बदलते मौसम का प्रभाव सबसे अधिक उस आबादी पर पड़ता है जो वृद्धावस्था की ओर बढ़ रही है। इन लोगों की मुख्यत: शिकायत रहती है कि जैसे-जैसे वातावरण में ठंडक बढ़ती है, वैसे-वैसे उनके शरीर के जोड़ों का दर्द भी बढ़ता जाता है।

इन लोगों में जोड़ों के दर्द का कारण सामान्यत: आर्थराइटिस या गठिया होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे शरीर के अंगों में शिथिलता आनी शुरू हो जाती है, उनका लचीलापन कम होने लगता है। अधिक व्यस्त होने या ध्यान न देने से जोड़ घिस जाते हैं तथा धीरे-धीरे जोड़ विकृत स्थिति में पहुंचने लगते हैं। इस समस्या से ग्रस्त व्यक्ति की क्रियाशीलता में भारी कमी होने लगती है तथा रोगी असहनीय पीड़ा से ग्रस्त होकर लंगड़ा कर चलने लगता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि जाड़ों का दर्द क्यों बढ़ता है? इसके जवाब में विभिन्न विशेषज्ञों की भिन्न-भिन्न राय है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार जाड़े के मौसम में जैसे-जैसे तापमान की कमी होती है, किसी जोड़ विशेष में रक्तवाहिनियों के संकुचित होने से उस हिस्से में रक्त का तापमान कम हो जाता है जिससे जोड़ में अकड़ाहट बढ़ जाती है और दर्द होने लगता है। विशेषज्ञों का दूसरा समूह इस प्रश्न के उत्तर में वायुमंडलीय दबाव का तर्क देते हुए कहता है कि इसमें कमी आने से रक्त धमनियों की दीवार के तनाव में कमी आ जाती है जिससे धमनियां फैल जाती हैं तथा दर्द और सूजन बढ़ जाती हैं।

इसके अतिरिक्त सर्दियों में बढ़ी हुई आर्द्रता (ह्मूमिडिटी) के कारण तंत्रिकाओं में संवेदना की क्षमता निश्चित रूप से बढ़ जाती है जिससे जोड़ों में दर्द अधिक महसूस होता है जबकि गर्मियों में इसके उल्टे सिद्धान्त के कारण दर्द कम महसूस होता है।

आर्थराइटिस एक प्रकार की न होकर सौ प्रकार की होती हैं। इनमें भी सबसे अधिक आॅस्टियोआर्थराइटिस तथा रूमेटाइड आर्थराइटिस पायी जाती है। अधिकतर लोगों में यह मिथ्या धारणा है कि आर्थराईटिस में केवल जोड़ों में दर्द होता है। सरिता विहार, नई दिल्ली के आधारशिला गेट पर स्थित बोन एंड जायंट्स केयर फाउंडेशन के निदेशक डॉ. सुभाष शल्या के अनुसार शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने के कारण होने वाले रयूमेटाइड आर्थराइटिस में जोड़ों के अलावा दूसरे अंग तथा संपूर्ण शारीरिक प्रणाली प्रभावित होती है। यह रोग 25 से 35 वर्ष की आयु के लोगों को प्रभावित करता है जिनमें मुख्य लक्षण हाथ-पैरों के छोटे जोड़ों में दर्द, कमजोरी तथा टेढ़ा-मेढ़ापन, मांसपेशियों में कमजोरी, ज्वर, अवसाद उभर जाते हैं। इसके अलावा गुर्दों व जिगर की खराबी भी हो सकती है।

आॅस्टियोआर्थराइटिस सभी आर्थराइटिस में सबसे अधिक पाया जाने वाला रोग है जो 40 वर्ष के ऊपर की आयु वाले लोगों विशेषकर महिलाओं को प्रभावित करता है। यह रोग आमतौर पर शरीर के सभी वजन सहने वाले जोड़ों विशेषकर घुटनों के जोड़ों को प्रभावित करता है। रोग के बढ़ने के साथ-साथ रोगी की टांगों का टेढ़ापन तथा घुटनों के बीच की दूरी बढ़ने लगती है। सीढ़ियां चढ़ने उतरने तथा अधिक दूर चलने में दर्द होता है, रोगी लंगड़ाकर चलने लगता है। धीरे-धीरे रोग इतना गंभीर रूप ले लेता है कि रोगी के पास जोड़ प्रत्यारोपण कराने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता।

वातावरण के तापमान में कमी आने के साथ-साथ आर्थराइटिस से पीड़ित रोगी के लक्षणों की तीव्रता में बढ़ोत्तरी होने लगती है। इससे बचने के लिए रोगी दर्द निवारक दवाइयां अधिक मात्र में सेवन करने लगते हैं। तरह-तरह के मलहम, तेल इत्यादि लगाते हैं परंतु कोई लाभ नहीं होता। इन कारणों से सर्दियों का मौसम जोड़ों के दर्द से ग्रस्त लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

डॉ. सुभाष शल्या के अनुसार अब तक यह माना जाता रहा है कि हर सर्दियों में आर्थराइटिस के रोगी को जोड़ों में दर्द रूपी पीड़ा सहन करनी पड़ती है तथा यह रोग दमा तथा मधुमेह की तरह ही दम के साथ ही जाता है परंतु उचित योग व व्यायाम, एन्टीआॅक्सीडेंट, विटामिन डी, आयरन, कैल्शियम युक्त भोजन, रहन-सहन में परिवर्तन, कार्टिलेज बनाने वाली आधुनिक दवाओं के सेवन तथा लंबाई के अनुसार संतुलित शारीरिक वजन से जाड़ों में ही नहीं बल्कि लंबे समय तक के लिए जोड़ों के दर्द से न सिर्फ छुटकारा पाया जा सकता है बल्कि भविष्य में होने वाली सर्जरी से भी काफी हद तक बचा जा सकता है। आर्थराइटिस को रोका तथा वापस (रिवर्स) भी किया जा सकता है। यह अत्यन्त प्रभावशाली तकनीक ‘आर्थराइटिस रिवर्सल प्रोग्राम’ के नाम से जानी जाती है।

सामान्य लोगों में कूल्हा, घुटना तथा पैर का केंद्र बिंदु एक सीधी रेखा में होते हैं जिसे टांग का ‘नॉर्मल एलाइनमेंट’ कहते हैं। यह एलाइनमेंट आर्थराइटिस के रोगियों में धीरे-धीरे भंग होने लगता है जिस कारण उनकी टांगें टेढ़ी होने लगती हैं तथा दर्द बनने लगता है। इसे पुन: ठीक करने के लिए उनके द्वारा विकसित विशेष उपकरणों को प्रयोग करके कुछ विशेष क्रि याएं करायी जाती हैं जिससे टेढ़ी टांगें सीधी होने लगती हैं व दर्द कम होने लगता है और चाल सुधरने लगती है। मांसपेशियों को मजबूत करके जोड़ों की सक्रि यता व स्थिरता बढ़ाई जाती है, जोड़ों में रक्तप्रवाह सुचारू किया जाता है ताकि जोड़ों पर सर्दियों का प्रभाव न पड़े।

रोगी के संपूर्ण शरीर, रक्त व हड्डियों की पूर्ण जांच कर उनके आधार पर रोगी के खान-पान में बदलाव लाकर आवश्यकतानुसार संतुलित एन्टी आॅक्सीडेंट युक्त भोजन दिया जाता है, साथ ही अत्याधुनिक कार्टिलेज बनाने वाली तथा जोड़ों की चिकनाई वापस लाने वाली दवाओं का समुचित प्रयोग करने से रोगी को अत्यधिक आराम मिलता है।

इस प्रोग्राम से बढ़े हुए वजन, रक्तचाप, मधुमेह व आॅस्टियोपोरोसिस को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इससे रोगी का वजन एक माह में लगभग पांच किलोग्राम तक कम हो सकता है जिससे रोगी स्वयं को जवान महसूस करता है। इस आर्थराइटिस रिवर्सल प्रोग्राम की सफलता के कारण ही अब जोड़ों के दर्द के रोगी जाड़ों सहित सभी मौसमों में दर्दरहित सक्रिय जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

अशोक गुप्त


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