
जान हल्की है देह भारी है
इस तरह ज़िन्दगी गुजारी है
यूँ तो सोए नहीं हैं मुद्दत से
नींद की हर समय खुमारी है
हम तिरे शहर से चले आए
याद काँधे से कब उतारी है
दिन निकलता है साथ अश्कों के
सिलसिला आज तक भी जारी है
कर्ज लेकर जिया नहीं जाता
दिल पै बाकी तेरी उधारी है
वो न हारा,नहीं थे हम जीते
बस खयालों में जंग जारी है
वक़्त का क्या है कब गया आया
एक पल ज़िन्दगी पै भारी है
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