Wednesday, April 29, 2026
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बजट को इस निगाह से देखें

कृष्ण प्रताप सिंह |

वर्ष 2023 ‘मोटा अनाज वर्ष’ होगा, किसानों से उनकी उपज की रिकार्ड खरीदारी की जाएगी, साथ ही ड्रोन खरीदने के लिए उन्हें दस लाख की सब्सिडी दी जाएगी, गांवों में आर्गेनिक खेती और शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जोर दिया जाएगा, जबकि पांच नदियों को जोड़ा जाएगा और गंगा के किनारे बसे किसानों की मदद की जाएगी। इसी तरह केन-बेतवा प्रोजेक्ट को 1400 करोड़ रुपये दिए जाएंगे, शहरी इलाकों में अस्सी लाख सस्ते घर बनाए जाएंगे, 3.8 करोड़ घरों में नल से जल की आपूर्ति की जाएगी, रिजर्व बैंक डिजिटल करेंसी जारी करेगा, डिजिटल यूनिवर्सिटी और ई-विद्या चैनल खोले जाएंगे, मेक इन इंडिया के तहत 60 लाख नौकरियां सृजित की जाएंगी और आत्मनिर्भर भारत के तहत 16 लाख, सेज की जगह नया कानून लाया जाएगा, चार सौ नई बन्देभारत ट्रेनें चलाई जाएंगी, इलेक्ट्रिक वाहनों हेतु चार्जिंग स्टेशन बनेंगे, डाकघरों को बैंकिंग सिस्टम का अभिन्न अंग बनाकर डेढ़ लाख डाकघरों में कोर बैंकिंग सेवा आरम्भ की जाएगी, कर प्रणाली को और आसान किया जायेगा और सारे स्कूलों में टीवी लगाए जाएंगे…वगैरह-वगैरह।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा मंगलवार को लोकसभा में पेश किए गए वित्तवर्ष 2022-23 के बजट में की गई इन घोषणाओं में किसी एक को भी अप्रत्याशित नहीं करार दिया जा सकता। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उन्हें इस तरह की कुछ ढाढ़स बंधाने वाली घोषणाएं करनी ही करनी थीं। लेकिन अफसोस कि इनकी मार्फत न वे देश की आर्थिक चिंताओं को सम्बोधित करती दिखीं, न अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में सरकार की विफलताओं को ही ढक-तोप पार्इं। उलटे जब उन्होंने कहा कि यह देश का अमृतकाल है, जो आजादी के शताब्दी वर्ष तक यानी 25 वर्ष चलेगा और यह बजट इन पच्चीस वर्षों की उम्मीदों का बजट है तो समझना कठिन था कि वे देश की वित्तमंत्री हैं या सब्जबाग मंत्री? और अपने आर्थिक बही-खाते की मार्फत देशवासियों को वास्तविकता से रूबरू कराना और भविष्य की दिशा दिखाना चाहती हैं या दिशाभ्रम पैदा करना चाहती हैं?

इसे कुछ इस तरह समझ सकते हैं कि जब सरकारी अदूरर्शिताओं के कारण कोरोना से पहले ही पटरी से उतर रही अर्थव्यवस्था कोरोना के हमले झेलकर और बदहाल हो गई है, उससे पीड़ित किसानों, बेरोजगारों, लघु उद्यमियों, नौकरीपेशा लोगों, छंटनी पीड़ितों, मजदूरों, छात्र-छात्राओं, गृहिणियों, बच्चों और बीमारों को आगे का रास्ता नहीं दिखाई दे रहा और सरकार के ही अनुसार अस्सी करोड़ गरीब अपना पेट पालने के लिए उसके द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे राशन पर निर्भर हैं, वित्तमंत्री इसे अमृतकाल और उसकी उम्र 25 साल बता रही हैं। ऐसे में किसी को तो पूछना चाहिए कि उनके अमृतकाल और कोरोना काल में क्या फर्क है?

वित्तमंत्री द्वारा बजट में उनके लिए किए गए प्रावधानों से लगता है कि उन्होंने उनकी मान न रखने की बात को नए सिरे से प्रमाणित करना ही ठीक समझा है। उनके बजट में किसानों से उनकी जिंसों की रिकार्ड खरीदारी की बात जरूर की गई है, न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग की ओर से चुप्पी साध ली गई है। जहां तक वर्ष 2023 को मोटा अनाज वर्ष घोषित करने की बात है, उसमें कुछ नया है ही नहीं। इस सम्बन्धी देश के प्रस्ताव को संयुक्तराष्ट्र महासभा ने मार्च, 2021 में ही सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था और उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाना है। इस बजट से यह भी पता नहीं चलता कि किसानों से 2022 तक उनकी आय दो गुनी करने का जो वादा किया गया था, उसका क्या हुआ? वैसे ही जैसे यह पता नहीं चलता फाइव ट्रिलियन डॉलर इकानमी के मुंगेरीलाल के हसीन सपने का क्या हुआ? इस लिहाज से देखें तो यह बजट कई मायनों में सरकार की विफलताओं का बयान लगता है। महामारी से पहले देश की औसत प्रति व्यक्ति आय लगभग 94.6 हजार रुपये थी, जो चालू वित्तवर्ष में घटकर 93.9 हजार रुपये के आसपास आ गई है। तिस पर जीवनयापन के लिए आवश्यक वस्तुओं और र्इंधनों के दामों में भारी वृद्धि बड़ी मुसीबत बनी हुई है। लेकिन यह बजट इस वृद्धि पर अंकुश का कोई आश्वासन नहीं देता। इसमें यह भी नहीं समझा गया है कि खाने-पीने की वस्तुओं तथा र्इंधन की बढ़ती कीमतें समूचे बाजार को प्रभावित करती हैं क्योंकि उपभोक्ताओं इनकी खरीद में ज्यादा कटौती नहीं कर पाते। यह भी नहीं कि अधिक करों, बढ़ते वित्तीय घाटे, रिजर्व बैंक की आसान मौद्रिक नीति तथा आपूर्ति श्रृंखला की समस्याएं भी महंगाई बढ़ाने की जिम्मेदार होती हैं।

बजट आने से पहले से ही जानकार कहते आ रहे थे कि कोरोना के दौरान लोगों द्वारा खर्च पर नियंत्रण से अर्थव्यवस्था में पैदा हुए मांग के संकट के खात्मे के लिए आम आदमी की जेब में पैसे डाले जाने चाहिए और करदाताओं को राहतें दी जानी चाहिए। लेकिन वित्तमंत्री ने इसके लिए भी कोई महत्वाकांक्षी कदम नहीं उठाया है। अलबत्ता, वित्तमंत्री ने कारपोरेट पर नजर-ए-इनायत करते हुए कारपोरेट टैक्स 18 से घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया है और हर तरह के कैपिटल गेन पर 15 प्रतिशत व क्रिप्टोकरेंसी से आय पर 30 प्रतिशत कर लगाने की घोषणा की है। हां, भारतीय जीवन बीमा की शीघ्र ‘बिक्री’ के एलान के बीच समझ में नहीं आता कि बजट में किए गए सारे स्कूलों में टीवी लगाने के ऐलान को कैसे देखा जाए, जब उनमें से अनेक में, कम से कम उत्तर प्रदेश में, अध्यापकों की भारी कमी है और उनकी भर्तियां अटकी हुई हैं। दूसरी ओर कोरोनाकाल में अनेक छात्र इसलिए आॅनलाइन पढ़ाई नहीं कर पाए, क्योंकि उनके पास एंड्रायड फोन ही नहीं थे।

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