जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहे अंदरूनी विवाद अब और गंभीर रूप लेते दिखाई दे रहे हैं। पार्टी की राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने अपने पद से इस्तीफा देकर ममता बनर्जी के नेतृत्व को एक और बड़ा झटका दिया है। इससे पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता और लंबे समय तक राज्यसभा में मुख्य सचेतक रहे सुखेंदु शेखर रॉय भी पार्टी छोड़ चुके हैं। लगातार हो रहे इस्तीफों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी के भीतर असंतोष तेजी से बढ़ रहा है।
सुष्मिता देव ने इस्तीफा क्यों दिया?
असम के सिलचर से पूर्व लोकसभा सांसद रहीं सुष्मिता देव ने बुधवार को राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा दिया। उन्होंने इसे तत्काल प्रभाव से स्वीकार करने की मांग करते हुए सभापति सीपी राधाकृष्णन को पत्र लिखा। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने इस्तीफे का विस्तृत कारण नहीं बताया, लेकिन इसे पार्टी में बढ़ती बगावत से जोड़ा जा रहा है।
सुष्मिता देव पहले कांग्रेस में थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 2021 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुईं। पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया और बाद में राज्यसभा भेजा गया। उनके अचानक इस्तीफे को राजनीतिक रूप से ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
क्या यह सुखेंदु शेखर रॉय के बाद एक और बड़ा झटका है?
सुष्मिता देव का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब कुछ दिन पहले ही सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया था। रॉय ने अपने पत्र में पार्टी पर भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ अपराध और कानून व्यवस्था के विफल होने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि अब भाजपा सरकार बंगाल के विकास के लिए काम कर रही है। उनके बयान ने बंगाल की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा किया था, और सुष्मिता देव के इस्तीफे ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है।
तृणमूल कांग्रेस में बगावत की खबरें
पार्टी के अंदर लंबे समय से असंतोष की खबरें आ रही हैं:
- कुछ नेताओं पर भाजपा से संपर्क में होने के आरोप लगे हैं।
- कई विधायक और सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं।
- कुछ बागी नेताओं ने अलग गुट बनाने के संकेत दिए हैं।
पार्टी नेतृत्व लगातार डैमेज कंट्रोल की कोशिश कर रहा है। तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद ने बागी नेताओं पर भाजपा से मिलीभगत के आरोप लगाए हैं, जबकि बागी नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर लोकतांत्रिक आवाज दबाने का आरोप लगाया है।
ममता बनर्जी के सामने चुनौती
पिछले कई वर्षों से पश्चिम बंगाल में सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत रही तृणमूल कांग्रेस अब अपने अस्तित्व और एकजुटता को लेकर गंभीर चुनौती का सामना कर रही है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बगावत और बढ़ी, तो पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वे पार्टी को टूटने से बचाएं और नाराज नेताओं को मनाएं। वहीं भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को बंगाल की राजनीति में अपने लिए अवसर के रूप में देख रही है। आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस के भीतर की हलचल बंगाल की राजनीति को और गर्मा सकती है।

