Wednesday, January 28, 2026
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गणित अर्थशास्त्र की भाषा है

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गैलीलियो ने कहा है कि पूरी कायनात एक गणितीय इबारत है। समूचा ब्रह्मांड हमारे सामने संवाद के लिए बाहें पसारे खड़ा है। लेकिन हम इससे तब तक संवाद नहीं कर सकते, जबतक हम इसकी भाषा को जानने में सक्षम नहीं हो पाते। ब्रह्मांड और प्रकृति को समझने और इससे संवाद स्थापित करने लिए इसकी भाषा यानी गणित को समझना होता है। विज्ञान दरअस्ल प्रकृति को समझने की जुगत ही है। इसीलिए विज्ञानों के विकास से पहले इसकी भाषा यानी गणित का विकास हुआ। गणित आधुनिक विज्ञान से कहीं अधिक पुरानी ज्ञान की शाखा है, लगभग दो हजार साल या उससे भी अधिक। ज्यामिति और अंकगणित की उत्पत्ति प्राचीन सभ्यताओं के समय से जुड़ी है। आधुनिक विज्ञान के आने से बहुत पहले, गणित का उपयोग प्राकृतिक घटनाओं का वर्णन करने के लिए किया जाने लगा था।

गणित प्रकृति की ‘सार्वभौमिक भाषा’ है। यह ज्ञान की ऐसी शाखा या अनुशासन है जो संख्याओं, मात्राओं, रूपों और प्रतिमानों से संबंधित है। यह अमूर्त अवधारणाओं और तार्किक तर्क के माध्यम से दुनिया को समझने और वर्णित करने के लिए एक ढांचा प्रदान करता है। गणित केवल सैद्धांतिक समस्याओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे अनुप्रयोग विभिन्न क्षेत्रों में हैं, जैसे विज्ञान, इंजीनियरिंग, वित्त, अर्थशास्त्र और प्रौद्योगिकी इत्यादि। गणितीय सिद्धांतों को लागू करके हम प्राकृतिक घटनाओं का अनुमान लगा सकते हैं, प्रणालियों का अनुकूलन कर सकते हैं, और नवाचार तकनीकों का विकास कर सकते हैं।

अर्थशास्त्र में गणित का अनुप्रयोग वास्तविक दुनिया की आर्थिक घटनाओं को समझने और विश्लेषण करने के लिए किया जाता है। विज्ञान और समाज विज्ञान में गणित का अनुप्रयोग 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ, जब न्यूटन और लाइबनिज के कार्यों ने प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों के गणितीयकरण को प्रोत्साहित किया। अर्थशास्त्र के अनुशासन में गणितीय विश्लेषण की अवधारणाओं को लागू करने का पहला प्रयास 1738 में स्विस गणितज्ञ और भौतिक विज्ञानी डैनियल बनौर्ली द्वारा किया गया था। बनौर्ली के काम ने आर्थिक मॉडलों में सममिति को प्रस्तुत करने के प्रारंभिक प्रयासों को दशार्या, जिसमें संतुलन और संपत्ति के समान वितरण पर विशेष बल दिया गया। उन्नीसवीं सदी के मध्य से बौद्धिक जगत में इस बात को तो सहर्ष स्वीकार कर लिया गया कि अर्थशास्त्र में सटीकता के लिए गणित का अनुप्रयोग अपरिहार्य है। उस दौर के अग्रगणी अर्थशास्त्रियों में अधिकांश प्राकृतिक विज्ञानों में प्रशिक्षित थे, जैसे जेवन्स, वालहास और फिशर आदि। इन अर्थशास्त्रियों की नजर में अर्थशास्त्र को एक ह्लहार्ड साइंसह्व के रूप में विकसित होना चाहिए। उन्होंने गणितीय उपकरणों जैसे कलन यानी कैलकुलस का उपयोग किया।

तब से लेकर आज तक अर्थशास्त्र में गणित के अनुप्रयोग लगातार होता रहा है। साथ ही प्रयोग प्रविधि में काफी बदलाव भी आया है। अर्थशास्त्र में गणित के अनुप्रयोग को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहला, वर्णनात्मक गणित और सांख्यिकी; और दूसरा, गणितीय मॉडलिंग। वर्णनात्मक गणित और सांख्यिकीय प्रविधियों में जैसे समाकलन और अवकलन का प्रयोग आर्थिक वृद्धि की प्रवैगिकी को समझने, उत्पादन का अनुकूलन करने और उपभोक्ता व्यवहार का विश्लेषण करने में किया जाता है। रैखिक बीजगणित और गेम थ्योरी बाजार संरचना, व्यापार और वित्त में अत्यंत महत्वपूर्ण है। और सांख्यिकी और अर्थमिति का प्रयोग परिकल्पनाओं की जांच, परिणामों की भविष्यवाणी और नीतिगत निर्णयों के लिए जरूरी है। सामान्य आर्थिक गणनाएं जैसे जीडीपी, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, मुद्रास्फीति दर, बेरोजगारी से लेकर यील्ड और रिटर्न की तुलना, बजटिंग, वित्त की समझ आदि के लिए गणित का अनुप्रयोग वर्णनात्मक प्रयोग है। विभिन्न डेटा सॉफ़्टवेयर जैसे आर, स्टैटा, ई-व्यूज, एसपीएसएस जैसे सॉफ्टवेयर आर्थिक विश्लेषण में सहायक होते हैं। ये सॉफ्टवेयर हमें डेटा का विश्लेषण करने निष्कर्ष निकालने में सहायक होते हैं, जिनके आधार पर आर्थिक सिद्धांतों की पुष्टि कर सकते हैं।

दूसरी ओर, गणितीय मॉडलिंग एक बिल्कुल अलग प्रक्रिया है। यह एक अमूर्त मॉडल को गणितीय भाषा में रूपांतरित करने की प्रक्रिया है। जो वास्तविक जीवन के जटिल व्यवहार को गणितीय मॉडल वर्णित करता है। गणितीय मॉडल सांख्यिकीय मॉडल, फजी लॉजिक मॉडल और अनुभवजन्य संबंधों के रूप में भी हो सकते हैं। वास्तव में, गणितीय भाषा का उपयोग करके किसी भी प्रकार का मॉडल वर्णन गणितीय मॉडल कहा जाता है। इन मॉडलों को संदर्भ बिंदु मानकर वास्तविक आर्थिक स्थितियों का मूल्यांकन किया जाता है। गणितीय मॉडलिंग की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी अंतरविषयक प्रकृति है। वैज्ञानिक कंप्यूटिंग के साथ मिलकर गणितीय मॉडलिंग एक उभरती हुई अंतरविषयक प्रौद्योगिकी है।

विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में अर्थशास्त्र में स्नातक और परास्नातक डिग्री कार्यक्रमों में गणित पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है। कई बार तो गणित पर अत्यधिक जोर देने की आलोचना भी होती है। वे छात्र, जो पहले से गणित में पारंगत होते हैं या जो शुद्ध विज्ञानों की पृष्ठभूमि रखते हैं, वे उन छात्रों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जिन्हें संख्याएं या ग्राफ देखकर घबराहट होती है। हालांकि, यह सवाल अब भी अनसुलझा है कि क्या ये स्नातक अच्छे अर्थशास्त्री बन पाएंगे और वास्तविक जटिल दुनिया का विश्लेषण कर सकेंगे। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम कक्षा में अर्थशास्त्र की शिक्षा किस प्रकार प्रदान करते हैं। अर्थशास्त्र में नोबेल इनामयाफ़्ता की सूची में कई गणितज्ञ है जिनको इस अनुशासन में गणित के अप्रतिम अनुप्रयोग के लिए इस सम्मान से नवाजा गया।

मिसाल के तौर पर जॉन नैश को 1994 में गेम थ्योरी में उनके महत्वपूर्ण योगदान योगदान के लिए दिया गया। इससे पहले 1983 में जेरार्ड डेब्रू, एक प्रशिक्षित गणितज्ञ से अर्थशास्त्री बने, को आर्थिक सिद्धांतों में उनके योगदान के लिए दिया गया, खासकर उनके जनरल ईक्वलिब्रीयम थ्योरी पर किए गए काम के लिए। यही नहीं, गणितीय मॉडलों या गणित पर अतिशय निर्भरता की भी आलोचना होती है। यहाँ तक कि जेरार्ड डेब्रू को आलोचना का सामना करना पड़ा है। उनके बारे में कहा गया कि उन्होंने गणितीय मॉडल्स विकसित किए हैं जो नीति निर्धारण के लिए अवास्तविक या अप्रासंगिक हैं।

अर्थशास्त्र के लिए गणित शक्तिशाली साधन है। गणित के प्रयोग से हम आर्थिक सिद्धांतों की वास्तविकता को पूरी तरह समझ सकते हैं। गणित के बगैर भी अर्थशास्त्र को समझा-समझाया जा सकता है लेकिन वह रास्ता लंबा है। अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कृत पॉल सैमुएलसन ने एक बार कहा था, ‘आप गणित जाने बिना भी एक महान सिद्धांतकार बन सकते हैं. . . लेकिन. . . इसके लिए आपको कहीं अधिक चतुर और प्रतिभाशाली होना पड़ेगा।’

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