Friday, June 19, 2026
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कहीं अगली ‘इंजीनियरिंग डिग्री’ न बन जाए ‘लॉ डिग्री’

 

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dr.as singh advocateदाखिलों का मौसम है और करियर की शुरुआत करने वाले छात्रों के सामने लंबी दौड़ है। पैरेंट्स के लिए अपने बच्चों को करियर-विकल्प के रूप में कानूनी पेशे का सुझाव सोच-समझकर देना महत्वपूर्ण है। उन्हें पता होना चाहिए कि अपेक्षाओं और हकीकत में अंतर है। अगर देश में कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं होता है, तो मुझे डर है कि ‘लॉ डिग्री’ कहीं अगली ‘इंजीनियरिंग डिग्री’ न बन जाए! कई ऐसे पैरेंट्स- जिनके बच्चे अपने करियर के लिए कोई महत्वपूर्ण विकल्प चुनने जा रहे होते हैं- का मानना है कि ‘लॉ में बहुत गुंजाइश है।’ इसी सोच के चलते वे अपने बच्चे को कानूनी-पढ़ाई में करियर चुनने का कहते हैं, जिससे कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (क्लैट) में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की संख्या बढ़ जाती है। क्लैट देश भर में 26 एनएलयू (नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी) के एक परिसंघ द्वारा आयोजित प्रवेश परीक्षा है। दुर्भाग्य से, कानूनी-पढ़ाई के कई इच्छुक छात्र हमारे देश के प्रमुख संस्थानों में प्रवेश पाने या इसकी शिक्षा का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। इसी सत्र में प्रमुख संस्थानों की 3000 सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करने के लिए एक लाख से अधिक उम्मीदवार क्लैट में शामिल हुए। कानूनी-पढ़ाई की बढ़ती मांग के कारण गली-मोहल्ले में निजी लॉ कॉलेज उग आए हैं। ये कॉलेज कम दुकानें ज्यादा हैं, जो पैसा कमाने पर जोर देते हैं।

यह एक कड़वी सच्चाई है कि अधिकांश लॉ कॉलेजों में दी जाने वाली शिक्षा आधुनिक समय के कानूनी करियर के लिए पर्याप्त नहीं है। उनके क्लास लेक्चर और ‘बेयर एक्ट्स’ के सरसरी ज्ञान पर आधारित पारंपरिक प्रणाली युवा वकीलों को वास्तविक दुनिया की चुनौतियों के लिए तैयार नहीं कर पाती हैं। देश में केवल मुट्ठी भर लॉ स्कूल ही छात्रों को अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियों के लिए आवश्यक अनुभव, ज्ञान और कौशल प्रदान कर सकते हैं। युवा लॉ ग्रेजुएट्स मोटे पैकेज वाली नौकरियों और लॉ फर्म और मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन में प्लेसमेंट की ख्वाहिश रखते हैं, लेकिन बहुत कम ही ऐसा कर पाते हैं। उच्च वेतन पैकेज देने वाले रिक्रूटर ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देते हैं, जिन्होंने लॉ स्कूल में अपने समय का लगन से उपयोग किया था। टियर-1 लॉ फर्म आम तौर पर ऐसे उम्मीदवारों को नियुक्त करती हैं, जिनका अकादमिक रिकॉर्ड शानदार होता है, जिनके पास रिसर्च की बेहतरीन स्किल्स होती हैं, जिनके पेपर्स प्रकाशित हो चुके होते हैं, जिन्हें मूट कोर्ट का अनुभव होता है और जो सेमेस्टर ब्रेक के दौरान इंटर्नशिप के साथ वास्तविक दुनिया से भी परिचित होते हैं।
यह विधि स्नातकों के लिए केवल कानूनी नौकरियों का एक पहलू है। वकीलों के लिए एक और अच्छा करियर विकल्प है, जो लंबे समय से अस्तित्व में है- ‘वकालत।’ यह रोमांचक, चुनौतीपूर्ण और शायद सबसे लाभप्रद करियर विकल्प है।

लेकिन एक बार फिर, भारत में लॉ स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता इतनी शोचनीय है कि बार काउंसिल आॅफ इंडिया (बीसीआई) को 2010 में आॅल इंडिया बार परीक्षा (एआईबीई) शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा। एआईबीई विधि स्नातकों के बुनियादी ज्ञान का आकलन करने व प्रैक्टिस में प्रवेश करने के लिए न्यूनतम बेंचमार्क तय करने वाली ओपन-बुक सर्टिफिकेशन परीक्षा है। एआईबीई पास करने के बाद वकील को बीसीआई द्वारा प्रैक्टिस का प्रमाण-पत्र दिया जाता है और तब वह अदालती प्रैक्टिस के लिए पात्र होता है। लेकिन सक्रिय लिटिगेशन-प्रैक्टिस में प्रवेश के बाद भी सब कुछ आसान नहीं होता। पैसे कमाने योग्य व्यावहारिक कौशल की कमी के कारण युवा स्नातक खुद को अधिक अनुभवी वकीलों के चैंबर से जोड़ते हैं, ताकि गुर सीख सकें। लेकिन सीखने का यह दौर काफी लंबा चलता है।

एक युवा वकील को अदालती प्रक्रियाओं, अदालत में पेश होने और बहस करने, याचिकाओं और आवेदनों का मसौदा तैयार करने और क्लाइंट काउंसलिंग के बारे में पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने में कम से कम 3 से 5 साल लगते हैं। दाखिलों का मौसम है और करियर की शुरुआत करने वाले छात्रों के सामने लंबी दौड़ है। पैरेंट्स के लिए अपने बच्चों को करियर-विकल्प के रूप में कानूनी पेशे का सुझाव सोच-समझकर देना महत्वपूर्ण है। उन्हें पता होना चाहिए कि अपेक्षाओं और हकीकत में अंतर है। अगर देश में कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं होता है, तो मुझे डर है कि ‘लॉ डिग्री’ कहीं अगली ‘इंजीनियरिंग डिग्री’ न बन जाए! पैरेंट्स के लिए अपने बच्चों को करियर-विकल्प के रूप में कानूनी पेशे का सुझाव सोच-समझकर देना महत्वपूर्ण है। उन्हें पता होना चाहिए कि वकालत से की जाने वाली अपेक्षाओं और उसकी हकीकत में एक निश्चित अंतर है। भारत में कानूनी शिक्षा आम तौर पर प्रैक्टिस में प्रवेश से पहले वकीलों की शिक्षा को संदर्भित करती है । भारत में कानूनी शिक्षा पारंपरिक विश्वविद्यालयों और विशेष कानून विश्वविद्यालयों और स्कूलों द्वारा स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद या एकीकृत डिग्री के रूप में विभिन्न स्तरों पर प्रदान की जाती है।

भारत में कानूनी शिक्षा को बार काउंसिल आॅफ इंडिया द्वारा विनियमित किया जाता है , जो अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 4 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है। भारत में कानूनी शिक्षा प्रदान करने वाली किसी भी संस्था को बार काउंसिल आॅफ इंडिया द्वारा अनुमोदित होना चाहिए।


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