Sunday, March 22, 2026
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अपने खूबसूरत अतीत पर आंसू बहाता मेफेयर, रीगल

  • सन् 1975 में लगती थीं सुपरहिट फिल्में, लोग दूर गांव से आया करते थे फिल्म देखने
  • आज मेफेयर खंडहर में तब्दील, नहीं कोई देखने वाला
  • ज्यादातर सिनेमाघरों का नहीं रहा अस्तित्व

ऋषिपाल सिंह |

मेरठ: वर्तमान में सिनेमाघरों के हालात किसी से छिपे नहीं है। मेरठ में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर नाम मात्र के ही रह गये हैं। इनमे से कुछ ऐसे सिनेमाघर भी रहे जो मल्टीप्लेक्स में तब्दील हो गये तो कुछ को दोबारा से रीनोवेशन कराकर शुरू कराया गया, लेकिन सन् 1975 में मेरठ के जाने माने सिनेमाघरों में शामिल मेफेयर और रीगल सिनेमा आज अपने खूबसूरत अतीत पर आंसू बहा रहे हैं। उस दौरान यहां सुपरहिट फिल्में लगा करती थी। अब मेफेयर सिनेमा खंडहर में तब्दील हो चुका है, जिसे कोई देखने वाला नहीं है।

शहर में सिंगल स्क्रीन सिनेमा का कल्चर अब खत्म-सा होता जा रहा है। जो बचे हुए सिनेमाघर हैं, उनके हालात कोरोना ने खस्ता कर दिये हैं। मेरठ में पुराने सिनेमाघरों की बात करे तो यहां मेफेयर, रीगल, फिल्मिस्तान, मेनका, ओडियन, मेघदूत, आम्रपाली, जगत, निशात, नंदन सिनेमा समेत कई सिनेमाघर सिंगल स्क्रीन में थे। इन सिनेमाओं का नाम भी दूर-दूर था।

यहां लोग दूर गांव और अन्य जिलों से भी सिनेमा देखने के लिये मेरठ आया करते थे। जब से मल्टीप्लेक्स कल्चर शुरू हुआ तब से इन सिनेमाओं का क्रेज समाप्त-सा होता चला गया। वर्तमान समय में मेफेयर जहां खंडहर में तब्दील हो चुका है। वहीं, रीगल सिनेमा को दूसरे स्थान पर फिर से शुरू किया गया, लेकिन अब वह कोरोना के कारण बंद है। मेनका, फिल्मिस्तान, आम्रपाली, मेघदूत सिनेमा का तो नाम तक खत्म हो चुका है। इनके स्थान पर दूसरी बिल्डिंग बनकर तैयार हो चुकी है। निशात फिलहाल कोरोना के कारण बंद है तो नंदन भी तोड़ दिया गया है। वहां भी अब निर्माण कार्य चल रहा है।

गांव से देखने आते थे मेफेयर में फिल्म

सन् 1975 में मेरठ में मुख्य सिनेमाओं में मेफेयर, रीगल, पैलेस समेत कई सिनेमाघर थे। मेफेयर में एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्म लगती थी। गांव में फिल्म लगते ही शोर मच जाता था कि मेफेयर में कौन सी और किसी हीरो की फिल्म लगी है। परीक्षितगढ़ रोड स्थित गांव छिलौरा निवासी जसबीर सिंह बताते हैं कि वह सन् 1975 में शहर में सिलाई कार्य के लिये आया करते थे। मेफेयर में एक से बढ़कर एक फिल्म लगती थी। इनमें धर्मा, खोटा सिक्का, काला सोना, बारुद समेत कई फिल्में यहां देखी। फिल्म देखने के लिये कई घंटे पहले ही टिकट के लिये लाइन लगानी होती थी। टिकट लेने के बाद सभी लोग अपने दोस्तों का इंतजार करते थे और सबके आने के बाद फिल्म देखकर ही गांव लौटते थे।

25 पैसे से 85 पैसे का था टिकट

फिल्म देखने के लिये टिकट भी 25 पैसे से शुरू होता था और 85 पैसे तक का टिकट था। फस्ट क्लास का टिकट 25 पैसे उसके बाद सेकेंड का 35 पैसे और टॉप में बालकनी का टिकट 85 पैसे का मिलता था। शास्त्रीनगर निवासी अशोक कुमार ने बताया कि वह पांच छह दोस्त एकत्र होकर टिकट लेते थे और इसके लिये एक व्यक्ति को कई घंटे पहले ही लाइन में लगा देते थे। टिकट लेने के बाद वह सभी का इंतजार करता था और सभी एक साथ फिल्म देखकर अपने गांव की ओर निकल जाते थे। सप्ताह में एक फिल्म जरूर देखते थे।

आज खंडहर में तब्दील हुआ मेफेयर

कैंट क्षेत्र में गांधी बाग के पास स्थित हुआ करता था मेफेयर सिनेमा। मेफेयर सिनेमा की बिल्डिंग आज पूरी तरह से खंडहर में तब्दील है। टीनशेड टूटकर गिर चुका है। दीवारें टूट चुकी हैं। सिनेमा के चारों ओर कटीली तारों को लगाया गया है। जिससे यहां कोई अंदर न जा सके। कूड़ा और झाड़ के कारण यहां कोई आता जाता नहीं। नहीं ही इसके रखरखाव के लिये कुछ किया जा रहा है। आज सिनेमाहोल पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चुका है। अपने अतीत पर आंसू बहाता नजर आ रहा है। इसके अलावा रीगल सिनेमा का भी रीनोवेशन कराया गया है। इसे दूसरे स्थान पर कैंट क्षेत्र में ही शुरू कराया गया, लेकिन कोरोना ने हाल खराब कर दिये हैं।

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