Tuesday, May 28, 2024
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लाल किले से नीरस भाषण

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ravindra patval 1पीएम मोदी के 15 अगस्त 2014 के भाषण से लेकर मंगलवार के अपने 10वें भाषण तक के सफर में इस बार एक बड़ा अंतर देखने को मिला है, जिसके बारे में कल से ही आम बहस में चर्चा चल रही है। अपने भाषण में पीएम मोदी उस आत्मविश्वास के साथ नजर नहीं आए, जैसा आमतौर पर देश देखने का आदी था। उनकी हिंदी अच्छी नहीं रही है, लेकिन अपने वक्तृत्व कला और अंग्रेजी शब्दों से नए नारों और सिनर्जी से वे अपने प्रशंसकों को अभी तक लुभाते रहे हैं, लेकिन इस बार 90 मिनट से भी अधिक समय तक भाषण के दौरान कई बार उन्हें हड़बड़ी में अटपटे ढंग से वाक्य पूरा करते देखा जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ? क्या यह विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के एकजुट होने की वजह से है? क्या यह कांग्रेस पार्टी के राहुल गांधी के नए अवतार की वजह से है, जिन्होंने पिछले एक वर्ष से लगातार अपनी छवि को भारत के सामान्य जन से जोड़ने की कोशिश की है?

क्या इसकी वजह मणिपुर हिंसा पर उनके मौन और डबल इंजन के लकवाग्रस्त स्थिति से उपजा है? या क्या इसकी वजह उनके पिछले 9 वर्षों के वायदों की वजह से है, जिनकी डिलीवरी में प्रधानमंत्री बुरी तरह से नाकाम साबित हुए हैं?
हालांकि उन्होंने स्वयं ही अगले लोकसभा चुनाव में अपनी जीत की मुनादी यह कहकर कर दी कि अगले साल भी आप मुझे लाल किले की इस प्राचीर पर 15 अगस्त के अवसर पर एक वर्ष की उपलब्धियों के बारे में बोलते हुए सुनेंगे।

देश इसे सुनकर दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर है, और इस बड़बोलेपन की आलोचना हो रही है। हालांकि अपने भाषण के 5वें मिनट में ही मणिपुर का जिक्र कर संभवत: पीएम मोदी ने अपनी उस गलती को सुधारने की कोशिश की है, जिसके लिए समूचा देश और संसद में विपक्ष अड़ा रहा और आखिरकार सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के बाद पूरे सत्र के बीत जाने पर मोदी लोकसभा में अंतिम वक्ता के रूप में बोलने के लिए उपस्थित हुए थे।

मोदी जी ने इस बार अपने प्रिय संबोधन, भाइयों और बहनों को बदलकर अब परिवार जन कर दिया है। वे परिवार जनों को इतिहास में ले जाते हैं, और इतिहास को अपनी खास दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित करते हैं, जो आज देश को एकजुट करने के बजाय विभाजन में ले जाता है, विखंडित करता है।

वे आज से 1000-1200 वर्ष पहले के एक छोटे आक्रमण और एक छोटे राजा की पराजय की एक घटना को अगले 1000 साल तक देश को गुलामी की जंजीर में जकड़ते जाने की तस्वीर से जोड़ते हैं। यह एक ऐसा इतिहास है जिसकी व्याख्या आरएसएस/विश्व हिंदू परिषद के हिन्दुत्ववादी इतिहास की व्याख्या है, जिसमें मुख्य निशाने पर भारत के मुस्लिम समुदाय के लोग हैं, जो आज 20 करोड़ हैं।

इस हिंदुत्ववादी राजनीतिक इतिहास के बरखिलाफ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास और 1947 के बाद से 2014 तक का भारतीय समाज सिर्फ अंग्रेजों के शासनकाल को ही औपनिवेशिक काल समझता आया है। जिस तिरंगे को फहराकर भारतीय प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं, उसकी बुनियाद से लेकर लाल किले की प्राचीर तक भारत के हिंदू-मुस्लिम सामूहिक संघर्ष और भाईचारे की बुनियाद पर टिकी है।

1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम हिंदू-मुस्लिम सामूहिक नेतृत्व में लड़ा गया। सभी जानते हैं कि अंग्रेजों से पहले भारत राजा-रजवाड़ों और बादशाहत वाला देश था। देश की बादशाहत किसी के पास भी हो राजे-रजवाड़े-नवाब अपने-अपने इलाकों में कायम थे। अंग्रेजों तक ने इस व्यवस्था को जारी रखा, लेकिन अंग्रेज ही वे पहले शासक थे, जिन्होंने जो लूटा उसका बड़ा हिस्सा वे इंग्लैंड के खजाने में जमा करते थे।

भारत के औपनिवेशीकरण की कहानी अंग्रेजों से शुरू होती है और उन पर ही खत्म होती है। इससे पहले कब ऐसा हुआ? यदि मुस्लिम विदेशी आक्रमणकारी हुए तो हूण, कुषाण, मंगोल इत्यादि क्या हुए? कम से कम संवैधानिक पद पर सबसे जिम्मेदार नागरिक को यह कहने से पहले 100 बार सोचना चाहिए। इस लिहाज से पीएम मोदी का भाषण बेहद सतही था।

डेमोक्रेसी, डेमोग्राफी और डायवर्सिटी की त्रिवेणी का जिक्र कर मोदी ऐलान करते हैं कि यह त्रिवेणी भारत के सभी सपनों को साकार करने का सामर्थ्य रखती है। विश्व बूढ़ा हो रहा है, लेकिन हम जवान हो रहे हैं। लेकिन मोदी जी डेमोग्राफी (जनसांख्यकी) पर ही अटक जाते हैं, और दुनिया की हसरतभरी निगाहों की ओर इशारा करते हुए अपनी युवा जनसंख्या से बेइंतिहा आशाएं पालने लगते हैं।

यह वही विशाल आबादी है जिनके हाथों में किताब की जगह आज गौ-रक्षा, लव जिहाद और धर्म की रक्षा के लिए हथियार थमाने की हर संभव कोशिशें हर शहर और कस्बे में इन्हीं के भातृत्व संगठनों द्वारा की जा रही हैं। आज कॉरपोरेट की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि भारत के पास कुशल श्रमिक का भारी अभाव है।

पिछले माह ही एक चीनी कंपनी को न सिर्फ चीन से आयात की छूट सरकार ने दी है, बल्कि भारत में काम करने के लिए कुशल चीनी श्रमिकों की उपलब्धता को भी सुलभ कराया जा रहा है। इससे बड़ा दुर्भाग्य भला और कुछ हो सकता है? फिर युवा जनसंख्या वाला जुमला देश 2014 से ही सुन रहा है, फिर 9 वर्षों में अभी तक मोदी सरकार ने क्या किया?

इस पर बताने के बजाय घिसे रिकॉर्ड की तरह डेमोग्राफी की धुन को बजाने के सिवाय पीएम मोदी के पास शायद ठोस कुछ भी नहीं था कहने को। जहां तक डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) और डायवर्सिटी (विविधता) का प्रश्न है, इसका जिक्र कर आगे निकल जाने से बात बन जाती तो क्या बात थी। लेकिन आज लोकतंत्र और विविधता पर सबसे बड़ा ग्रहण यदि किसी ने लगाया है तो वह समूचे देश ही नहीं पूरी दुनिया को पता है।

मानसून सत्र की समाप्ति से ठीक पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति वाला विधेयक हो अथवा भारतीय दंड संहिता सहित तीन औपनिवेशिक कानूनों में आमूलचूल बदलाव के नाम पर अंग्रेजों को भी शर्मसार करने वाले दंड संहिता और राजद्रोह कानून के स्थान पर देशद्रोह कानून को प्रतिष्ठापित कर आम नागरिक के बुनियादी अधिकारों को खत्म करने की राह प्रशस्त करने वाली सरकार के मुंह से ये शब्द भी निकल गये, यह 15 अगस्त की ही महिमा का प्रताप कहा जा सकता है।

संविधान के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन की संभावना को तूल देने के लिए भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई के मुख से राज्यसभा में पहली बार चर्चा करवाने की कवायद असल में भविष्य के लोकतंत्र (तानाशाही) की एक झलक अवश्य देशवासियों को दिखा दी गई है, पिक्चर 2024 में रिलीज होनी है।


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