थैंक यू भागवत जी, हर मर्ज की रामबाण दवा बताने के लिए। इस दवा से देश के सारे दु:ख-कष्ट दूर हो जाएंगे। सारे संकट हट जाएंगे। सिर पर मंडराते परेशानी के सारे बादल छंट जाएंगे। बेरोजगारी, फुर्र। बीमारी-दु:खारी फुर्र। अशिक्षा, फुर्र। नाबराबरी, फुर्र। गंदगी, फुर्र। भूख, फुर्र। लाचारी, फुर्र। और सबसे बड़ी बात, धर्म, संस्कृति, राष्ट, सब की रक्षा का पक्का इंतजाम। हम दो, हमारे तीन। एक-दो बच्चे, कच्चे; बच्चे बस, तीन ही अच्छे!
पिछली सरकारें नासमझ थीं, जो अब तक हम दो, हमारे दो के चक्कर में पड़ी थीं। यह दावा ही गलत था। यह पश्चिम वाला गणित था, हमारा नहीं। पश्चिम वाले गणित में मियां, बीबी और बच्चों पर गिनती खत्म हो जाती है। हमारा भारतीय परिवार इससे अलग है, इसलिए हमारी गिनती भी अलग है। मियां-बीबी के साथ, मियां के मां-बाप में से दोनों नहीं तो कम से कम जरूर जुड़ता है; इसलिए हमारे गणित में संतुलन के लिए दो बच्चे कम पड़ जाते हैं। दो बच्चे, यानी आबादी अधोमुखी। पहले आबादी के बढ़ने की रफ्तार घटती है, फिर आबादी।
संस्कृति और धर्म को बचाना है, तो दो बच्चों से काम नहीं चलेगा। बच्चे, दो से ज्यादा ही अच्छे। पर दो से बहुत ज्यादा भी नहीं। चार-पांच-छ: भी नहीं। उससे भी संतुलन बिगड़ जाएगा। जितने ज्यादा मुंह होंगे, उतना ही ज्यादा भोजन की जरूरत होगी। जितने ज्यादा हाथ होंगे, उतने ही ज्यादा काम की जरूरत होगी। जितने ज्यादा सिर होंगे, उतनी ही ज्यादा छतों की जरूरत होगी। जितने ज्यादा बंदे होंगे, उतने ही ज्यादा स्कूल, अस्पताल, सडक, परिवहन, सब की जरूरत होगी। इसलिए, बच्चे दो से बहुत ज्यादा भी नहीं चाहिए। न दो और न चार, बच्चे तीन ही अच्छे। ये संघ के सौ साल के अनुभव का निचोड़ है। बच्चे, तीन ही अच्छे। और प्लीज, संघ के सौ साल के अनुभव की बात पर कोई हंसेगा नहीं। यह संघ का शताब्दी वर्ष है। सौ साल के अनुभव का इससे बड़ा सबूत क्या होगा। रही बात नागपुर कुनबे में कुंवारों के बोलबाले की, जहां कुंवारे तो कुंवारे, शादीशुदा भी लगभग कुंवारे बनकर रहते हैं, तो क्या शादी और बच्चों के संबंध में, बेचारे कुंवारों के अनुभव का कोई महत्व ही नहीं है? बात उल्टी है।
संघ के कुंवारों, धर्म के कुंवारों और अर्द्घ-कुंवारों से ज्यादा इसका ख्याल किसे होगा कि उनके हिस्से के बच्चों की जगह खाली है। इस खाली जगह को भरने के लिए भी तो उन्हीं को अतिरिक्त प्रयास करना होगा, जिनके यहां बच्चे हों। यानी दो से ज्यादा की गिनती तो चाहिए ही चाहिए। वर्ना बच्चे कम करने के लालच में हम देश, धर्म, संस्कृति सब खतरे में डाल देंगे। अभी न सही, हजार साल में सही, हजार साल में न सही, दस-बीस हजार साल में सही, एक न एक दिन घटते-घटते हम हिंदू इतने घट जाएंगे कि दुनिया के नक्शे से गायब ही जाएंगे। अपनी सौवें सालगिरह पर संघ आपसे यही एक गिफ्ट चाहता है। दो के बाद वाला फुलस्टॉप हटाने दो, तीसरे बच्चे को आने दो। माताओं को राष्टद्द्र और धर्म की सेवा का एक्स्ट्रा पुण्य कमाने दो।

