
अब तक डिम्बग्रंथि के कैंसर की कई सेललाइन व एनिमल मॉडल पर किया जा चुका है। इन प्रयोगों में यह पाया गया है कि ये फाइटोकेमिकल्स जब डिम्बग्रंथि के कैंसर की कीमोथेरेपी ड्रग्स के साथ इस्तेमाल होते हैं, तब यह बिना किसी दुष्प्रभाव के बहुत ही प्रभावी होते हैं और ड्रग्स की क्षमता को भी बढ़ाते हैं। हालांकि इन पर अभी तक क्लिनिकल ट्रायल नहीं किया गया है, इस पर भी शोधकर्ताओं को ध्यान देने की आवश्यकता है। स्त्रीरोग संबंधी कैंसरों में, डिम्बग्रंथि का कैंसर फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है। इसकी मृत्यु दर अन्य कैंसर के मुकाबले सबसे अधिक है। एपिथेलियल ओवेरियन कैंसर (एडउ) सभी डिम्बग्रंथि के कैंसर का लगभग 90 प्रतिशत है। प्रारंभिक अवस्था में इसके लक्षण दिखाई नहीं देने के कारण इसकी वृद्धि चुपचाप होती रहती है। इस कारण इस कैंसर का पता अधिकतर अंतिम अवस्था में ही चलता है।
यह विश्व में आठवां और भारत में तीसरा सबसे आम कैंसर है। यह सभी कैंसरों का लगभग 4 प्रतिशत है। भारत में इसकी मृत्यु दर सभी कैंसरों से होने वाली मौतों की 3.34 प्रतिशत है। डिम्बग्रंथि के कैंसर की 5 साल की जीवित रहने की दर इसकी अवस्था के समानुपाती होती है। यानी प्रारंभिक अवस्था में यह दर 93.1 प्रतिशत है, लेकिन जब यह कैंसर अंतिम अवस्था में या शरीर के दूसरे भागों में फैलता है तो इसकी दर 30.8 प्रतिशत हो जाती है।
डिम्बग्रंथि के कैंसर के लिए कई जांच परीक्षण किए जाते हैं जैसे ‘पेल्विक परीक्षा’, ‘ट्रांसवेजिनल अल्ट्रासाऊंड’ और ‘रक्त में उअ125 टेस्ट’। ट्रांसवेजिनल अल्ट्रासाऊंड स्क्रीनिंग भी कई बार गलत परिणाम दे सकती है। यह स्क्रीनिंग हमेशा घातक डिम्बग्रंथि ट्यूमर को बिनाइन मासेस (सामान्य गांठें जो शरीर के दूसरे भागों में फैलती नहीं हैं) से अलग नहीं कर पाती है, जैसे कि सिस्ट और फाइब्रोमा, जो आमतौर पर रजोनिवृति के बाद महिलाओं में पाए जाते हैं। ग्रामीण परिवेश की महिलाएं अपने व्यक्तिगत व गोपनीय कारणों से ‘ट्रांसवेजिनल अल्ट्रासाऊंड स्क्रीनिंग’ के लिए बाहर नहीं निकल पाती हैं। इसके अलावा कई बार इस स्क्रीनिंग की सुविधा उनके प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध भी नहीं होती है।
125, डिम्बग्रंथि के कैंसर का आमतौर पर प्रयोग में लाए जाने वाला बायोमार्कर (जिसका बढ़ना या घटना शरीर में किसी बीमारी का संकेत देता है) है। यह एक बड़ा ‘ट्रांसमेंब्रेन ग्लाइकोप्रोटीन’ है, लेकिन यह सामान्य डिम्बग्रंथि एपिथेलिया द्वारा व्यक्त नहीं किया जाता है। आम तौर पर, रक्त में उअ125 का सामान्य स्तर 0-35 यूनिट/मिलीलीटर माना जाता है, लेकिन यह प्रारंभिक अवस्था के डिम्बग्रंथि के कैंसर रोगियों में प्त50 प्रतिशत और अंतिम अवस्था के रोगियों में प्त90 प्रतिशत बढ़ जाता है। डिम्बग्रंथि के कैंसर में उअ125 एक गोल्ड स्टैंडर्ड ट्यूमर बायोमार्कर है
अन्य कैंसर और गैर कैंसर स्थितियों में भी उअ125 का रक्त में स्तर सामान्य से अधिक हो सकता है। एक अन्य बायोमार्कर ऌए4 है। यह मुलेरियन एपिथेलिया द्वारा स्रावित एक ग्लाइकोप्रोटीन है। उअ125 की तरह, यह भी सामान्य डिम्बग्रंथि एपिथेलिया द्वारा व्यक्त नहीं किया जाता है, लेकिन डिम्बग्रंथि ट्यूमर के उपप्रकारों द्वारा व्यक्त किया जाता है। जब प्रारंभिक अवस्था की बीमारी का पता लगाने के लिए उअ125 और ऌए4 टेस्ट को साथ में उपयोग किया जाता है, तो ये अकेले बायोमार्कर से बेहतर परिणाम देते हैं। हालांकि, प्रारंभिक अवस्था के रोग का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर अध्ययन की आवश्यकता है।
कुछ ऐसे बायोमार्कर की खोज की भी आवश्यकता है जो डिम्बग्रंथि के कैंसर के लिए विशिष्ट हो, जिसका स्तर केवल इस कैंसर में ही कम या ज्यादा हो, जो आसान स्रोतों (जिनके संग्रह के लिए किसी तकनीकी व्यक्ति विशेष की जरूरत ना हो और जिनको देने में भी रोगियों को किसी भी प्रकार की दिक्कत का सामना ना करना पड़े) जैसे लार (स्लाइवा), मूत्र (यूरिन) आदि से प्राप्त किए जा सके ताकि प्रारंभिक अवस्था में ही डिम्बग्रंथि के कैंसर का पता लगाया जा सके।
डिम्बग्रंथि के कैंसर के लिए 3 मानक उपचारों में सर्जरी (जिसमें जितना संभव हो उतना ट्यूमर हटाया जा सके), संयुक्त कीमोथेरेपी (जिसमें अलग-अलग ड्रग्स को संयोजित तौर पर इस्तेमाल किया जाता है) और लक्षित चिकित्सा (जिसमें विशिष्ट ट्यूमर कोशिकाओं को निकाला जाता है) शामिल है। लेकिन इन उपचारों की कई सीमाएं हैं जैसे-उच्च विषाक्तता, जिससे थकावट, एनीमिया, बालों का झड़ना, उल्टी सहित कई तरह के दुष्प्रभाव होते हैं और एक समय ऐसा आता है जब रोगी का शरीर उनके खिलाफ प्रतिरोध विकसित करना शुरू कर देता है। इन उपचारों की अन्य सीमाएं भी हैं जैसे प्रभावशीलता की कमी, उच्च लागत इत्यादि।
प्रतिरक्षा चिकित्सा एक नए प्रकार का उपचार है, जिसका क्लिनिकल ट्रायल में परीक्षण किया जा रहा है। कुछ प्राकृतिक तत्व, जिन्हें फाइटोकेमिकल्स के रूप में माना जाता है, जैसे वैकल्पिक उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। कई फाइटोकेमिकल्स जैसे कि सोयाबीन से मिलने वाला जेनिस्टीन, ग्रीन टी से मिलने वाला कैटेचिंस, ब्रोकली से मिलने वाला लूटियोलिन इत्यादि का प्रयोग
अब तक डिम्बग्रंथि के कैंसर की कई सेललाइन व एनिमल मॉडल पर किया जा चुका है। इन प्रयोगों में यह पाया गया है कि ये फाइटोकेमिकल्स जब डिम्बग्रंथि के कैंसर की कीमोथेरेपी ड्रग्स के साथ इस्तेमाल होते हैं, तब यह बिना किसी दुष्प्रभाव के बहुत ही प्रभावी होते हैं और ड्रग्स की क्षमता को भी बढ़ाते हैं। हालांकि इन पर अभी तक क्लिनिकल ट्रायल नहीं किया गया है, इस पर भी शोधकर्ताओं को ध्यान देने की आवश्यकता है।
उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, डिम्बग्रंथि के कैंसर के प्रति महिलाओं में जागरूकता अभियान चलाने की और उन्हें उचित चिकित्सा जांच व इलाज की सुविधाएं प्रदान करने की आवश्यकता है। शोधकर्ताओं को शरीर के आसान स्रोतों (लार, मूत्र इत्यादि) से मिलने वाले बायोमार्कर के प्रयोगों और फाइटोकेमिकल्स पर जो प्रयोग किए गए हैं, उनको भी अग्रिम चरणों में सफलतापूर्वक पहुंचाने की आवश्यकता है, जिससे डिम्बग्रंथि के कैंसर का प्रारंभिक अवस्था में ही पता किया जा सके और इसकी मृत्यु दर को कम किया जा सके।
(लेखिका अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर हैं)


