Thursday, April 25, 2024
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जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की समस्या

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Samvad


lalji jayswalदेश भर में पिछले दशकों के दौरान मूलभूत संरचना का ढांचा व्यापक रूप से विस्तारित किया गया है। वैसे तो कारागार का होना ही एक अच्छे समाज की निशानी नहीं है, परंतु अपराधियों को दंडित करने के लिए इसका होना भी आवश्यक है। परंतु बंदियों की निरंतर बढ़ती संख्या के अनुरूप हमारे देश में कारागारों का निर्माण नहीं हुआ है। साथ ही, क्षमता से अधिक भरी जेलों में बंद लगभग 78 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं, जिन पर अपराध साबित नहीं हुआ है और न्यायालय में मामला लंबित है। कई ऐसे मामले भी हैं जिनमें आरोपियों का लंबा समय जेल में गुजर रहा है, केवल इसलिए कि उन्हें अभियोग पक्ष, जो आमतौर पर स्वयं राज्य होता है, उसकी याचिका पर जमानत नहीं मिलती। कई ऐसे मामले भी हैं जिनमें आरोपी अपने पक्ष में वकील करने में सक्षम नहीं होता है या वह अपनी जमानती रकम का इंतजाम नहीं कर पाते, परिणामस्वरूप वह जेल में ही विचाराधीन कैदी बना रहता है।

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार जेल में बंद 68 प्रतिशत विचाराधीन कैदी या तो अनपढ़ थे या उन्होंने बीच में ही स्कूल छोड़ दिया था। लगभग 73 प्रतिशत विचाराधीन कैदी दलित, जनजातीय तथा अन्य पिछड़ा वर्गों के थे, जबकि 20 प्रतिशत मुस्लिम थे।

सर्वाधिक विचाराधीन कैदी जिन राज्यों में हैं उनमें शीर्ष पांच में दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, बिहार, पंजाब तथा ओडिशा शामिल हैं। इनके अलावा दूसरे राज्यों की जेलों में भी यही हाल है। बता दें कि भारत की जेलों में बंद केवल 22 प्रतिशत लोग ही सजायाफ्ता अपराधी हैं, जबकि लगभग 77 प्रतिशत बंदी विचाराधीन हैं।

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 में जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों को रखने पर चिंता जताई गई है। मध्य प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह की जेलों में विचाराधीन बंदियों की संख्या 60 प्रतिशत से कम है। अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मेघालय और पुडुचेरी को छोड़ हर राज्य/ केंद्र शासित प्रदेश में विचाराधीन कैदियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

आदर्श कारावास नियमावली के आधार पर सुधार के लिए प्रत्येक 200 कैदियों पर एक सुधारात्मक अधिकारी और हर 500 कैदियों पर एक मनोचिकित्सक होना चाहिए। इस लिहाज से 2,770 सुधारात्मक अधिकारी देश में होने चाहिए, लेकिन इनमें से केवल 1,391 पद ही आवंटित हैं, जिनमें 886 पर तैनाती की गई है।

नीतिगत तौर पर महिला स्टाफ का 33 प्रतिशत आरक्षण है, परंतु किसी भी राज्य में यह पूरा नहीं हुआ है। देश की जेलों में 13.8 प्रतिशत?महिला स्टाफ ही है। यह वर्ष 2020 एवं 2019 में क्रमश: 13.7 एवं 12.8 प्रतिशत था। कर्नाटक में 32 प्रतिशत स्टाफ महिलाएं हैं।

अब जेलों में सुधार के लिए कुछ विशेष बातों पर ध्यान देना होगा। प्रत्येक 30 कैदियों के लिए कम-से-कम एक वकील होना अनिवार्य है, जबकि वर्तमान में ऐसा नहीं है। पांच वर्ष से अधिक समय से लंबित छोटे-मोटे अपराधों से निपटने के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक न्यायालयों की स्थापना की जानी चाहिए।

इसके अलावा जिन अभियुक्तों पर छोटे-मोटे अपराधों का आरोप लगाया गया है और जिन्हें जमानत दी तो गई है, परंतु वे उसकी व्यवस्था करने में असमर्थ हैं, उन्हें व्यक्तिगत पहचान बांड पर रिहा किया जाना चाहिए। साथ ही उन मामलों में स्थगन नहीं दिया जाना चाहिए, जहां गवाह मौजूद हैं।

हमारे देश की लचर न्यायिक व्यवस्था का ही परिणाम है कि देश के कुल 1319 कारावास कैदियों की तय संख्या से अधिक से भरे पड़े हैं। प्रिजन स्टेटिस्टिक्स इंडिया 2021 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में देश में कुल कारावासों की संख्या 1306 थी जो वर्ष 2021 में बढ़ाकर 1,319 की गईं।

इस तरह से जहां इस दौरान कैदियों की संख्या में करीब 12 प्रतिशत की तेजी आई वहीं कारावासों की संख्या में केवल एक प्रतिशत की ही वृद्धि की गई। इन 1319 जेलों में से 564 उप कारागार, 424 जिला कारागार, 148 केंद्रीय कारागार, 88 खुले कारागार, 32 महिला कारागार, 19 बोर्स्टल स्कूल और तीन अन्य तरह के कारागार हैं।

इनमें से सबसे अधिक कारागारों की संख्या राजस्थान में 144 है, जबकि तमिलनाडु में 142, मध्य प्रदेश में 131, आंध्र प्रदेश में 106, ओडिशा में 92 और उत्तर प्रदेश में 75 कारागार हैं।

देश के कारावासों में इतनी बड़ी संख्या में कैदियों के होने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि जिस संख्या और जिस तेजी से कैदी इन कारावासों में लाए जाते हैं उस तेजी से अदालतों में इनके मामलों का निपटारा नहीं हो पाता है।

परिणामस्वरूप कारावासों में कैदियों की संख्या में कमी नहीं हो पाती।
ऐसे में यह आवश्यक है कि मामलों को जल्द निपटाकर देश की अदालतों के अलावा कारावासों का भी बोझ कम किया जाए। कैदियों को प्रभावी कानूनी सहायता प्रदान करना और व्यावसायिक कौशल एवं शिक्षा प्रदान करने हेतु आवश्यक कदम भी उठाए जाने चाहिए।

अपराधियों को जेल भेजने के बजाय अदालतें उनकी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग कर जुर्माना और उन्हें चेतावनी के सकती हैं। अधिकांश विचाराधीन कैदी जो गरीब अथवा सामान्य परिवारों से हैं, उन्हें जमानत पर छोड़ दिया जाना चाहिए। वर्तमान सरकार ने इस संबंध में 1800 से अधिक पुराने कानूनों की पहचान की है और 1450 से अधिक ऐसे कानूनों को रद कर दिया है जो अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।

लोगों को जेल भेजने से रोकने के लिए कानून बनाने के अतिरिक्त यह भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस, अभियोग पक्ष की एजेंसियों के साथ-साथ न्यायपालिका की मानसिकता में भी बदलाव आना चाहिए। ऐसा होने पर जेल में बंदियों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है।


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