Wednesday, March 18, 2026
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पाठशालाओं में सियासत की शिक्षा

सियासत जो न करा दे, वही सही है। किसी ने किसी राजनीतिक दल के अलंबरदारों की स्तुति के लिए सामान्य पाठशाला में ही अलग से पाठ्यक्रम पढ़ाना शुरू कर दिया, तो किसी ने अपने मजहब की स्तुति ही बच्चों को पढ़ानी शुरू कर दी। तिस पर दुहाई लोकतंत्र में अभिव्यक्ति के अधिकार की। सियासी अलम्बरदार भी खुश और उनके दल के अनुयायी भी खुश। अभी तक बेसिक शिक्षा की पुस्तकों में हिंदी और अंग्रेजी की वर्णमाला में अक्षरों की पहचान अपने आस पास की विशेष वस्तुओं से कराई जाती थी, ताकि बच्चे अक्षरों व वस्तुओं में सरलता से सामंजस्य बिठा सकें । अक्षरों की पहचान कर सकें। भला हो प्रचार तंत्र का अक्षरों की पहचान को भी सियासी रंग से रंग दिया गया।

प्राथमिक पाठशाला का नाम बदल कर किसी ने पिछड़ा, दलित अल्पसंख्यक पाठशाला ही रख दिया, गोया बच्चों के चेहरे पर लगे पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के ठप्पे के आधार पर ही इस पाठशाला में प्रवेश देकर मनमाने प्रतीक बताकर अक्षरों की अलग पहचान बताई जाएगी। सरकारी स्कूलों में बरसों से हिंदी अक्षर सिखाने व समझाने के लिए काले बरखे वाली किताब पढ़ाई जाती थी, जिसमें अ से अनार, आ से आम, छोटी इ से इमली, बड़ी ई से ईख पढ़ाई जाती रही। ऐसे ही अंग्रेजी की पुस्तक में ए फॉर एप्पल, बी फॉर बॉय, सी फॉर कैट, डी फॉर डॉग, ई फॉर एलिफेंट पढ़ाया जाता रहा। सियासी पाठशाला ने तो पढ़ाने का तरीका ही बदल दिया, सियासी दल की की टोपी पहनकर अध्यापक ने काले बरखे वाली किताब के अक्षरों की पहचान बदल कर अ से अनार की जगह अपने सियासी दल के मुखिया का नाम बताना शुरू कर दिया।

ऐसा भी हो सकता है कि महंगाई के दौर में अनार बच्चों की समझ में न आए , मगर सियासी मुखिया समझ में कैसे आएगा, इससे सिखाने वाले को कोई सरोकार नहीं था। अंग्रेजी वर्णमाला में भी ए फॉर एप्पल के पर्याय बताए गए कि ए फॉर सियासी पार्टी का मुखिया, डी फॉर डॉग डी फॉर सियासी मुखिया की बहू। बच्चों की राजनीतिक दलों के प्रति रुचि जागृत करने के लिए यह प्रयोग अनुकरणीय व अभिनंदनीय है। सभी सियासी दलों को अपने अपने दल नेताओं और नीतियों के प्रसार हेतु ऐसे प्रयोग किये जाने चाहिएं , मसलन एक राष्ट्रीय दल आर फॉर विपक्षी गठबंधन का नेता, पी फॉर विपक्षी गठबंधन के मुखिया की बहन, एस फॉर बहन भाई की मम्मी कहकर बच्चों को अपनी पार्टी से परिचित करा सकता है, दूसरा राजनीतिक दल ए फॉर अपने दल का नेता, एन फॉर अपने दल का अंतरराष्ट्रीय नेता, वाई फॉर योगी, पढ़ा सकते हैं।
ऐसे ही अनेक व्यक्तित्वों से बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी की वर्णमाला से यदि परिचित कराया जाएगा, तो बच्चों के ज्ञान को अप टू डेट करने में आसानी होगी ही। वैसे भी शिक्षा में प्रयोगधर्मिता अनिवार्य है। प्रचार का युग है और इस युग में जैसे भी हो, सभी को अपनी अपनी पाठशालाएं खोलकर अपने अपने पाठ्यक्रम निर्धारित करने और पढ़ाने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए।

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