Thursday, April 2, 2026
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आरक्षण में बड़ा उलटफेर, बिगड़े राजनीतिक समीकरण

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: शनिवार को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के घोषित हुए आरक्षण ने कई दिग्गजों के अरमान ठंडे कर दिये। आरक्षण में बड़ा उलटफेर हुआ हैं,जो संभावित प्रत्याशी चुनाव की तैयारी में जुटे हुए थे, उन्हें बड़ा झटका लगा है। जो वार्ड पिछले आरक्षण में ओबीसी के लिए आरक्षित कर दिये गए थे, वो अनारक्षित घोषित होने से चुनावी गणित बदल गया है। भाजपा के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष कुलविंदर सिंह को बड़ा झटका लगा है, वो वार्ड एक से चुनाव लड़े थे। इस बार वार्ड-एक एससी महिला के लिए आरक्षित कर दिया गया हैं।

ऐसे में उन्हें भी अपना कार्यक्षेत्र बदलना पड़ेगा। उनका नया राजनीतिक ठिकाना कहां होगा? अभी कहना मुश्किल है। वार्ड दो, तीन व 25 गुर्जर बहुल है, वहां से भी कुलविंदर चुनाव लड़ सकते हैं। वार्ड दो से पहले सपा नेता अतुल प्रधान की पत्नी सीमा प्रधान चुनाव लड़ी थी। वह जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। सीमा प्रधान चुनाव लड़ेगी या फिर नहीं, फिलहाल इसके संकेत नहीं मिले हैं।

वार्ड-10 से 17 तक जिला पंचायत सदस्यों के लिए अनारक्षित घोषित हुआ है। पहली सूची में ये वार्ड आरक्षित घोषित कर दिये गए थे। वार्ड-13 से पहले सपना हुड्डा जिला पंचायत सदस्य थी। इस बार भी उन्होंने चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। सपना हुड्डा के साथ-साथ उनके पति प्रदीप हुड्डा भी वार्ड-14 से चुनाव लड़ सकते हैं। पति-पत्नी दोनों जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ेंगे।

वार्ड-13 से भाजपा नेत्री मीनाक्षी भराला भी चुनाव लड़ सकती हैं। पिछली बार मीनाक्षी वार्ड-15 से चुनाव लड़ी थी। भाजपा नेता सुरक्षित वार्ड तलाश रहे हैं। वार्ड-22 से ओमपाल गुर्जर तैयारी कर रहे हैं। यह वार्ड अनारक्षित घोषित हुआ है। पिछली बार आरक्षित घोषित होने से उन्हें झटका लगा था। भाजपा नेता विमल शर्मा भी चुनाव लड़ सकते हैं। वार्ड-25 से उनके चुनाव लड़ने की चर्चाएं है।

वार्ड-30 से पिछली बार पूर्व कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर के पुत्र नवाजिश चुनाव लड़े थे। इस बार यह वार्ड महिला के लिए आरक्षित हुआ हैं, जिसके चलते शाहिद मंजूर ने अपने परिवार से किसी को भी चुनाव नहीं लड़ाने की बात कही है। इस तरह से जिला पंचायत वार्ड़ों के आरक्षण की सूची ने बड़ा उलटफेर कर दिया है।

बहुत का राजनीतिक गणित भी गड़बड़ा गया है। फिलहाल कौन-कहां से चुनाव लड़ेगा, स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। क्योंकि कुछ भाजपा नेता कृषि कानून के खिलाफ किसानों के चल रहे आंदोलन से राजनीतिक समीकरण भी बिगड़ गए हैं।

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