
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते यहां ‘लोकतान्त्रिक’ तरीके से होने वाले आम चुनाव हमेशा ही पूरे विश्व के लिए कौतूहल का विषय होते हैं। समय समय पर इस विराट चुनावी प्रक्रिया को करीब से देखने व समझने के लिये विदेशों से भी वहां के संसदीय प्रतिनिधिमंडल तथा अंतरराष्ट्रीय चुनावी विशेषज्ञ आते रहते हैं, परंतु सवाल यह उठता है कि क्या हमारे देश के शत प्रतिशत मतदाता वास्तव अपने अपने मताधिकार का प्रयोग पूरी स्वतंत्रता व स्वविवेक के साथ करते हैं? क्या भारतीय मतदाताओं का एक बड़ा अर्थात निर्णयकारी वर्ग वास्तव में जनसमस्याओं, देश की प्रगति, विकास, सड़क, बिजली, पानी, उद्योग, रोजगार, स्वास्थ्य, मंहगाई जैसे मुद्दों को सामने रखकर ही मतदान करता है? और यदि जनता स्वविवेक से मतदान करती है, उस पर किसी तरह का धर्म-जाति-पंडित-गुरु-अथवा मौलवी के फतवों का प्रभाव नहीं होता फिर आखिर देश की संसद व विधानसभाओं में सांप्रदायिक, अपराधी, जातिवादी, निठल्ले, अशिक्षित,विचारविहीन और लुटेरी प्रवृति के लोग विभिन्न सदनों में कैसे पहुंच जाते हैं?
सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सियन लूंग ने गत 15 फरवरी को सिंगापुर की संसद में एक टिप्पणी की, ‘नेहरू का भारत अब ऐसा बन गया है, जहां मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार लोकसभा के आधे से अधिक सांसदों के विरुद्ध बलात्कार, हत्या जैसे आरोपों सहित अनेक आपराधिक मामले लंबित हैं। हालांकि यह भी कहा जाता है कि इसमें से कई आरोप राजनीति से प्रेरित हैं।’ हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने ली सियन लूंग के उपरोक्त वक्तव्य पर आपत्ति व असहमति जताते हुए कहा कि भारत के संबंध में ली सीन लूंग का यह बयान ‘गैर-जरूरी’ और ‘अस्वीकार्य’ है।
परंतु क्या भारतवासियों के लिए यह सोचना व चिंतन करना जरूरी नहीं कि विदेशी नेताओं को आखिर भारत की वर्तमान राजनैतिक दुर्दशा पर उंगली क्योंकर उठानी पड़ती है? किसी कड़वे सच को अस्वीकार करने के बजाये क्या हमें आत्म चिंतन व आत्मावलोकन करने की जरूरत नहीं? क्या मंदिर – मस्जिद, हिंदू-मुसलमान, धर्म जाति, ऊंच नीच, क्षेत्र, भाषा, गाय, लव जिहाद, हिजाब, वन्देमातरम, कब्रिस्तान, शमशान, जिन्ना, औरंगजेब जैसे मुद्दों को आगे रखकर लड़े जाने वाले चुनाव व इन्हीं मुद्दों को गरमा व भरमा कर चुनाव जीतने वाले जनप्रतिनिधियों से हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि वे जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर भी काम करेंगे? राजनेताओं के भाषण भी ऐसे होने लगे हैं गोया वे अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी को अपना व्यक्तिगत दुश्मन मानने लगे हों। कोई किसी को आतंकवादी बता रहा है तो कोई चुनाव के बाद ‘गर्मी निकालने’ की धमकी दे रहा है। कोई बुलडोजर चलाने की बातें कर रहा है। कोई पाकिस्तान भेज रहा है तो कोई बंगाल, कश्मीर व केरल से तुलना कर सांप्रदायिकता का भ्रमपूर्ण भय पैदा कर रहा है।
हमारे देश में विभिन्न धर्मों व जातियों में तथाकथित राजनैतिक धर्मगुरुओं की भी भरमार है। इनमें तमाम ऐसे हैं, जो सत्ता के करीब भी रहना चाहते हैं और सत्ता से लाभ भी उठाना चाहते हैं और उठाते रहते हैं। प्राय: देखा गया है कि यह धर्म गुरु अपने अनुयायियों को निर्देश अथवा फतवे जारी करते रहते हैं। इनके निर्देश अथवा फतवे आम तौर पर इस बात से प्रेरित होते हैं कि किसी धर्मगुरु के साथ सत्ता अथवा धर्मगुरु द्वारा समर्थन दिए जा रहे दल का व्यवहार कैसा है। इस स्थिति में इन ‘स्वयंभू अध्यात्मवादियों’ का सीधा संबंध राजनीति से स्थापित हो जाता है। और इनकी कोशिश होती है कि इनके अनुयायी इनके निर्देश व फतवे के अनुसार ही मतदान करें। गोया किसी धर्मगुरु के लाखों करोड़ों अनुयायी अपने गुरु अथवा मौलवी मौलाना के दिशानिर्देश पाते ही अपना स्वविवेक ताख पर रखकर अपने बहुमूल्य मताधिकार को गोया गिरवी रख देते हैं। ऐसी स्थिति में जीतने वाला प्रत्याशी अपराधी है, सांप्रदायिक, जातिवादी अथवा भ्रष्ट है यह बातें कोई मायने नहीं रखतीं।
क्या राजनेता तो क्या धर्माधिकारी इनका एक बड़ा समूह इन दिनों अपने जहरीले शब्दों, अनैतिक दिशानिर्देशों व फतवों के चलते भारतीय राजनीति के चेहरे को कुरूपित कर रहा है। ऐसे लोग जनसरोकारों की बातें करने के बजाये मतदाताओं को कभी ‘गर्व’, कभी ‘स्वाभिमान’ ,कभी ‘सम्मान’, कभी राष्ट्रवाद तो कभी ‘अस्तित्व’ बेचने लगते हैं। और हमारे देश के भोले भाले मतदाता आसानी से ऐसे पाखंडी राजनेताओं व स्वार्थी स्वयंभू धर्मगुरुओं की बातों के झांसे में आ जाते हैं। ऐसी स्थितियां इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिये पर्याप्त हैं कि हमारे देश में राजनीतिक स्तर में गिरावट के मुख्य कारण क्या हैं और क्यों हमारे देश को लेकर विदेशों में अब नकारात्मक चर्चाएं होने लगी हैं?
हमें मुंह छुपाने की नहीं बल्कि दर्पण देखकर आत्मावलोकन करने की जरूरत है। इतना ही नहीं, बल्कि जहां हमें स्वविवेक से अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने की जरुरत है वहीं अनुयाइयों को भ्रमित करने वाले धर्मगुरुओं के स्वार्थपूर्ण ‘राजनैतिक फतवों’ से भी सचेत रहने की जरूरत है। भारतीय मतदाताओं की जागरूकता व उनका जनसरोकारों के मद्देनजर किया जाने वाला विवेकपूर्ण मतदान ही देश की दिशा व दशा को भी बदल सकता है साथ ही भारत की गिरती जा रही राजनैतिक साख से भी बचा सकता है।
निर्मल रानी


