Thursday, March 19, 2026
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हिंदी विरोध की सियासत

Samvad 47

त्रिभाषा नीति को लेकर तमिलनाडु में फिर से हिंदी विरोध की राजनीति गरमा गई है। नई शिक्षा नीति के तीन भाषा फॉम्युर्ले के जरिए तमिलनाडु सरकार लगातार केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर हिंदी थोपने का आरोप लगा रही है। तमिलनाडु को केंद्र सरकार से सर्व शिक्षा अभियान के तहत फंड नहीं मिला। वहां के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि राज्य के 2,152 करोड़ रुपये जारी नहीं किए गए हैं। उन्होंने यह पैसा जारी करने की मांग की। दरअसल, फंड के लिए राज्यों को नई शिक्षा नीति के प्रावधान लागू करने हैं, जिनमें तीन भाषा नीति भी शामिल है। इतिहास के पन्ने पलटें तो तमिलनाडु में हिंदी विरोध का लंबा इतिहास है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने दक्षिण भारत में वर्ष 1918 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। वे हिंदी को भारतीयों को एकजुट करने वाली भाषा मानते थे। तब ही तमिलनाडु में हिंदी विरोध शुरू हो गया था। भाषा को लेकर संकीर्ण सोच से ऊपर उठने के बजाय राज्य के नेता इस मुद्दे पर राजनीति चमकाने में जुटे हैं।

नई शिक्षा नीति को लेकर तमिलनाडु का कई मसलों पर विरोध है। लेकिन द्रविड अभिमान पर गठित हुए इस राज्य की मुख्य आपत्ति तीन-भाषा फॉमूर्ला को लेकर है। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी एनईपी 2020 के तहत प्रस्तावित तीन-भाषा नीति एक शैक्षणिक ढांचा है। आसान शब्दों में कहें तो इसका अर्थ यह है कि बच्चों को तीन भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए। अगर पहली भाषा की बात करें तो यह आमतौर पर छात्र की मातृभाषा या राज्य की क्षेत्रीय भाषा होगी। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में तमिल, महाराष्ट्र में मराठी। दूसरी भाषा में कोई अन्य भाषा हो सकती है। लेकिन केंद्र सरकार अक्सर हिंदी को इस संदर्भ में प्रोत्साहित करती है, खासकर गैर-हिंदी भाषी राज्यों में, ताकि राष्ट्रीय एकता मजबूत हो। हालांकि, यह अनिवार्य नहीं है और राज्य अपने हिसाब से दूसरी भाषा चुन सकते हैं। तमिलनाडु का विरोध इसी बिंदु है।
असल बात यह है कि तमिलनाडु की राजनीति में पिछली सदी के साठ के दशक से ही स्थानीय द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व बना हुआ है। कभी डीएमके तो कभी एआईएडीएमके जैसी स्थानीय पार्टियां ही सत्ता की मलाई खाती रही हैं। सही मायने में देखें तो ये महज स्थानीय पार्टियां ही नहीं हैं, बल्कि अपने-अपने हिसाब से तमिल उपराष्ट्रीयता का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। तमिल उपराष्ट्रीयता होना बुरी बात नहीं है, लेकिन वह राष्ट्रीयता पर हावी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यह कड़वा सच है कि तमिल उपराष्ट्रीयता राष्ट्रीय मूल्यों पर हावी रहती रही है। तमिल उपराष्ट्रीयता के ही जरिए द्रविड़ राजनीति तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज रही है। लेकिन संचार और सूचना क्रांति के दौर में अब तमिल उपराष्ट्रीयता वाली सोच को लगने लगा है कि अगर हिंदी आई तो उसके जरिए राष्ट्रीयता की विचारधारा मजबूत होगी। जिसका असर स्थानीय राजनीति पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा। हिंदी या किसी भी सामान्य संपर्क भाषा के ज्यादा प्रचलन से कट्टरतावादी स्थानीय सोच को चोट पहुंचेगी और इसके साथ ही तमिल माटी में राष्ट्रीय राजनीति की जगह मजबूत होगी। जिसका आखिर में नतीजा हो सकता है कि द्रविड़ राजनीति की विदाई। कह सकते हैं कि स्टालिन को यही डर सताने लगा है।

तीन भाषा नीति का हालिया विरोध ऐसे वक्त में हो रहा है, जब दक्षिण के राज्य परिसीमन को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। उन्हें डर है कि परिसीमन होने पर लोकसभा में दक्षिण के राज्यों की सीटें कम हो सकती हैं, जिससे केंद्र में उनकी आवाज कमजोर हो जाएगी। ऐसे में परिसीमन और हिंदी का विरोध एक साथ चल रहा है और दोनों एक-दूसरे को मजबूती दे रहे हैं। दरअसल, परिसीमन के बाद लोकसभा और विधानसभा की सीटों में बदलाव होगा। जनसंख्या के लिहाज से उत्तर भारत का पलड़ा भारी है। दक्षिण भारत के राज्यों को यही डर है कि जनसंख्या नियंत्रण पर बेहतर काम का उन्हें नुकसान न उठाना पड़े। वैसे गृहमंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि परिसीमन में दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें कम नहीं होंगी। लेकिन ऐसा होगा कैसे, यह सवाल उठाते हुए दक्षिण भारत में विरोध जारी है।

वास्तव में बीजेपी जब भी तमिलनाडु और दूसरे दक्षिणी राज्यों में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश करती है, उसे हिंदी के नाम पर घेरा जाता रहा है। डीएमके सहित दूसरी पार्टियां हिंदी विरोध और द्रविड़ अस्मिता के नाम पर मैदान में उतर जाती हैं। 2019 में भी हिंदी को लेकर विवाद बढ़ा था, फिर तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टियों को बीजेपी की घेराबंदी का मौका मिल गया था। तब हिंदी दिवस पर अमित शाह ने कहा था कि हमारे देश में कई भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन एक भाषा होनी चाहिए जो देश का नाम दुनिया में बुलंद करे और हिंदी में यह खूबी है। इसके बाद दक्षिण के राज्यों में काफी विरोध हुआ और निशाने पर बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दोनों आए। बीजेपी के नेता हालांकि वक्त-वक्त पर कहते रहे हैं कि बीजेपी न भाषा विरोधी पार्टी है, न दक्षिण विरोधी पार्टी, और यह कि उनकी विचारधारा सबको साथ लेकर चलने की है। लेकिन दक्षिण के राज्यों में क्षेत्रीय दल बीजेपी को उत्तर भारत की पार्टी के तौर पर प्रचारित कर उस पर निशाना साधते रहे हैं। 2022 में केंद्र सरकार ने काशी-तमिल संगम की शुरूआत की। इसके जरिए काशी और तमिल को करीब लाने और दक्षिण को उत्तर भारत की सांस्कृतिक एकता से जोड़ने की कोशिश बीजेपी कर रही है।

हिंदी विरोध को लेकर राजनीति भले ही वक्त-वक्त पर गरम होती रहती है, लेकिन तमिलनाडु में आम लोगों में हिंदी को लेकर विरोध वैसा नहीं दिखता, जैसा नेता दिखाते हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए 1918 में चेन्नै में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की गई, जो आज भी सक्रिय है। सभा यहां हिंदी सिखाने का काम कर रही है। यहां हिंदी पढ़ने वाले तकरीबन 65 फीसदी लोग तमिल भाषी हैं। हिंदी प्रचार सभा से हिंदी सीखने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बीजेपी नेता अब इस लाइन पर भी लोगों से बात कर रहे हैं। हालांकि इसका कितना असर होगा, यह देखना होगा।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के हिंदी विरोध के खिलाफ तमिलनाडु के भीतर ही आवाज उठने लगी है। बड़ी आईटी कंपनी जोहो के संस्थापक श्रीधर वेंबू ने तमिलनाडु के युवाओं से हिंदी सीखने की अपील की है। इसके साथ ही इसे राजनीति से दूर रखने का भी अनुरोध किया है। एक्स पर अंग्रेजी में लिखी पोस्ट के आखिर में उन्होंने ‘आइए हिंदी सीखें’ की। श्रीधर वेंबू ने अपनी पोस्ट में बताया कि उनकी कंपनी में काम कर रहे तमिलनाडु के युवाओं को हिंदी न जानने के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस मसले का सर्वमान्य हल निकालने के प्रयास संकीर्ण सोच और ओछी राजनीति की बजाय खुले मन से होने चाहिए, संकीर्णता से नहीं।

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