Thursday, February 22, 2024
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जनसंख्या आपदा या जन संपदा

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Samvad 52


dr mejar himanshuजनसंख्या विस्फोट का जिक्र और इसके जिक्र में फिक्र, बचपन से हमने ही नहीं, देश के हर उम्र के थोड़ी भी सामान्य जानकारी रखने वाले हर नागरिक ने देखी सुनी है। सुनने में आ रहा है कि हमने इस मोर्चे पर चीन को पीछे छोड़ दिया है या जल्दी ही पछाड़ने वाले हैं। भीड़भाड़, प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, बेरोजगारी, बीमारी, अपराध, संसाधनों पर दबाव से लेकर देश की हर समस्या का ठीकरा हम भारी जनसंख्या पर फोड़ सकते हैं या फोड़ते है। अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ यह ठीकरा फोड़ने की सुविधा आमजन और बुद्धिजीवियों से लेकर शासन प्रशासन तक देश में हर किसी को है। हमें यह भीड़ पसंद नहीं आती और यह भीड़ हम ही हैं, हम से है। इन समस्याओं के लिए जनसंख्या दोषी है, पर इस भारी भरकम जनसंख्या के लिए कौन दोषी है? वह भी इस परम्परा और संस्कारों पर गर्व करने वाले संयमी देश में!

इस सवाल पर वर्चस्व की खातिर अपनी-अपनी जमात से तादाद बढ़ाने का आह्वान करने वाले कबाइली सरदारों में परस्पर दोषारोपण की मानों जंग ही छिड़ जाती है। समाधान फिर भी नहीं। हमारे देश में जनसंख्या वोट है और वोट की राजनीति भी। इस मुद्दे पर बहस और चिंता आम है।

गंभीर, सार्थक, चिंतन या योजना नदारद। अन्यथा क्यों इतने सालों से हम अपनी बढ़ती आबादी को कोसते भी आ रहे हैं और बेहिसाब बढ़ाते भी। यह तथ्य हमारा भ्रमित चेहरा उजागर करता है। इसमें आचार्य वात्साययन जी की कोई गलती नहीं।

उनकी साहित्यिक कृति, ‘कामशास्त्र’ को तो यहां ज्यादातर लोगों ने पढ़ना छोडिए सुना भी नहीं है। मनुष्य ही नहीं, सभी जीवों में प्रजातियों का प्रवर्द्धन, प्रजनन, गुणन, अपनी-अपनी अस्तित्व रक्षा और वर्चस्व स्थापना का नैसर्गिक गुण है।
अपने इस भूभाग में जनसंख्या विस्फोट का एक प्रमुख कारण प्रकृति का मेहरबान होना भी है।

खुशगवार मौसम, उपजाऊ भूमि, पानी व खनिज पदार्थों की सहज उपलब्धता ने इस भूभाग को जीवन अनुकूल बनाया है। विकास व प्रगति की भौतिक अवधारणाएं व मॉडल बहस के मुद्दे हो सकते हैं, पर सामान्य आंकलन तो स्थापित प्रचलित मापदंडों के आधार पर ही होगा।

तथ्यों नहीं अवधारणाओं के आधार पर अपने को श्रेष्ठ और अफ्रीकियों को जंगली व पश्चिमी देशों को असंस्कारी घोषित करना, आम देशवासी का राष्ट्रीय अधिकार सा बन गया है। प्रतिकूल व चरम जलवायु और परिस्थितियों के बावजूद इन देशों ने अपना वर्चस्व और व्यवहारिक भौतिक प्रगतिशीलता साबित की है।

कम जनसंख्या, विशेषकर युवा, दक्ष, कुशल कामकाजी आयु वर्ग की आबादी की कमी की पूर्ति यह देश तकनीकी विकास, मशीनीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकास और बाहरी ठेकों या आऊटसोर्सिंग द्वारा कर रहे हैं। बाकी बची खुची कमी को पिछड़े, संकटग्रस्त अशांत देशों के विस्थापितों-प्रवासियों को अपने यहां बसाकर।

दुनिया के हमारे ही भूभाग में चीन ने अपनी भारी भरकम जनसंख्या को कीमती मानव संसाधन-संपदा की तरह कृषि सुधारों व छोटे-बड़े उद्योगों के उत्पादन में समायोजित कर, इस सदुपयोग से अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है। सीमित संसाधनों पर बोझ हटाने के लिए चीन ने दृढ, राजनीतिक इच्छा शक्ति से 1980 में ‘एक संतान नीति’ लागू की।

2015 में व्यवहारिक नियोजन के तहत अपनी बुजुर्गों की बढ़ती तादाद की चुनौती के पेशे नजर, चीन ने ‘एकल संतान नीति’ हटा भी दी। दूसरी ओर भारत जनंसख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को अंजाम तक पहुंचाने में संतोषजनक कामयाबी भी हासिल नहीं कर सका। आज दुनिया के बड़े देशों में सबसे ज्यादा युवा और 15-59 साल आयु वर्ग की कामकाजी जन संपदा भारत के पास है।

यह हमारी उपलब्धि नहीं महज जनसंख्या चक्र का खेल है। भारत का बचपन घट रहा है और उसकी जवानी बुढ़ापा बढ़ रहा है। युवाओं को रोजगार, कौशल और उत्पादन से न जोड़कर इस बेशकीमती संपदा, अवसर और रणनीतिक बढ़त को भी हम गंवा रहे हैं। रणनीति और दूरदर्शिता से दूर पकौड़ तलने की युवा को सलाह या तर्क, हास्यपद ही नहीं, दुर्भाग्यपूर्ण भी है।

जहां कुछ विकसित देश कौशल युक्त नागरिक जनसंख्या को तरस रहे हैं, वही किसी भी कौशल विकास मंत्रालय से ज्यादा सक्षम तो अपने देश के कुछ वर्ग (जिन पर जनसंख्या बढ़ाने का ठीकरा फोड़ा जाता है) के लोग मानो परंपरागत कौशल विकास के कुटीर सरीखे संस्थान चला रहे हैं, जिन्हें कोई मान्यता नहीं और व्यवस्था गत सहयोग का भी अभाव है।

दुनिया के इतिहास में आर्थिक प्रगति कभी भी बिना जनसंख्या वृद्धि के नहीं दिखी। राज के रोजगार सृजन, निवेश आकर्षण और अनुकूल वातावरण बनाए बिना यह प्रगति संभव नहीं।

इसके विपरीत अनियोजित जनसंख्या वृद्धि बेरोजगारी, अकाल, भूखमरी, बीमारी, कुपोषण, अराजकता और अस्थिरता का कारण जरूर बनती है। आज जवान जनसंख्या के लाभांश को हम गंवाएंगे तो कल बूढ़ी आबादी के दोगुने बोझ तले हम पिस जाएंगे।

दुनिया के विकसित देश जनसंख्या चक्र के चरण के मामले में हमसे एकदम उलट स्थिति में हैं। कुल जनसंख्या से ज्यादा महत्व कामकाजी आयु वर्ग की जनसंख्या के औसत का है। चीन और जर्मनी में कामकाजी आयु वर्ग जनसंख्या औसत घटा तो उन्होंने नीतिगत और तकनीकी समाधान खोज निकाले।

जर्मनी, कनाडा और आस्ट्रेलिया ने मशीनीकरण और प्रवासियों को अपने यहां बसा इसकी भरपाई की। प्रजनन प्रोत्साहन को रियायतें दीं। चीन ने 2015 में तुरंत एक संतान नीति हटाई। आज जनसंख्या चक्र के इस चरण में सिर्फ चीन, जर्मनी नहीं दुनिया के 30-40 देश है।

इन देशों ने रिटायरमेंट की उम्र को भी बढ़ाया है। ऐसा नहीं इन नीतियों का लाभ ही हुआ है। वहां प्रवासियों के खिलाफ उग्र संघर्ष तक हुए हैं। पैदाइश से 15 वर्ष की कामकाजी आयु आने तक यह जनसंख्या उपभोक्ता है, उत्पादक नहीं।

बेहतर इलाज सुविधाओं से औसत मृत्यृ दर विशेषकर शिशु मृत्यु दर घटी है और जीवन प्रत्याशा व औसत जीवन आयु बढ़ी है। इससे भी जनसंख्या बढ़ी। देर उम्र में प्रजनन व परिवार नियोजन ने महिलाओं के जीवनकाल के औसत प्रजनन दर को घटा दिया है।

शिक्षित व कामकाजी होने का भी प्रजनन दर से विपरीत समीकरण ही है। दुनिया की प्रति महिला औसत प्रजनन दर 1960 के 4.9 से घटकर 2.5 पहुंच गई। प्रतिस्थापन दर (रिप्लेसमेन्ट कैक्टर) के 2.1 से नीचे जाने पर कुल जनसंख्या घटने लगती है।

कोई आश्चर्य नहीं हमारे देश के विपरीत इन देशों की सरकारें ज्यादा बच्चे पैदा करने पर रियायत, अनुदान व लाभांश के प्रस्ताव जनता को दे रही है। समाधान देश, काल परिस्थिति अनुसार ही होने चाहिए पर निष्कर्ष यही है कि जनसंख्या अपने आप में समस्या या समाधान नहीं है उसका नियोजित या अनियोजित होना है। अत:, ‘विस्फोट नहीं नियोजन’, उपयुक्त नारा है।


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