Thursday, March 19, 2026
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तपिश से मिट्टी के बर्तनों का कारोबार बढ़ा

  • मिट्टी के घड़ों की जगह फ्रीज ने ली, लेकिन बावजूद इसके लोग लोकल टू वोकल पर लौट रहे

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग खाना बनाने और पानी पीने के लिये किया जाता रहा है। एक समय था जब लोग चूल्हे पर मिट्टी के बर्तन ही इस्तेमाल किया करते थे, लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता का दौर आया रसोइयों से मिट्टी के बर्तन लुप्त होते चले गए और स्टील व अन्य धातुओं के बर्तनों ने उनकी जगह ले ली, लेकिन कोरोना महामारी ने लोगों को दोबारा खोयी हुई परम्परा मिट्टी के बर्तनों पर लौटा दिया।

आज भले ही मिट्टी के घड़ों की जगह फ्रीज ने ले ली हो, लेकिन बावजूद इसके लोग लोकल टू वोकल पर लौट रहे हैं। गर्मी का मौसम दस्तक दे चुका है। बाजारों में मिट्टी के बर्तनों की बिक्री भी बढ़ जाती है। इसमें खासकर मिट्टी के घड़े, सुराही, मटकी या मटका आदि शामिल हैं। सेहत के लिए फ्रीज का पानी हानिकारक होता है, क्योंकि ये गले की कोशिकाओं का तापमान एकदम से गिरा देता है। जिस कारण टॉन्सिल, गले में खराश और खांसी होने की संभावना बढ़ जाती है। वहीं, मिट्टी के घड़ों का पानी गले की कोशिकाओं के तापमान को नहीं गिराता है। इसलिये इससे गला खराब होने की संभावनाएं न के बराबर हो जाती है।

गर्मी में बढ़ जाता है कारोबार

दुकानदार लोकेश बताते हैं कि तीन माह यानि दिसंबर, जनवरी व फरवरी में कारोबार बहुत ही धीमा चलता है, लेकिन बीते कुछ सालों से मार्च आते ही वातावरण का तापमान बढ़ने के कारण कारोबार गर्मी का मौसम आने से पहले ही रफ्तार पकड़ लेता है। गर्मी आते ही मिट्टी के बर्तनों की डिमांड बढ़ने लगती है। इसमें मिट्टी का तवा, बोतल, घड़ा, सुराही आदि शामिल हैं।

बाजार में आए डिजाइनर बोतल और मटके

लोगों की पसंद को ध्यान में रखते हुए इस बार बाजारों में डिजाइनर व आकर्षक बोतलें, मटके व कैम्पर तैयार किए गए हैं। इन बोतलों और मटकों पर रंग-बिरंगे फूल और पत्तियों की नक्काशी की गई है। साथ ही इनमें टोटी भी लगाई गई है। जिससे पानी लेने में असुविधा न हो। टोंटी को उठाएं और ग्लास आसानी से भर जाए। वहीं, बोतलों में एयर टाइट ढक्कन की सुविधा दी गयी है। जिससे पानी ज्यादा समय तक ठंडा रह सके व लीक न हो।

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प्रजापति बिरादरी करती है ये कारोबार

मिट्टी के बर्तन बनाने का काम सालों से प्रजापति बिरादरी करती आ रही है। ऐसा कहा जाता है कि यह भगवान प्रजापति के वंशज हैं। इनका कार्य पारंपरिक रूप से मिट्टी के बर्तन, खिलौने, सजावट का सामान आदि बनाना रहा है। इनको उत्तर भारत में कुम्हार के नाम से भी जाना जाता है।

निरोगी रहने में मददगार

मटके का पानी पीने से स्वास्थ्य को लाभ मिलता है। इसमें मौजूद विटामिन व मिनरल लू लगने बचाते हैं। साथ ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं। गले के रोग, पेट के रोग व एसिडिटी को रोकते हैं तथा साथ ही साथ अर्थराइटिस जैसी बीमारी को होने से भी रोकते हैं। मेडिकल स्थित लोकेश बताते हैं कि वह पिछले 40 साल से यहां दुकान कर रहे हैं। सर्दियों के दिनों में काम धीमा चलता है

पर गर्मियों में अच्छी कमाई हो जाती है। लोग न सिर्फ मिट्टी के बर्तन खरीदते हैं बल्कि गमले, विंड चाइम, माता की मूर्ति, गुल्लक, दीपक, करुए आदि खरीदने आते हैं। दुर्गा हैंडीक्राफ्ट के मलिक शिवम बताते हैं कि वह पिछले 25 साल से दुकान कर रहे हैं। उनसे पहले उनके पिता दुकान पर बैठा करते थे। बताते हैं कि वह मिट्टी का सामान हरियाणा, हापुड़, परतापुर, दिल्ली में स्थित गांव से लाते हैं।

आइटम रेट (रुपये में)

मिट्टी का तवा 100

हंडिया 50 से 70

सुरैया 350

मटका 120 से 250

बोतल 120 से 220

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