- टेराकोटा के बर्तनों को लेकर सोच बदली
- होटलों से लेकर घरों के किचन में दिख रहे
- कुकर, ओवन, कढ़ाई, तवा और थर्मस की मांग ज्यादा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: वक्त बदला और लोगों की सोच भी बदली। पहले गांव के घरों में, झोपड़ियों में जिन मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल होता था। अब बड़े-बड़े बंगले वाले, फ्लैट वाले मिट्टी के बर्तनों को ले जा रहे हैं और उसमें खाना खा रहे हैं। यह अब स्टेटस सिंबल से आम जिंदगी में प्रवेश कर गया है। हापुड़ रोड स्थित तिरंगा गेट के पास और थापर नगर में कुम्हारों ने लोगों की नब्ज को समझा और बर्तनों को राजस्थान और गुजरात से टेरीकोटा के बर्तनों ने धूम मचा रखी है। टेराकोटा के कुकर, ओवन, कढाई, तवा और थर्मस काफी पसंद किये जा रहे हैं।

टेराकोटा एक मिट्टीयुक्त चमकदार सेरेमिक होता है। इसका प्रयोग देश के कई हिस्सों में शिल्पकलाओं, बर्तन, खिलौने, मूर्तियां आदि बनाने के लिए किया जाता है। मिट्टी से बने बर्तन की पूरी रेंज है, जहां पर किचन के आइटम मसलन कुकर, फ्राईपैन, नॉन स्टिक तवा, इडली मेकर, लंच बॉक्स, केतली, टी सेट, मग, वॉटर बॉटल, प्लेट, सूप सेट समेत वे सभी बर्तन मिलते हैं, जो दैनिक उपयोग में आते हैं।
रेड पॉटरी से बने यह बर्तन पुराने दौर की याद दिलाते हैं, जब हर घर में सिर्फ मिट्टी के बर्तन होते थे। मिरर, मिट्टी और स्टील के हैंडल्स के के चलते यह सेफ भी हैं। खाना पकाने, रखने और गर्म करने के लिए हांडी और कुकर के नीचे कश्मीरी सिगड़ी की तरह फायर फ्लेम भी लगा है। यही कारण है कि आजकल बड़ी पार्टियों से लेकर हाई क्लास रेस्टोरेंट में भी इन्हें प्रयोग किया जाने लगा है।
मिट्टी के बर्तनों को होटल-रेस्टोरेंट्स के साथ-साथ एलीट क्लास के लोग भी खूब पसंद कर रहे हैं। एंबियेशन टेराकोटा वर्क्स के आबिद कहते हैं कि यह बर्तन साफ रहते हैं और हाइजीन प्रॉब्लम भी नहीं होती। मिट्टी से बने होने के चलते इन बर्तनों में रखे खाने में स्वाद और महक भी खूब रहती है। गर्मी के आते ही इस तरह के बर्तनों की मांग बढ़ जाती है।

सूफी टेराकोटा वर्क्स के अब्दुल रशीद और राशिद टेराकोटा वर्क्स के यामीन की दुकानों में इस तरह के बर्तनों की भरमार है। चीनी मिट्टी के मर्तबान, गमले और टेराकोटा के कप और गिलास काफी पसंद किये जा रहे हैं। इनका मानना है कि नौचंदी मेला आते ही दुकानों में रौनक आ जाएगी और गुुजरात और राजस्थान से टेराकोटा के बर्तन आने शुरू हो जाएंगे। टेराकोटा के कुछ बर्तन ग्रामीण क्षेत्रों में भी बन रहे हैं।
वरिष्ठ फिजिशियन डा. तनुराज सिरोही का कहना है कि मिट्टी के बर्तन हमेशा से स्वास्थ्य के प्रति लाभदायक रहे हैं।
पहले इन्हीं बर्तनों का प्रयोग होता था। मिट्टी के बर्तन में कुकिंग के दौरान तेल मिट्टी के अंदर चला जाता है। इस तरह खाने में पौष्टिकता बढ़ जाती है।
वरिष्ठ उदर रोग विशेषज्ञ डा. मलय शर्मा का कहना है कि मिट्टी और टेराकोटा के बर्तन स्वास्थ्य कारणों से हमेशा पौष्टिक रहे हैं।
इस तरह के बर्तन रसायन से मुक्त होते है और किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।



