Wednesday, February 28, 2024
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पूर्ण गरीबी उन्मूलन की राह तकती गरीबी रेखा

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Nazariya


rajendra kumar sharma 1असली और नकली गरीबी ने गरीबी उन्मूलन के सभी प्रयासों को धत्ता दिखा दिया है। पूरा विश्व गरीबी उन्मूलन के लिए प्रयास शील है पर गरीबी हटने का नाम नहीं लेती। जितने प्रयास किए जाते हैं, ये उतनी ही बढ़ जाती है। पर इन प्रयासों में हमारे देश के प्रयास काफी हद तक सार्थक सिद्ध हुए हैं। इसे विश्व की विभिन्न एजेंसियों ने भी माना और प्रमाणित किया है, जो हम सब के गर्व की बात है। गरीबी उन्मूलन और गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों को ऊपर लाने की दिशा में किए जा रहे वैश्विक प्रयासों के संदर्भ में यूएन की तरफ से जारी एक ताजा रिपोर्ट में जिसमें भारत के अलावा चीन, कंबोडिया और वियतनाम जैसे 25 देश शामिल हैं, इन तमाम देशों ने पिछले 15 सालों में अच्छा प्रदर्शन किया है। भारत का जिक्र करते हुए इस रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2005/2006 में जहां 55 प्रतिशत (करीब 64.45 करोड़) लोग गरीबी रेखा से नीचे थे, वहीं साल 2019/2021 तक ये संख्या घटकर 16 प्रतिशत (23 करोड़) हो गई। इस हिसाब से भारत में इन 15 सालों में 41.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गए।

गरीबी उन्मूलन दिवस का उद्देश्य सभी देशों को गरीबी और निराश्रयता के पूर्ण उन्मूलन के लिए ठोस कार्रवाई के लिए प्रेरित करना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018-2027 को ‘गरीबी उन्मूलन के लिए तीसरा संयुक्त राष्ट्र दशक’ घोषित किया है। यह दिन गरीबी से पीड़ित लाखों लोगों और दैनिक जीवन में उनके द्वारा किए जा रहे संघर्षों और साहस का सम्मान करता है। साथ ही इस संदर्भ में आवश्यक वैश्विक एकजुटता और साझा जिम्मेदारी का भी अहसास करवाता है।
लगातार गरीबी का सामना कर रहे लोगों के लिए, सम्मानजनक कामकाजी परिस्थितियों और सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा की कमी असुरक्षा पैदा करती है, जो उनके जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को हानि पहुंचाते है और उन्हें शोषण, अपमान जैसी भावनाओं का अनुभव कराती है।

अगले दशक में विश्व बैंक का अनुमान है कि एक अरब युवा नौकरी बाजार के लिए तैयार होंगे, लेकिन उनमें से आधे से भी कम को वास्तव में औपचारिक नौकरियां मिलेंगी। यूनिसेफ का अनुमान है कि सबसे कम विकसित देशों में चार में से एक से अधिक बच्चे (5 से 17 वर्ष की आयु) श्रम में लगे हुए हैं जो उनके स्वास्थ्य और विकास के लिए हानिकारक है, जिससे उनके और उनके परिवार को गरीबी से बाहर निकालने के प्रयासों को ठेस पहुंचती है। निर्धनता के कारण महिलाएं भी भेदभाव से के श्राप से मुक्त नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार अनौपचारिक श्रम बल का 58 प्रतिशत भाग महिलाएं ही हैं। एसडीजी (सतत विकास रिपोर्ट ) की 2023 की मध्यावधि समीक्षा सरकारों को गरीबों पर होने वाले अत्याचार को समाप्त कर, सभी प्रकार के भेदभावों को खत्म करने के लिए प्रोत्साहित करती है। क्योंकि यही कारक गरीबी और उत्पीड़न को बनाए रखते हैं और उनके विकास में बाधक बनते हैं। फिर भी, वर्तमान वास्तविकता से पता चलता है कि ऐसी दुनिया में जहां हम सभी को खिलाने के लिए पर्याप्त उत्पादन करते हैं, फिर भी 811 मिलियन लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है और 44 मिलियन लोगों को अकाल में डूबने का खतरा है। दो बिलियन लोग अभी भी बिना सुरक्षा के रह रहे हैं, पीने का पानी और 3.6 बिलियन लोग सुरक्षित रूप से अनिवार्य, न्यूनतम स्वच्छता से वंचित हैं। 1.3 अरब लोग अभी भी बहुआयामी गरीबी में रहते हैं। जिनमें से लगभग 50 फीसदी बच्चे और युवा हैं।

आय असमानता तेजी से बढ़ रही है और हर साल, अमीर और गरीब के बीच की खाई और भी चौड़ी हो जाती है। एक समाचार के अनुसार, जब कोविड काल के दौरान लाखों लोग रोटी और कपड़े जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष रहे थे, ऐसे में कॉरपोरेट शक्ति और अरबपति वर्ग की संपत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई थी। महामारी की एक सुनामी ने निर्धन और धनी के बीच की खाई को इतना बड़ा कर दिया कि उसको पाटना सुगम नहीं है। फिर भी भारत ने इस महामारी में सरकारी योजनाओं और मदद से गरीबों को जहां मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने में प्रशंसनीय कार्य किया है, वहीं गरीबी उन्मूलन की दिशा में अप्रत्याशित सफलता हासिल की है।

गरीबी और असमानता साथ साथ चलते हैं। गरीबों के प्रति हिंसा, सामाजिक बहिष्कार, संरचनात्मक भेदभाव और अशक्तीकरण, अत्यधिक गरीबी में फंसे लोगों के लिए जीना कठिन बना देती है, जो मानवीय असंवेदना का बड़ा उदाहरण है। कोविड-19 महामारी ने इस गतिशीलता को उजागर किया, सामाजिक सुरक्षा प्रणाली की कमियों और विफलताओं के साथ-साथ संरचनात्मक असमानताओं और भेदभाव के विविध रूपों को उजागर किया जो गरीबी को गहरा और कायम रखते हैं। कुछ आर्थिक संपन्न लोग गरीबी का चोला पहन कर गरीबों के लिए बनाई गई कल्याण योजनाओं पर अपना हक जमाने में भी गुरेज नहीं करते हैं। ऐसे ही कुछ उदाहरण समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ने को मिले, जिसमें संपन्न व्यक्ति अपने बच्चों को आरटीई एक्ट लाभ उठाते पाए गए। ऐसे लोग ही झूठे दस्तावेजों के आधार पर असली गरीबों की सुविधाओं को कब्जाए हुए हैं। ऐसे में गरीबी उन्मूलन के प्रयासों को झटका लगता है और वह अपने निर्धारित लक्ष्य से दूर हो जाते हैं। प्राकृतिक और पर्यावरणीय आपदाएं गरीबों पर अनावश्यक बोझ डालते हैं, जो उनके घरों, फसलों और आजीविका को नुकसान पहुंचाते हैं और गरीबी उन्मूलन के प्रयासों को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।


janwani address 8

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