Monday, April 6, 2026
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युगों तक वैराग्य, युगों तक प्रेम

Sanskar 7


संसार के प्रति शिव की उदासीनता को देखकर चिंतित ब्रह्मा ने विष्णु से इस विषय में विमर्श किया कि महादेव के विवाह की व्यवस्था करनी चाहिए। इसी सन्दर्भ में उन्होंने अपने पुत्र दक्ष की पुत्री सती के साथ शिव के विवाह का प्रस्ताव रखा। उधर सती बचपन से ही शिव की अनन्य भक्त थीं।

जब उनकी आयु विवाह के योग्य हो गई तब इस बंधन में बंधने के जितने प्रस्ताव आए, उन्होंने सभी पात्रों को ठुकरा दिया। फिर वह शिव के ध्यान में मग्न हो गईं। उन्होंने अन्न-जल तक त्याग दिया और केवल पत्तों के आहार पर जीवित रहीं। इस चरम साधना से प्रसन्न हो जब बाबा भोलेनाथ सती के सामने प्रकट हुए तो सती ने उनसे अपने मन की बात कहनी चाही पर शिव तो अंतयार्मी हैं।

उन्होंने सती के बिना कुछ कहे ही ब्रह्मा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। जब सती के शरीर का 52 भागों में खंडन हो गया, तब महादेव तांडव का समापन कर समाधिस्थ हो गए और युगों तक उसी अवस्था में रहे। उनके इस ब्रह्मचर्य का लाभ उठाते हुए तारकासुर ने पूरे संसार में अपने अत्याचार का साम्राज्य स्थापित कर लिया क्योंकि उसे पता था कि उसका वध केवल शिवपुत्र ही कर सकते थे पर शिव उस समय विवाह करने की अवस्था में नहीं थे।

देवी-देवताओं ने एक बार फिर इस पर सोच-विचार किया कि शिव का विवाह किस नारी से करवाया जाए क्योंकि विकट समस्या यह थी कि शिवपुत्र के जन्म के लिए शिवतेज की आवश्यकता थी जिसे धारण करने की क्षमता पूरे संसार में केवल शक्ति को ही थी। यह सोच विधाता ने शक्ति का पार्वती के रूप में इस युग में पदार्पण करवाया।

पार्वती पर्वत की पुत्री थीं। ‘पर्वत’ शब्द से ही ‘पार्वती’ शब्द बना है। सती की तरह ही पार्वती बचपन से ही शिव को समर्पित थीं। वे उस गुफा में लगातार जाती थीं जहां शिव ध्यान में मग्न थे। परन्तु बहुत अनुनय-विनय के पश्चात भी शिव का ध्यान भग्न नहीं हुआ। पार्वती ने महादेव को फलाहार भी करवाना चाहा किन्तु शिव ने उनकी ओर ध्यान तक नहीं दिया।

इसका उचित कारण जो भी हो, पार्वती को लगा कि वे कुरूप हैं इसलिए महादेव प्रसन्न नहीं हो रहे हैं। फिर क्या था? पार्वती भी सती की तरह घनघोर तपस्या में तल्लीन हो गईं। घोर तप से प्रसन्न हो ब्रह्मा प्रकट हुए तो पार्वती ने उनसे असीमित सौंदर्य का वर मांगा।

अद्भुत सुंदरता की अधिकारिणी के रूप में इस बार जब पार्वती शिव के सम्मुख आर्इं तो भोलेनाथ मंत्रमुग्ध हो गए। शिव के अस्तित्व में दो ही स्वरूप चक्र वात परिवर्तित होते हुए आते हैं। या तो वे वैरागी होते हैं या समर्पित। नारी के साथ उनका मिलन होता भी है तो शक्ति के किसी नए जन्म के रूप के साथ ही होता है।

एक समय एक से अधिक नारी का संस्पर्श उनके अस्तित्त्व में नहीं है बल्कि अलग-अलग युगों में भी वे केवल शक्ति को ही समर्पित हैं। दुर्गा, काली, सती, उमा, पार्वती सब शक्ति के ही रूप हैं और माता में महादेव इस प्रकार रम जाते हैं कि मिलन के समय यदि भृगु पधारें तो भी ऋषिवर को अनदेखा कर देते हैं बल्कि तत्कालीन शालीनता को छोड़ वे भृगु से अपना असंतोष भी व्यक्त करते हैं।

इससे कुपित हो भृगु न केवल यह कहते हैं कि शिव देवों में श्रेष्ठ नहीं हैं बल्कि वे भगवान् शंकर को यह श्राप भी देते हैं कि पृथ्वी पर उनकी पूजा लिंग (विग्रह) के रूप में ही होगी। पर सम्मान प्रेम के आड़े आए, यह शिव को स्वीकार्य नहीं।

बाबा भोलेनाथ का समाज या तो युगों-युगों तक एक महाशून्य रहता है या फिर जब वे संसार के प्रति विमुख नहीं रहते तब वे माँ शक्ति के प्रेम में लीन होते हैं। माता के आगे उनके लिए किसी का आदर, कोई सम्मान या महापंडितों द्वारा दी गई प्रतिष्ठा तुच्छ है।

शिवानंद मिश्रा


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