Thursday, April 25, 2024
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भारत रत्न के हकदार राजा महेंद्र

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KP MALIKहिंदुस्तान में भारत रत्न सम्मान सबसे बड़ा सम्मान है, जिसे दिया जाना इस बात को जाहिर करता है कि इस सम्मान को पाने वाला इंसान कोई साधारण इंसान नहीं होता। हिंदुस्तान में अब तक अनेक ऐसे महान लोग हुए हैं, जिन्हें अब तक तो भारत रत्न सम्मान दे दिया जाना चाहिए था। ऐसी ही महान शख्सियतों में से एक महान शख्सियत का नाम है जाट शासक राजा महेंद्र प्रताप, जो अब इस दुनिया में भले ही नहीं हैं, लेकिन उनकी वजह से न केवल देश की स्वतंत्रा के लिए भड़की क्रांति की चिंगारी में अनेक आहुतियां मिलीं, बल्कि देश के कई वर्ग और कई परिवार भी आबाद हुए और आज इन्हीं राजा महेंद्र प्रताप की वजह से उनकी पीढ़ियां भी आबाद हैं। उत्तर प्रदेश के मुरसान में 1 दिसम्बर, 1886 जन्में राजकुंवर महेंद्र प्रताप यूं तो युवा होकर मथुरा के शासक बने और राजा महेंद्र प्रताप के नाम से ख्यात हुए, जो न्याय प्रिय, किसान, गरीब हितैषी और दबे-कुचलों को भी सम्मान और समान हक देने वाले थे।

बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि राजा महेंद्र प्रताप के पास अगर कोई भूमिहीन आता था, तो वो उसका धर्म या जाति देखे बगैर ही उसे जमीन दान कर दिया करते थे। उनकी न्यायप्रियता और जनसेवा के चलते वो इतने लोकप्रिय शासक थे कि पूरी दुनिया के कई देशों में उनके नाम का डंका बजता था।

आज भी यह बात चर्चित है कि देश में फकीर से राजा तो अनेकों बने, लेकिन राजा से बने फकीर अकेले महान शिक्षाविद क्रांतिकारी, समाजसेवी, स्वर्गीय राजा महेंद्र प्रताप बने, जो न सिर्फ राजा बने बल्कि आजाद देश के पूर्व लोकसभा सदस्य भी रहे।

राजा महेंद्र प्रताप देश के इकलौते राजा थे, जिन्होंने अपनी भूमि, संपत्ति शिक्षक संस्थानों, किसानों को देकर स्वरोजगार और शिक्षा का उजियारा किया। राजा महेंद्र प्रताप आजादी के बाद आगरा से लोकसभा के सांसद तो रहे ही साथ ही उन्होंने अखंड हिंदुस्तान के लिए एक ऐसी मुहिम चलाई, जिसकी बदौलत हिंदुस्तान के कई सूबे एकजुट हुए।

इतना ही नहीं दूरदर्शी राजा महेंद्र प्रताप ने सर्वप्रथम साल 1915 में जब पूरा हिंदुस्तान अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था काबुल जाकर अफगानिस्तान में आजाद हिंद सरकार का गठन कर दिया था और उसे स्वतंत्र हिंदुस्तान के रूप में पहचान दे दी थी।

यह अलग बात है कि राजा महेंद्र सिंह की यह मुहिम न तो अंग्रेजों को रास आई और न ही आजाद भारत की सरकार आगे बढ़ा सकी और आजादी के बाद अफगानिस्तान की सीमाएं अलग हो गईं और वह हिंदुस्तान का अखंड हिस्सा नहीं बन सका।

राजा महेंद्र प्रताप अभियान, दिल्ली के संयोजक हरपाल सिंह राणा ने याद दिलाते हुए बताते हैं कि देश के प्रधानमंत्री बनने के बाद 25 दिसंबर 2014 को जब प्रधानमंत्री मोदी काबुल गए, तो वहां की संसद का एक हॉल, जो माननीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी के नाम से उसका उद्घाटन करते वक्त माननीय प्रधानमंत्री मोदी ने राजा महेंद्र प्रताप और आजादी पर उनकी महत्वता को दुनिया के सामने उजागर किया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने वक्तव्य मे कहा हमारे स्वतंत्रता संग्राम के लिए भारतीयों को अफगानों का समर्थन याद है।

खान अब्दुल गफ्फार खान का योगदान उस इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ाव था, आज से ठीक सौ साल पहले राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना बरकतुल्लाह द्वारा काबुल में आजाद हिंद सरकार का गठन किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने सीमांत गांधी के साथ राजा महेंद्र प्रताप का नाम लिया और उनके और अफगानिस्तान के राजा के बीच की बातचीत को भाईचारे की भावना का प्रतीक बताया।

दरअसल भारत में औद्योगिक क्रांति लाने के प्रति राजा साहब कितने दृढ़ व संकल्पित थे, इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उन्होंने 25 अगस्त 1910 को अपनी आधी से अधिक जायदाद इस महाविद्यालय के नाम कर दी।

इसके अतिरिक्त अपना राजमहल, कचहरी और उसके आसपास जमुना तट पर बने हुए काशीघाट आदि भी महाविद्यालय को समर्पित कर दिए। 5 अप्रैल 1911 से राजा महेंद्र प्रताप के संपादकत्व में एक प्रेम नाम के समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ।

प्राणीमात्र के प्रति असीम प्रेम भाव मन में संयोय राजा महेंद्र प्रताप अपना सब कुछ मानों देश और समाज पर न्योछावर करने को अद्धत थे। अपने अनुभव बांटने और दूसरों से सलाह-मशविरा कर वे हमेशा इसी में लगे रहते थे कि और क्या कुछ समाज हित में किया जा सकता है।

काबुल में राजा जी ने 1 दिसंबर 1915 को हिंदुस्तान के लिए स्थाई आजाद हिंद सरकार की घोषणा की। इस सरकार में राजा जी खुद राष्ट्रपति और मौलाना बरकतअली व मौलाना उबायदुल्ला सिंधी उनके सहयोगी बने। इस प्रकार राजा महेंद्र प्रताप सिंह अफगानिस्तान सरकार की खातिरदारी में फरवरी 1918 तक रहे।

इसके बाद हिंदुस्तान की ब्रिटिश हुकूमत ने राजा महेंद्र प्रताप सिंह की गतिविधियों को विद्रोह मानकर 1 जुलाई 1916 को उनकी हिंदुस्तान की जायदाद कुर्क कर ली। स्वाभाविक ही हिंदुस्तान से उन्हें आर्थिक मदद पहुंचने की संभावना समाप्त हो गई। लेकिन इन सबसे बेपरवाह धुन के पक्के राजा साहब अपने अभियान में जुटे रहे।

उस दौर में दुनिया का कोई प्रमुख व्यक्ति ऐसा नहीं था, जिससे राजा साहब न मिलें हों। जर्मनी के कैसर हों, चाहे रूस के मौसिए लैनिन, काबुल के अमीर अमानुल्लाह खान से लेकर चीन के प्रेसिडेंट दलाई लामा, और शाह जापान से भी राजा साहब मिले।

वो हर देश पहुंचे और लगातार यात्राएं करते रहे, ताकि हिंदुस्तान को किसी भी तरह आजाद कराया जा सके। साल 1926 में राजा महेंद्र प्रताप की भेंट पंडित जवाहरलाल नेहरू से हुई। नेहरू ने उस भेंट का जिक्र अपनी पुस्तक मेरी कहानी में जिस अंदाज में किया है, वह अद्भुत है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं कि जिस भेष में राजा साहब घूम रहे थे, वह तिब्बत या साइबेरिया में तो जंच सकता है, मौंट्रियाल में तो कतई नही, यह सच भी था, क्योंकि यह राजवंशी निहायत जिस फक्कड़ अंदाज में कोई क्या कहेगा, इसकी परवाह किए बगैर घूम रहा था, वह किसी आम आदमी के लिए भी आसान नहीं था।

बहरहाल, देश को सब कुछ न्योछावर कर देने की सोच रखने वाले राजा महेंद्र प्रताप जी का स्वर्गवास 29 अप्रैल, 1979 को हुआ। देश के लिए सब बाद सरकार ने एक डाक टिकट जारी करके सम्मान तो दिया, लेकिन उनके कार्यों और योगदान को देखते हुए सरकार और इतिहासकारों ने असली स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों, बलिदानों के साथ राजा महेंद्र प्रताप का भी सही प्रकार से मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए लगाया।

भले ही साल 1932 में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किए गए हो, लेकिन हिंदुस्तान में न उन्हें सर्वोच्च सम्मान मिला, और हिंदुस्तान के नागरिक तो उनकी जयंती और पुण्यतिथि तक भूल गए हैं। राजा महेंद्र प्रताप सिंह को देश के सर्वोच्च सम्मान देने की मांग लंबे समय से उठती रही है। प्रधानमंत्री मोदी जरूर इस बात पर गौर करेंगे।


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