Monday, April 20, 2026
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Makar Sankranti 2025: मकर संक्रांति के दिन करें गंगा स्तुति पाठ, धन की नही होगी कमी

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। हिंदू धर्म में सभी त्योहारो का बहुत ही खास माना जाता है। इनमें से ही एक है मकर संक्रांति का त्योहार। इस त्योाहर को देशभर में लोग बहुत ही धूमधाम के साथ मनाते है। साथ ही इस दिन तिल के लड्डू बनाना एक प्रचलित परंपरा है। मकर संक्रांति का पर्व न केवल तिल के महत्व के लिए जाना जाता है, बल्कि इस दिन विशेष रूप से स्नान, दान, और पूजा पाठ का भी अत्यधिक महत्व है। खासकर यह दिन गंगा स्नान और गंगा पूजा के लिए बहुत शुभ माना जाता है।

माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने और गंगा पूजा करने से व्यक्ति को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। इसके साथ ही, इस दिन गंगा स्तुति का पाठ करने का भी विशेष महत्व है। यह पाठ न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्किघर में अन्न-धन की कमी नहीं होती और समृद्धि बनी रहती है। इसके साथ ही मकर संक्रांति के दिन गंगा स्तुति का पाठ करने से विशेष लाभ होता है। यह पाठ विशेष रूप से सुबह स्नान के बाद किया जाता है, और इसे पूरे मन से पढ़ने की सलाह दी जाती है। गंगा स्तुति का पाठ करने से न केवल व्यक्ति के घर में सुख-शांति बनी रहती है, बल्कि इसके माध्यम से मां गंगा का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

गंगा स्तुति पाठ

गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।

त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥

मां गंगा स्तोत्रम्॥

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे

त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।

शङ्करमौलिविहारिणि विमले
मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥१॥

भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव
जलमहिमा निगमे ख्यातः ।

नाहं जाने तव महिमानं
पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २॥

हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे
हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।

दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं
कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३॥

तव जलममलं येन निपीतं,
परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।

मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः
किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४॥

पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे
खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।

भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये,
पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥ ५॥

कल्पलतामिव फलदां लोके,
प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।

पारावारविहारिणि गङ्गे
विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥ ६॥

तव चेन्मातः स्रोतःस्नातः
पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः ।

नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे
कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ ७॥

पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे
जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।

इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे
सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥

रोगं शोकं तापं पापं
हर मे भगवति कुमतिकलापम्।

त्रिभुवनसारे वसुधाहारे
त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥ ९॥

अलकानन्दे परमानन्दे
कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।

तव तटनिकटे यस्य निवासः
खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ १०॥

वरमिह नीरे कमठो मीनः
किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।

अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव
न हि दूरे नृपतिकुलीनः॥ ११॥

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये
देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।

गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं
पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२॥

येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां
भवति सदा सुखमुक्तिः ।

मधुराकान्तापज्झटिकाभिः
परमानन्दकलितललिताभिः ॥ १३॥

गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं
वाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।

शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति
सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ १४॥

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे
त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।

शङ्करमौलिविहारिणि विमले
मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥

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