Sunday, February 25, 2024
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इस दौर में गणतंत्र दिवस

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LAL BAHADUR SINGHप्रधानमंत्री मोदी के अनुसार 22 जनवरी अब ‘विस्तारित गणतंत्र दिवस’ समारोह का हिस्सा है। उन्होंने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिन के अवसर पर, लाल किले से अपने सम्बोधन में कहा कि 22 जनवरी, जिस दिन राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई, अब ‘लोकतंत्र के उत्सव’ का हिस्सा हो गया है। लोकतांत्रिक गणराज्य भारत के जीवन में इससे बड़ी दुर्घटना नहीं हो सकती थी। जो परिघटना भारतीय गणतंत्र के सभी मूल्यों के निषेध पर खड़ी है, उसे गणतंत्र का विस्तार और लोकतंत्र के उत्सव का हिस्सा घोषित कर दिया गया। यह धूर्तता और पाखंड की पराकाष्ठा है। संकीर्ण साम्प्रदायिक राजनीति के लिए न सिर्फ भोली-भाली जनता की धार्मिक भावना का दोहन किया जा रहा है, बल्कि जनगण की लोकतंत्र और गणतंत्र की चेतना को भी भ्रष्ट किया जा रहा है। यह दिखाता है कि हमारा गणतंत्र और उसके नागरिक समस्त संस्थाओं-संसाधनों-सम्पदा पर काबिज कितनी खतरनाक ताकतों के दुष्चक्र में फंस चुके हैं। देश-दुनिया में नैतिक वैधता हासिल करने के लिए संघ-भाजपा प्रचार-तंत्र द्वारा इस बात पर बहुत जोर दिया जा रहा है कि मन्दिर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से बन रहा है। स्वयं मोदी ने 22 जनवरी को अयोध्या में अपने भाषण में इसका खास जिक्र किया कि उच्चतम न्यायालय के फैसले से मन्दिर निर्माण को न्यायिक वैधता मिली, ‘मैं आभार व्यक्त करूंगा भारत की न्यायपालिका का, जिसने न्याय की लाज रख ली।’ बहरहाल, भले ही मन्दिर निर्माण न्यायालय के आदेश से हो रहा है, पर इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा कि देश के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के पूजास्थल को दिन दहाड़े ढहा कर उसी स्थान पर मन्दिर बनाया गया। मोदी ने दावा किया, ‘रामलला के इस मंदिर का निर्माण भारतीय समाज के शांति, धैर्य, आपसी सद्भाव और समन्वय का प्रतीक है।’ सच्चाई यह है कि आपसी सद्भाव और शांति जिस हद तक भी मन्दिर निर्माण के अभियान के दौरान बनी रही, उसका श्रेय दोनों समुदायों की आम जनता को जाता है, वरना मस्जिद विध्वंस की मुहिम में संघ-भाजपा ने इसे बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यहां तक कि आस्था का तर्क देते हुए उन्होंने देश के कानून के माध्यम से इसके समाधान के रास्ते को ही खारिज कर दिया था।

इस तरह बनाये जा रहे मन्दिर के जश्न का आने वाले दिनों में क्या असर होने वाला है? क्या यह हमारी राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा? एक बहुसंख्यकवादी राज की जीत का जश्न मनाकर और अल्पसंख्यकों के दिलों में अपने दोयम दर्जे का शहरी होने का जख्म भरकर, उनके अंदर देश की राज्य और न्यायिक व्यवस्था से अलगाव का स्थायी बीज डालकर, क्या राष्ट्रीय एकता और लोकतंत्र को मजबूत किया जा रहा है? 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में महज एक मस्जिद नहीं गिरी थी, वरन यह आजादी की लड़ाई के संचित मूल्यों के आधार पर आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण की यात्रा को ड्रेल कर देने की लम्बे समय से जारी मुहिम का एक निर्णयक टर्निंग पाइंट था। 22 जनवरी को अयोध्या में जो हो रहा है, वह उसी का चर्मोत्कर्ष है। यहां से इस मुहिम को फिर एक नए चरम की ओर ले जाने की कोशिश होगी। मिथकीय राष्ट्रीय गौरव की पुनर्स्थापना के नाम पर आज हमारे आधुनिक राष्ट्रनिर्माण की बुनियाद में पलीता लगाया जा रहा है। इसके उन्माद में आजादी की लड़ाई से निकले भारत के लोकतंत्र को खत्म कर देने तथा सामाजिक-आर्थिक न्याय के महान मूल्यों की लड़ाई को पूरी तरह पृष्ठभूमि में धकेल देने और भारत को पूरी तरह देशी-विदेशी कॉरपोरेट के हवाले कर देने का षड्यंत्र है। मोदी ने अयोध्या में दावा किया कि भव्य राम मंदिर साक्षी बनेगा- भारत के उत्कर्ष का, भारत के उदय का। ये भव्य राम मंदिर साक्षी बनेगा- भव्य भारत के अभ्युदय का, विकसित भारत का। जाहिर है यह सब मन्दिर के सवाल को राष्ट्रवाद का सवाल बना देने की वही धूर्तता है जो बाबरी मस्जिद को राष्ट्रीय अपमान का प्रतीक बताकर की गई थी।

कहा जा रहा है कि इससे गुलामी की मानसिकता का अंत हो जाएगा। यह साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवाद के मूल्यों को सर के बल खड़ा कर देने, उस लड़ाई की विरासत को मिटा देने तथा मुस्लिम द्वेष को ही देशभक्ति बना देने का षड्यंत्र है। यह उस समूची धारा के लिए आजादी की लड़ाई में भाग न लेने, माफी मांगने और मुखबिरी करने के आरोप और गिल्ट से मुक्त हो जाने का बहाना है। राष्ट्रपति को लिखे सार्वजनिक पत्र में मोदी का यह दावा कि, इसकी प्रेरणा से 2047 तक भारत के महान विकसित राष्ट्र बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा, कोरी लफ्फाजी के सिवा कुछ नहीं है।

10 साल के अखंड मोदी राज के बाद आज हमारी अर्थव्यवस्था की सच्चाई क्या है? स्तम्भकार अजीत साही लिखते हैं- इंटरनेशनल मोनेटेरी फंड ने पिछले महीने एक रिपोर्ट में बताया कि मोदी सरकार बेतहाशा डॉलर बेच कर रुपया खरीद रही है। आईएमएफ के मुताबिक दिसंबर 2022 से लेकर अक्टूबर 2023 के ग्यारह महीनों में भारत के रिजर्व बैंक ने अठहत्तर बिलियन डॉलर बेच डाले रुपया खरीदने के लिए ताकि महंगाई को चुनावी वर्ष में किसी तरह काबू में रखा जा सके। जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे तो एक अमेरिकी डॉलर साठ रुपए के बराबर था। आज एक अमेरिकी डॉलर तिरासी रुपए के बराबर है। दरअसल 2014 से रुपया बेतहाशा गिरता जा रहा था। इसकी वजह ये है कि सरकार कितना भी झूठ बोले, सच तो ये है कि मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था का बैंड बजा दिया है। बैंकों का बुरा हाल है। सरकार कंगाल होने के करीब है और उधार पर जी रही है। पूंजीपति नए उद्योगों में निवेश ही नहीं कर रहे हैं। धंधे का बुरा हाल है।

आज भारत में भयानक बेरोजगारी है। महंगाई ताबड़-तोड़ बढ़ रही है। आने वाले सालों में आपकी बचत खत्म होती चली जाएगी। करोड़ों लोग अभी से खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता, दवाई-अस्पताल सब चीजों में कटौती करने लगे हैं। मोदी सरकार दबा के सड़क, एयरपोर्ट और बंदरगाह बनाने जैसे सार्वजनिक कामों में पैसा खर्च कर रही है। लेकिन इसके लिए पैसा कहां से आ रहा है? जब नौकरियां नहीं हैं, जब उद्योग चरमरा रहा है, तो फिर सरकार की कमाई कहां से हो रही है? दरअसल ये सारा काम उधार के पैसे से हो रहा है। उधार का पैसा वापस भी करना होता है। उस पर ब्याज भी बहुत अधिक होता है। कितने ही देश उधार न चुका पाने की वजह से कंगाल हो गए हैं। पाकिस्तान उनमें से एक है। राम-मन्दिर का सारा हो-हल्ला राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और आम जनता की इसी बदहाली से ध्यान हटाकर हिन्दू राष्ट्र के कोलाहल में आम चुनाव जीत लेने के लिए है।


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