Tuesday, March 17, 2026
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इस्तीफा मजबूरी या कुछ और?

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भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक— उपराष्ट्रपति का—अचानक और चौंकाने वाला खाली होना केवल एक व्यक्तिगत स्वास्थ्य संकट नहीं हो सकता। यह घटना किसी रोग का परिणाम नहीं, बल्कि सत्ता की आंतरिक खुराक, प्रतिशोध की राजनीति, और लोकतंत्र के भीतर पलते ‘नियंत्रण के विकार’ का लक्षण प्रतीत होती है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया, जिसे राष्ट्रपति ने तुरंत स्वीकार भी कर लिया। परंतु राजनीति की कड़ाही में यह इस्तीफा महज तेल में जली एक रोटी नहीं, बल्कि पूरे चूल्हे की आग का संकेत है। धनखड़ एक ऐसा नाम है जो लम्बे समय तक सत्तापक्ष की राजनीतिक ढाल के रूप में जाना गया। चाहे पश्चिम बंगाल की राज्यपाली हो या उपराष्ट्रपति पद—वे कभी भी सत्तारूढ़ दल के लिए असहज नहीं हुए। उनका संसद में विपक्ष पर लगातार कटाक्ष, विधायिका की गरिमा के नाम पर जनतंत्र की धाराओं को मोड़ना, और उनकी ‘निरपेक्षता’ पर उठते सवाल—इन सबने उन्हें विवादों में रखा, परंतु सत्ता के नजदीक भी।

ऐसे व्यक्ति का अचानक यह कहना कि वे ‘स्वस्थ नहीं हैं’, मात्र कुछ हफ्ते पहले ही विदेश यात्राओं और सघन बैठकों में व्यस्त व्यक्ति का यह स्वघोषित ‘स्वास्थ्य संकट’ असहज सत्य की ओर इशारा करता है—कि शायद बीमारी शारीरिक नहीं, बल्कि वैचारिक और संस्थागत थी। यह वही समय है जब कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह आरोप लगाया कि इस्तीफे का कारण कोई बीमारी नहीं, बल्कि ‘बीजेपी के भीतर की सत्ता की राजनीति और चरम केंद्रीकरण’ है। जब तक उपराष्ट्रपति सत्ता के अनुसार चल रहे थे, वे ‘राष्ट्रीय चेहरे’ थे; पर जैसे ही उनके वक्तव्यों में थोड़ी स्वतंत्रता, दिखा, वे सत्ता की आंखो में बेगाने बन गए। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे गहरी विडंबना यह है कि इसे एक संवैधानिक प्रक्रिया की तरह चित्रित किया जा रहा है। राष्ट्रपति भवन की ओर से मात्र एक सूचनात्मक वाक्य, कि ‘राष्ट्रपति ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया’— यह भारतीय जनता को यह बताने में असफल रहा कि एक संवैधानिक पद से व्यक्ति अचानक क्यों हटता है? क्या भारत का लोकतंत्र इतना क्षीण हो गया है कि एक उपराष्ट्रपति बिना संसदीय बहस, बिना सार्वजनिक संवाद, और बिना किसी जांच के, बस चुपचाप चला जाता है?
संविधान उपराष्ट्रपति को अपने पद से स्वयं इस्तीफा देने की अनुमति देता है, परंतु लोकतांत्रिक नैतिकता यह अपेक्षा करती है कि एक उच्चपदस्थ व्यक्ति अपने इस्तीफे के पीछे की परिस्थितियों को स्पष्ट करे। धनखड़ ने कोई प्रेस वार्ता नहीं की, न ही राज्यसभा में अंतिम संबोधन। यह चुप्पी अपने आप में एक बयान है—शायद यह बयान किसी अदृश्य भय का, अथवा किसी दबाव का है।

यह इस्तीफा उन तमाम घटनाओं की कड़ी बन गया है जो लोकतंत्र के भीतर एक सुनियोजित ‘मौन रणनीति’ का हिस्सा हैं। जैसे पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों ने सेवानिवृत्ति के बाद सत्ता में स्थान पाया, वैसे ही अब संवैधानिक पदों से हटकर, शायद नई भूमिकाएं तय की जा रही हैं। इस्तीफे के तुरंत बाद जो कयास लगने लगे— यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नौकरशाही की गोपनीयताओं में बदल देने जैसा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य विपक्षी नेताओं ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे को ‘बीजेपी के अंदरूनी सत्ता संघर्ष और केंद्रीकरण की राजनीति’ का नतीजा बताया। उन्होंने यह सवाल उठाया कि जब उपराष्ट्रपति पूरी तरह सक्रिय थे, विदेशी यात्राओं में व्यस्त थे, तो अचानक स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर इस्तीफा देना संदेह पैदा करता है। विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की संस्थाओं को नियंत्रित करने की साजिश करार दिया।

इसी परिप्रेक्ष्य में, जेपी नड्डा ने राज्यसभा में जवाब देते हुए कहा—‘आज विपक्ष ने लोकतंत्र को बंधक बना लिया है।’ उन्होंने विपक्ष पर ‘बिना कारण सरकार पर झूठे आरोप लगाने’, ‘संसदीय गरिमा को ठेस पहुंचाने’ और ‘राष्ट्रहित के कार्यों में बाधा उत्पन्न करने’ का आरोप लगाया। उनका इशारा साफ था कि विपक्ष उपराष्ट्रपति के त्यागपत्र जैसे संवेदनशील मुद्दे का भी राजनीतिक लाभ उठाने में लगा है। जेपी नड्डा का यह बयान सत्ता की तरफ से एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया थी, जो विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए खुद विपक्ष को ही लोकतंत्र का ‘सबसे बड़ा खतरा’ बताने की कोशिश थी। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का यह बयान कि ‘लोकतंत्र को विपक्षी दलों ने बंधक बना लिया है’ अपने आप में एक तरह का आत्मस्वीकृत अपराध है। जब आपकी पार्टी का एक निर्वाचित उपराष्ट्रपति बिना किसी सार्वजनिक कारण के त्यागपत्र देता है, और आप विपक्ष को लोकतंत्र का अपराधी बताते हैं, तो यह दोहरी मानसिकता का प्रदर्शन है। नड्डा के इस बयान का उद्देश्य न केवल जनता का ध्यान भटकाना है, बल्कि यह यह भी दशार्ता है कि सत्ता आलोचना को एक बीमारी मान चुकी है।

सवाल यह भी है कि क्या वास्तव में उपराष्ट्रपति ने किसी वैधानिक या राजनीतिक मुद्दे पर केंद्र सरकार से मतभेद जताए थे? क्या उन्होंने संसद में सत्ता के प्रस्तावों पर कुछ असहज टिप्पणियां की थीं? पिछले कुछ सत्रों में राज्यसभा में उनकी भूमिका अपेक्षाकृत सशक्त दिख रही थी, जहां उन्होंने बहस को सीमित नहीं किया, और सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। क्या यह ‘स्वस्थ राजनीति’ सत्ता को ‘रोग’ लगने लगी थी? यह पहली बार नहीं है जब संवैधानिक पदों से जुड़े व्यक्तियों को या तो चुप करा दिया गया या उन्हें सत्ता के समीकरण में ‘फिट’ करने के लिए हटाया गया। न्यायपालिका से लेकर चुनाव आयोग तक—हर संस्था में यह प्रवृत्ति दिखाई देती है कि जब तक आप सत्ता के विचारों से सहमत हैं, तब तक आप ‘देशभक्त’ हैं। लेकिन जैसे ही आप विचार, विवेक और विवेचना का प्रयोग करने लगते हैं, आप ‘बीमार’ घोषित कर दिए जाते हैं। धनखड़ का इस्तीफा न केवल एक व्यक्ति का त्याग है, बल्कि यह लोकतंत्र की असहिष्णुता की पुष्टि है। यह दिखाता है कि अब लोकतंत्र केवल चुनावों का आयोजन भर नहीं है, बल्कि एक छायायुद्ध है — जहाँ संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति या तो सत्ता के कठपुतली बने रहें या फिर सम्मानपूर्वक दरकिनार कर दिए जाएं।

यदि सत्ता को यह लगता है कि जनता इन घटनाओं को सामान्य समझकर भुला देगी, तो यह भ्रम है। भारतीय जनमानस में अब संस्थाओं के प्रति विश्वास कम हो रहा है। और जब लोग लोकतंत्र की संस्थाओं पर विश्वास खो देते हैं, तब देश केवल संविधान की किताबों में रह जाता है — व्यवहार में वह एक तानाशाही बन जाता है जो हर आलोचक को ‘बीमार’ मानती है।

धनखड़ ने भले ही कुछ नहीं कहा हो, परंतु उनकी चुप्पी, उनका इस्तीफा और उस पर सत्ता की प्रतिक्रिया—तीनों मिलकर लोकतंत्र की पीठ पर चाकू के निशान छोड़ गए हैं। और यह निशान, जितने दिखते नहीं, उससे कहीं अधिक गहरे हैं। धनखड़ का जाना यह साफ करता है कि अब संवैधानिक संस्थाएं भी सत्ता के इशारे पर झुकने को विवश हैं।

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