Saturday, June 6, 2026
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सच्ची शिक्षा संत थीं सावित्र बाई फुले

03शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्व के विकास का आधार स्तंभ तो है ही साथ ही यह देश और समाज के विकास की नींव को मजबूत बनाने का काम करती है। शिक्षा ही व्यक्ति को एक जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल उपलब्ध करवाती है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिस देश की शिक्षा प्रणाली मजबूत होगी, उस देश का सामाजिक, राजनीति, आर्थिक, नैतिक और तकनीकी विकास स्वत: स्फूर्त होता चला जाता है। सामाजिक विकास की इस अवधारणा को तब और अधिक पंख लग सकते हैं, जब देश और समाज की आधी आबादी अर्थात महिलाएं भी इस दिशा में आगे आएं। दूरदर्शी नजरिए वाली सावित्री बाई फुले ने आधी आबादी के इस योगदान की आवश्यकता को 19वीं सदी में ही महसूस कर लिया था, जब उन्होंने यह कहा कि जब तक शिक्षा मंदिरों के द्वार महिलाओं  के लिए नहीं खोले जाएंगे, तब तक सामाजिक विकास की परिकल्पना अधूरी ही रहेगी। इसलिए उन्होंने महिलाओं के शैक्षणिक पक्ष को उन्नत करने के लिए उनमें चेतना का सृजन किया। देश की पहली महिला शिक्षक, समाजसेविका, मराठी भाषा की पहली कवयित्री और दलित वर्ग की आवाज को स्वर देने वाली सावित्र बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव के एक पिछड़े और दलित कृषक परिवार में हुआ।

सावित्र बाई फुले ने शुद्र, अति शुद्र और स्त्री शिक्षा का आरंभ करके नए युग की नींव रखने के साथ-साथ महिलाओं को पढ़ाना शुरू किया। शिक्षा की इस क्रांति से समाज के अन्य लोगों को जोड़ने के लिए सावित्री बाई ने अपने पति के साथ मिलकर 1848 में पुणे में लड़कियों के एक विद्यालय की नींव रखी। केवल 9 बालिकाओं को साथ लेकर शुरू किया गया यह विद्यालय जल्द ही दलित वर्ग के शिक्षा का केंद्र बनकर उभरा। उन्होंने अपने अलावा महिला शिक्षिकाओं का एक दल भी तैयार किया।

इनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। यह वह समय था जिसमें शिक्षा का दायरा अत्यंत संकुचित था। शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोगों तक ही सीमित था। पिछड़े और दलित वर्ग के स्त्री-पुरुषों को पढ़ने का अधिकार नहीं था। विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में सावित्र बाई फुले के लिए शिक्षा का सपना देखना घनघोर अपराध था।

सामाज की दशा इतनी बदतर थी कि महिलाओं के लिए घर की देहरी लांघने की मनाही थी। इन विषम परिस्थतियों में दलित परिवार की महिलाएं अस्पृश्यता तथा छुआछूत की भावना के कारण नरक जैसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त थीं। इसके बावजूद सावित्र बाई फुले के सपनों में सदैव पुस्तकें तैरती रहती थीं। उन्हीं सपनों को आकार देने के लिए एक दिन 9 वर्ष की अबोध बालिका सावित्री बाई को उनके पिता ने किसी अंग्रेजी पुस्तक के पन्ने उलटते-पलटते देखा तो क्रोध में उन्होंने सावित्री बाई को डांटते हुए किताब को घर से बाहर फेंक दिया। उस घटना ने अबोध बालिका के मन और मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ दी।

मात्र 9 वर्ष की आयु में सावित्री बाई का विवाह 13 वर्ष के ज्योतिराव फुले के साथ हुआ। पति क्रांतिकारी और समाजसेवी थे। सावित्री बाई ने भी अपना जीवन पति की तरह समाज सेवा में लगा दिया। सावित्री बाई ने जब पढ़ने की इच्छा अपने पति के समक्ष प्रकट की तो ज्योतिराव फुले ने उन्हें घर पर ही पढ़ाना शुरू कर दिया। बाद में उनके एक मित्र शखाराम यशवंत और केशव शिवराम भावलकर ने उनको पढ़ाने का बीड़ा उठाया। शिक्षा ग्रहण करने के बाद सावित्री बाई फुले अपने पति ज्योतिबा के साथ मिलकर अन्य महिलाओं को शिक्षित करने के प्रयास में जुट गई।

इस दल की एक अध्यापिका फातिमा शेख ने उनके इस नेक कार्य में अहम योगदान दिया। लेकिन समाज के एक बड़े तबके ने शिक्षा की उनकी इस मुहिम का विरोध करना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि सावित्री बाई को उनके इस उदे्श्य से हटाने के लिए उनके विरोधी और आलोचक विद्यालय जाते समय उन पर गोबर, कीचड़ और कचरा डाल देते थे। समाज के कड़े विरोध के कारण कुछ समय के लिए उन्हें अपना विद्यालय बंद करना पड़ा। लेकिन दृढ़ इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास की बदौलत उन्होंने जल्द ही दूसरी जगह विद्यालय की स्थापना कर महिला शिक्षा का कार्य जारी रखा।

सावित्री बाई की शिक्षा की यह मुहिम यहीं नहीं रूकी। जल्द ही उन्होंने महाराष्ट्र व उसके पास के क्षेत्र में 18 बालिका विद्यालयों की स्थापना कर दी। 28 नवंबर 1890 को पति के निधन के बाद सावित्री बाई अकेली रही गई। लेकिन उनके इरादे कमजोर नहीं पडे। पति के अधूरे कार्य को पूरा करने का संकल्प कर वे उसे पूरा करने में जूट गई। साथ ही उन्होंने ज्योतिबा द्वारा स्थापित ‘सत्य शोधक समाज’ का संचालन करना शुरू कर दिया।

1896 में भारत में पड़े भीषण अकाल के दौरान उन्होंने अकाल पीड़ितों की जी-जान से सेवा की। मार्च 1897 में जब पूना में प्लेग ने दस्तक दी तो देखते ही देखते पूरा पुणा प्लेग की चपेट में आ गया। उन्होंने अपने को रोगियों की सेवा में पूरी तरह से समर्पित कर दिया। उनके ममता भरे हाथों के स्पर्श से प्लेग पीड़ित बच्चे तो स्वस्थ हो रहे थे, लेकिन स्वयं सावित्री बाई को प्लेग ने अपनी चपेट में ले लिया। 10 मार्च 1897 को प्लेग द्वारा ग्रसित रोगियों की सेवा करते वक्त सावित्री बाई फुले का निधन हो गया।

समाज में नई जागृति लाने के लिए उन्होंने दो काव्य पुस्तकें ‘बावनकशी’ और ‘सुबोध रत्नाकर’ लिखीं। साहित्य और समाज सेवा में उनके योगदान को लेकर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने 1852 में उन्हें सम्मानित भी किया। वो एक ऐसी समाजसेवी और महान शिक्षा संत थीं, जिसे महाराष्ट्र की मदर टेरेसा भी कहा जाता है।


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