राजकुमार जैन राजन
व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व को संवारने में साहित्य का बहुत बड़ा योगदान हैं। साहित्य सभ्यता व इतिहास की आंखें हैं जो मनुष्य को एक बेहतरीन दृष्टि देती हैं। मनुष्य के जीवन में अच्छे संस्कारों का निर्माण साहित्य के द्वारा ही संभव होता है। प्राचीनकाल में जब लेखन कला का विकास नहीं था तो मनुष्य परस्पर विचारों के आदान -प्रदान से ज्ञान प्राप्त करते थे, किंतु जैसे – जैसे लेखन कला का विकास हुआ वैसे – वैसे विभिन्न विषयों पर विचारों को लिपिबद्ध किया जाने लगा और विभिन्न विषयों पर केंद्रित पुस्तकें तैयार होने लगीं। पुस्तकें नहीं होतीं, तो कदाचित हम न वैदिक मानव की प्राथमिकताओं को जान पाते और न ही हमारे पास दुनिया की सर्वाधिक भाषाओं में अनुदित पंचतंत्र की कथाओं में सिमटा हुआ जीवन का अनुभव होता। कागज और छापेखाने के आविष्कार से पहले से पुस्तकें लिखी जाती रही हैं। आधुनिक स्वरूप तक की विकास यात्रा में पुस्तकें गुफाओं की दीवारों, शिलालेखों, मृदा पट्टियों व सवर्ण पत्रों तक पर उत्कीर्ण की गई। मनुष्य ने भोज पत्रों, ताम्र पत्रों, कपड़ों पर भी विचारों को व्यवस्थित कर उन्हें पुस्तक का रूप दिया।
सद्साहित्य का पठन- पाठन ही स्वाध्याय है। सद्साहित्य के स्वाध्याय का महत्व अति प्राचीनकाल से ही मान्य रहा है। वस्तुत: पुस्तकें हमारी सभ्यता व संस्कृति का दर्पण है। भविष्य को उन्नत व प्रशस्त बनाने का सामर्थ्य रखने वाले अनेक ऋषि, मनीषियों का जीवन दर्शन पुस्तकों में सुरक्षित है। भगवान महावीर, बुद्ध, रामकृष्ण, विवेकानन्द, गांधी, दयानन्द सरस्वती व अन्य इसी प्रकार के महापुरुषों का जीवन प्रेरक बनकर मनुष्य जीवन को आलौकित करता है। इस लिए कहा गया है कि स्वाध्याय करने से ज्ञान के साथ मन की शांति, आनन्द, उमंग और ऊर्जा भी प्राप्त होती है। स्वाध्याय एक ऐसी परम्परा है जो गुरु की अनुपस्थिति में भी गुरु का कार्य करती है। निश्चित ही स्वाध्याय के द्वारा ही मनुष्य एक नयी ज्ञान ऊर्जा प्राप्त करता है। किसी के शरीर के लिए जितना जरूरी पौष्टिक आहार है, मन- मस्तिष्क के लिए उतना ही जरूरी स्वधाय है। स्वाध्याय के अभाव में मस्तिष्क जड़ हो जाता है। मनुष्य की संवेदना व चिंतन क्षमता समाप्त हो जाती है। अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि प्रेरणादायक धार्मिक, आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी साहित्य पढ़ने से न सिर्फ मानसिक शांति प्राप्त होती है बल्कि विपरीत परिस्थितियों व संघर्षों में कुछ सीखकर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी प्राप्त होती है। निश्चित ही स्वाध्याय से प्राप्त होनेवाला आनन्द संसार के सभी आनन्दों से बढ़कर है।
स्वाध्याय के साथ आत्मबोध, आत्मज्ञान, और जीवन को सुखमय बनाने का जो ज्ञान मिलता है, वह अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता। स्वाध्याय द्वारा व्यक्ति ‘स्व’ से जुड़ता है और अपनी ही समीक्षा करता है। इससे उसका स्वयं के जीवन पर आत्म चिंतन बढ़ता है और वह अपने दोषों का शमन करता है। इससे उसके अंदर एक ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है जो व्यक्ति की प्राण शक्ति भी बढ़ाता है। अत: हमारे दैनिक जीवन में स्वाध्याय का समावेश होना आवश्यक है।
स्वाध्याय का सबसे बड़ा लाभ यह भी है कि इससे मनुष्य के विचार उन्नत एवम परिष्कृत बनते हैं। स्वाध्याय नि:संदेह एक ऐसा अमृत है जो मानस में प्रवेश कर मनुष्य की पाशविक प्रवृतियों को नष्ट कर देता है। जिसने स्वाध्याय का महत्व जान लिया, उसने सौभाग्य का द्वार पा लिया। वे परिवार धन्य है जिनमें उत्तम पुस्तकों का संग्रह होता है।जहां नियमित स्वाधाय होता है वहां देवत्व का वास होता है। जिंदगी की आपा-धापी और व्यस्तता में मनुष्य की पढ़ने -लिखने की प्रवृति विलुप्त हो रही है। बालकों, पालकों और शिक्षकों के हाथों से पुस्तकें दूर हो रहीं है। इस कारण हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का तेजी से क्षरण हो रहा है। आज बालकों का सबसे ज्यादा समय टीवी, कम्प्यूटर मोबाइल और इंटरनेट में व्यतीत हो रहा है। इससे बालकों में हिंसक प्रवृत्तियां बढ़ रही है, वे एकाकी और संस्कारहीन होते जा रहे हैं। उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो रहा है। उसका बौद्धिक व भावनात्मक विकास अवरुद्ध हो रहा है। स्कूलों ,कालेजों की शिक्षा तभी सफल हो सकती है जब वह सुसंस्कारों से परिपूर्ण हों। जैसे – जैसे परिवारों से पुस्तकें लोप होती जा रही हैं, सुख, शांति, संस्कार भी लोप होते जा रहे हैं।
जनता को अपने जनप्रतिनिधियों के मार्फत सरकार पर दबाव बनाना चाहिए ताकि विद्यालयों सहित शहरों, गांवों में पुस्तकालय, वाचनालय की स्थापना की जाए, जहाँ लोगों को स्वाध्याय के लिए प्रेरित किया जाए। स्वयमसेवी संस्थाएं भी इस और अपने कदम बढ़ा कर एक अनूठा कार्य कर सकती है। बस जरूरत है प्रगाढ़ इच्छा शक्ति की ,ताकि हम सबके सामूहिक प्रयास से हमारा समाज एक पुस्तक प्रेमी समाज बन सके। नव उपनिवेशवाद के बढ़ते कदम और उसके जकड़ते शिकंजों में छटपटाता हमारे देश का मीडिया निरन्तर संक्रमण की स्थिति में अभिशप्त बनकर खड़ा है। इसके विरुद्ध संघर्ष और अपसंस्कृति के खिलाफ एक नया आंदोलन छेड़ने में किताबें विकासशील देशों का हथियार सिद्ध होती हैं। इसके लिए पुस्तकालय संस्कृति को गांवों, नगरों, महानगरों में तेजी से बढ़ाना होगा। अपने आप को महान बनाने के लिए तथा सभ्यता एवम संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए हमें इंटरनेट संस्कृति की जगह पुस्तक संस्कृति को विकसित करना होगा। क्योंकि पुस्तकें हमारे ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करती हैं। सत्य से साक्षात्कार कराती है और नूतन प्रेरणादायी विचारों से जीवन मे नव ऊर्जा का संचार करती है।
इंटरनेट, टीवी, मोबाइल के बिना काम नहीं चल सकता, पर उसका उपयोग आवश्यकता अनुसार ही होना चाहिए। ई-पुस्तकें भले ही पुस्तक संग्रह का शौक पूरा नहीं करती, लेकिन पढ़ने का चाव बनाये रखती हैं। साइबर दुनिया में कमल भी हैं और कीचड़ भी। हमें उस कीचड़ से बचकर अपना ध्यान स्वाध्याय की ओर मोड़ना है। जीवन के विकास और उत्कर्ष में स्वाध्याय के महत्व को कभी नकारा नहीं जा सकता । इसलिए प्रॉस्टिन फिल्ट्स का यह विचार अधिक सार्थक है कि, ‘पुराने कपड़े पहनकर नई पुस्तकें खरीदिये, उनका स्वाध्याय कीजिये।’ पुस्तकें आपके अभिशापित जीवन को वरदान में बदल सकती है।

